सरकारी अनुदान के सहारे नगर सरकारें

  • अपनी कमाई बढ़ाने में फेल; टैक्स वसूली में निकायों की सुस्ती भारी
  • गौरव चौहान
सरकारी अनुदान

मध्य प्रदेश के नगरीय निकायों की आर्थिक हालत का सबसे बड़ा संकट यह है कि नगर सरकारें अपनी जरूरत की आय खुद जुटाने में लगातार पिछड़ रही हैं। संपत्ति कर और अन्य स्थानीय राजस्व की कमजोर वसूली ने नगर निगमों और नगर पालिकाओं को सरकारी अनुदान पर निर्भर बना दिया है। स्थिति यह है कि प्रदेश के नगरीय निकायों की करीब 68 प्रतिशत आय अनुदान पर टिकी है, जबकि स्थानीय स्तर पर राजस्व जुटाने की क्षमता का अपेक्षित इस्तेमाल नहीं हो रहा। संपत्ति कर वसूली के आंकड़े इस स्थिति की तस्वीर साफ करते हैं। भोपाल नगर निगम करीब 50 प्रतिशत और इंदौर करीब 42 प्रतिशत संपत्ति कर ही वसूल पाया है। वहीं मुरैना में स्थिति बेहद खराब है, जहां महज 8 प्रतिशत संपत्ति कर की वसूली हुई। सिंगरौली में 24 प्रतिशत और सतना में 29 प्रतिशत वसूली दर्ज की गई है।
नगरीय निकायों की समस्या केवल कम टैक्स वसूली तक सीमित नहीं है। कर्मचारियों के वेतन, स्थापना व्यय, बिजली, सफाई, पानी और दूसरी अनिवार्य सेवाओं का खर्च लगातार बना हुआ है। ऐसे में जब स्थानीय स्रोतों से पर्याप्त राजस्व नहीं आता तो निकायों को शासन से मिलने वाले अनुदान पर निर्भर रहना पड़ता है। राजस्व संग्रहण के आंकड़ों में भी कई बड़े निकाय कमजोर नजर आते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सिंगरौली करीब 29 प्रतिशत, सागर 34 प्रतिशत, जबलपुर महज 3 प्रतिशत और बुरहानपुर 10 प्रतिशत तक ही राजस्व संग्रह कर पाए हैं। भोपाल और इंदौर जैसे बड़े शहर भी अपनी पूरी क्षमता के अनुरूप वसूली नहीं कर पाए हैं। इसका सीधा असर निकायों की वित्तीय स्वायत्तता पर पड़ रहा है। कमाई स्थानीय स्तर पर नहीं बढ़ी तो नगर सरकारों का हर बड़ा खर्च राज्य सरकार की मदद पर निर्भर रहेगा।
 हर खर्च की जिम्मेदारी शासन नहीं उठाएगा
मध्य प्रदेश नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने भी निकायों को अपनी आय बढ़ाने की जरूरत स्पष्ट कर दी है। शासन की ओर से संकेत है कि सरकार एक सीमा तक ही वित्तीय सहायता उपलब्ध करा सकती है। इसलिए निकायों को अपनी वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए स्थानीय कर और शुल्क की वसूली मजबूत करनी होगी। यानी अब निकायों के सामने दोहरी चुनौती है—खर्च नियंत्रित करना और आय बढ़ाना। यदि दोनों मोर्चों पर सुधार नहीं हुआ तो आने वाले समय में वेतन और बुनियादी सेवाओं के संचालन तक पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।
चुंगी के विकल्प घटे, अनुदान पर निर्भरता बढ़ी
स्थानीय निकायों की आय कमजोर होने का एक कारण पारंपरिक राजस्व स्रोतों में बदलाव भी है। कम राजस्व संग्रहण के बीच शासन की ओर से निकायों को मिलने वाले चुंगी कर में भी कटौती की गई है। इससे स्थानीय निकायों के अपने संसाधनों और सरकारी सहायता के बीच का अंतर और महत्वपूर्ण हो गया है। प्रदेशभर में राजस्व संग्रहण की स्थिति कमजोर रहने का असर यह है कि कई निकाय अपने नियमित खर्च पूरे करने के लिए भी बाहरी मदद पर निर्भर हैं। यदि अनुदान में देरी होती है तो सबसे पहले वेतन, भुगतान और जरूरी सेवाओं पर दबाव आने की आशंका रहती है।
अब वित्त आयोग तय करेगा कौन कितना पाएगा
इस बीच राज्य वित्त आयोग नगरीय निकायों और पंचायतों की वित्तीय स्थिति का पुनरावलोकन कर रहा है। आयोग के अध्यक्ष जयभान सिंह पवैया के अनुसार राज्य के करों, शुल्कों, पथकरों और फीस से मिलने वाले शुद्ध राजस्व के वितरण की समीक्षा की जाएगी। आयोग राज्य, पंचायतों और नगरीय निकायों के बीच संसाधनों के न्यायसंगत बंटवारे, स्थानीय निकायों को मिलने वाले करों और अनुदानों के सिद्धांतों पर भी सुझाव देगा। इसके साथ ही ऋण दायित्व, ब्याज भुगतान, स्थापना व्यय, पूंजीगत खर्च और जन-सुविधाओं के विस्तार जैसे मुद्दों पर भी विचार किया जाएगा। असल सवाल अब यह है कि नगर सरकारें कब तक सरकारी अनुदान के भरोसे चलेंगी? टैक्स वसूली की मौजूदा रफ्तार बताती है कि निकायों को वित्तीय आत्मनिर्भरता के लिए केवल ज्यादा अनुदान नहीं, बल्कि बेहतर कर प्रशासन और प्रभावी वसूली तंत्र की भी जरूरत है।

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