- महंगी खरीदी के मामले में लोकायुक्त ने भी शुरू की जांच…
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों में खरीदी की कथित गड़बड़ियों के बीच रिश्वतखोरी के मामले भी सामने आ रहे हैं। एक ओर ई-नगर पालिका और जेम पोर्टल के आंकड़ों के विश्लेषण में करीब 250 करोड़ रुपये की कथित अनियमितताओं के संकेत मिलने की बात कही जा रही है, तो दूसरी ओर लोकायुक्त पुलिस की कार्रवाई में अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच चार मामलों में पांच अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़े गए। वर्ष 2013 से अब तक निकायों के 59 अधिकारी-कर्मचारी लोकायुक्त और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) की जांच के दायरे में आ चुके हैं। खरीदी में कथित गड़बड़ी के मामले में लोकायुक्त की विशेष पुलिस स्थापना (एसपीई) ने स्वत: संज्ञान लेकर जांच शुरू की है। इस बीच नगरीय विकास एवं आवास विभाग की निगरानी व्यवस्था, खरीदी प्रक्रिया की पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय करने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। विभागीय स्तर पर कार्रवाई की जानकारी सामने आ रही है, लेकिन करीब 250 करोड़ रुपये की कथित अनियमितताओं के मामले में विभागीय मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की सार्वजनिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।
लोकायुक्त पुलिस की अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच की कार्रवाई में नगरीय निकायों के पांच अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़े गए। इनमें रायसेन जिले की नगर परिषद उदयपुरा के उपयंत्री और नगर पालिका मंडला के मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) शामिल हैं। दोनों पर दो-दो लाख रुपये की रिश्वत लेने के आरोप में कार्रवाई हुई। इसके अलावा नगर पालिका नरसिंहपुर के एक लिपिक को 25 हजार रुपये और जबलपुर जिले की पनागर नगर परिषद के उपयंत्री व दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी को 40 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा गया। इन मामलों में निर्माण कार्य की सुरक्षा निधि, अनुभव प्रमाणपत्र जारी करने, ठेकेदार के भुगतान के बाद एफडीआर और बैंक गारंटी लौटाने तथा नल-जल योजना के काम से जुड़े मामलों में रिश्वत मांगने के आरोप हैं।
13 साल में 59 अधिकारी-कर्मचारी जांच के घेरे में
नगरीय निकायों में भ्रष्टाचार की शिकायतें केवल हाल के महीनों तक सीमित नहीं हैं। वर्ष 2013 से अब तक नगर निगम, नगर पालिका और नगर परिषदों के 59 अधिकारी-कर्मचारी लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू की जांच के दायरे में आए हैं। इनमें अधिकांश मामले कथित तौर पर रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े जाने से जुड़े हैं, जबकि कुछ मामलों में आय से अधिक संपत्ति के आरोप हैं। इन प्रकरणों में विभागीय अभियोजन स्वीकृति मिलने के बाद अदालत में चालान पेश किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। यह स्थिति बताती है कि निकायों में भ्रष्टाचार के मामलों में जांच के साथ अभियोजन की प्रक्रिया भी अहम है। हालांकि, जांच के दायरे में आने या गिरफ्तार होने का अर्थ दोष सिद्ध होना नहीं है। संबंधित मामलों का अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया से तय होगा।
250 करोड़ की खरीदी में गड़बड़ी के संकेत, लोकायुक्त ने मांगे दस्तावेज…
निकायों में सामग्री खरीदी का मामला अब जांच के दायरे में है। विभागीय स्तर पर ई-नगर पालिका पोर्टल और जेम पोर्टल के आंकड़ों का एआई की मदद से विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, खरीदी के रिकॉर्ड में अंतर सामने आने के बाद करीब 250 करोड़ रुपये की कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठा। इसके बाद 392 अधिकारी-कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की जानकारी सामने आई है। विशेष पुलिस स्थापना लोकायुक्त ने स्वत: संज्ञान लेकर मामले की जांच शुरू की है। एसपीई के महानिदेशक योगेश देशमुख के मुताबिक, नगरीय विकास एवं आवास विभाग से संबंधित जानकारी मांगी जा रही है। दस्तावेजों के परीक्षण के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने कहा है कि लोकायुक्त संगठन द्वारा मांगी जाने वाली जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी। जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि रिकॉर्ड में मिले अंतर की प्रकृति क्या है, किन अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है और सरकारी खजाने को वास्तविक नुकसान हुआ है या नहीं।
