दतिया की जीत से कांग्रेस को मिला नया चुनावी मॉडल

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  • क्लस्टर-सेक्टर फॉर्मूले से हर बूथ पर नजर, मिशन-2028 की तैयारी तेज

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। दतिया विधानसभा उपचुनाव में मिली जीत ने मध्यप्रदेश कांग्रेस को सिर्फ राजनीतिक संजीवनी ही नहीं दी है, बल्कि संगठन और चुनाव प्रबंधन का एक नया मॉडल भी दे दिया है। कांग्रेस अब दतिया में अपनाई गई क्लस्टर-सेक्टर-बूथ व्यवस्था को मिशन-2028 की तैयारियों का आधार बनाने जा रही है। पार्टी का मानना है कि बूथ स्तर तक मजबूत जमावट और लगातार मॉनीटरिंग के जरिए भाजपा के मजबूत बूथ मैनेजमेंट का मुकाबला किया जा सकता है।
दतिया में कांग्रेस ने विधानसभा क्षेत्र को अलग-अलग क्लस्टर में बांटकर चुनावी जिम्मेदारियां तय की थीं। प्रत्येक क्लस्टर के अंतर्गत आसपास के चार से पांच बूथों को मिलाकर एक सेक्टर बनाया गया। क्लस्टर की जिम्मेदारी किसी वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता को दी गई, जबकि हर सेक्टर की निगरानी के लिए दो से तीन नेताओं की टीम बनाई गई। इसके नीचे बूथ कमेटियों को सक्रिय किया गया। इस पूरी व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण बात थी रोजाना की मॉनीटरिंग। क्लस्टर प्रभारी, सेक्टर प्रभारियों के जरिए प्रत्येक बूथ की स्थिति की रिपोर्ट लेते थे। जहां कमजोरी नजर आती थी, वहां तत्काल नेताओं और कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ाई जाती थी। स्थानीय समीकरणों को देखते हुए विधायक, पूर्व सांसद-विधायक और वरिष्ठ नेताओं के जनसंपर्क कार्यक्रम तय किए गए। समाज, जाति और वर्ग के हिसाब से अलग-अलग लोगों को घर-घर संपर्क की जिम्मेदारी दी गई।
285 में से 156 बूथ कांग्रेस के खाते में
दतिया में इस रणनीति का असर चुनाव परिणाम में साफ दिखाई दिया। विधानसभा क्षेत्र के कुल 285 बूथों में कांग्रेस ने 156 बूथों पर जीत दर्ज की। चार सेक्टर में तो कांग्रेस को लगभग एकतरफा सफलता मिली। इसके मुकाबले भाजपा केवल तीन सेक्टरों में बढ़त बना सकी। कांग्रेस संगठन अब इसी मॉडल को प्रदेशभर में लागू करने की तैयारी में है।
तीन क्लस्टर बने कांग्रेस के सुपर कैंपेनर
दतिया चुनाव की समीक्षा में तीन क्लस्टर का प्रदर्शन कांग्रेस के लिए सबसे बेहतर रहा। इन क्लस्टरों के प्रभारियों को पार्टी की रिपोर्ट में प्रभावी चुनाव प्रबंधन के लिए विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। क्लस्टर नंबर छह के प्रभारी पूर्व मंत्री और विधायक जयवर्धन सिंह रहे। उनके क्लस्टर के 35 में से 30 बूथ कांग्रेस ने जीते। क्लस्टर नंबर सात के प्रभारी पंकज उपाध्याय रहे, जहां 29 में से 24 बूथ कांग्रेस के पक्ष में गए। क्लस्टर नंबर आठ की जिम्मेदारी पूर्व विधायक बैजनाथ कुशवाह के पास थी। यहां भी कांग्रेस को एकतरफा बढ़त मिली। इन तीनों क्लस्टरों में सिर्फ बूथ जीतने का आंकड़ा ही मजबूत नहीं रहा, बल्कि जीत का अंतर भी कांग्रेस के पक्ष में काफी अधिक रहा। यही वजह है कि पार्टी इन प्रभारियों के मॉडल को संगठन के लिए उपयोगी मान रही है। इसके अलावा पूर्व मंत्री लाखन सिंह यादव की अगुवाई वाले क्लस्टर नंबर एक का प्रदर्शन भी अच्छा रहा। यहां 34 में से 18 बूथ कांग्रेस के पक्ष में गए।
कुछ क्लस्टर में संगठन की कमजोरियां भी सामने आईं
दतिया मॉडल ने कांग्रेस को अपनी कमजोरियां पहचानने का मौका भी दिया। तीन क्लस्टरों के सेक्टर में पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा। पूर्व मंत्री प्रभु सिंह ठाकुर के प्रभार वाले क्लस्टर नंबर पांच में कांग्रेस को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। यहां 29 में से सिर्फ दो बूथ कांग्रेस जीत सकी, जबकि 27 बूथ भाजपा के खाते में चले गए। इसी तरह विधायक दिनेश गुर्जर, पूर्व विधायक सत्यपाल नीटू सिकरवार और विधायक सचिन यादव के क्लस्टरों में भी आधे से अधिक बूथों पर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। पार्टी अब इन कमजोर क्षेत्रों की अलग से समीक्षा कर रही है, ताकि मिशन-2028 से पहले बूथ स्तर की कमियों को दूर किया जा सके।
अब विधानसभा प्रभारी से बूथ तक जिम्मेदारी
कांग्रेस दतिया मॉडल को अपने व्यापक संगठन सृजन अभियान से जोड़ रही है। इसके तहत विधानसभा प्रभारी, मंडलम, सेक्टर, वार्ड और ग्राम पंचायत स्तर पर समितियां गठित कर जिम्मेदारियां बांटी जा रही हैं। बूथ लेवल एजेंट यानी बीएलए भी तय किए जा रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस संगठन महामंत्री संजय कामले के मुताबिक दतिया में बनाई गई व्यवस्था संगठन सृजन का ही हिस्सा थी और पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर इसके परिणाम काफी बेहतर रहे। अब इसी तर्ज पर प्रदेश के अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी संगठन को सक्रिय किया जाएगा।
दतिया से निकला कांग्रेस का नया फॉर्मूला
दतिया के प्रयोग का सबसे अहम पहलू यह रहा कि कांग्रेस ने सिर्फ बड़े नेताओं के दौरे या रैलियों पर निर्भर रहने के बजाय बूथ-दर-बूथ माइक्रो मैनेजमेंट पर जोर दिया। हर बूथ की स्थिति की रिपोर्ट, कमजोर क्षेत्रों में तत्काल हस्तक्षेप और स्थानीय सामाजिक समीकरण के हिसाब से संपर्क अभियान ने चुनाव प्रबंधन को जमीनी स्तर तक पहुंचाया। अब कांग्रेस की कोशिश है कि यही व्यवस्था 2028 तक लगातार सक्रिय रहे। यानी चुनाव के कुछ महीने पहले संगठन को सक्रिय करने के बजाय अभी से बूथ स्तर पर निगरानी और संपर्क का नेटवर्क तैयार किया जाए।

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