सागर से यूपी-पंजाब तक साधेगी भाजपा!

भाजपा का बड़ा गेम प्लान…फतह का रास्ता तय करेगा संत रविदास मंदिर का द्वार

बिच्छू डॉट कॉम/ भोपाल (डीएनएन)। भारत में धर्म और जाति का सियासी कनेक्शन कोई नया नहीं है। ये दो फैक्टर सत्ता की सीढी चढऩे में बड़े मददगार साबित हो रहे हैं। मंदिर व मंडल आंदोलन के बाद कोई भी राजनीतिक दल चाहकर भी धर्म और जाति के समीकरण को नजरअंदाज नहीं कर पा रहा। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान विधानसभा चुनाव से ठीक 3 महीने पहले सागर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 अगस्त 2023 को संत रविदास के भव्य मंदिर व संग्रहालय की आधारशिला रखी। इसके बाद नवंबर 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में इन तीनों राज्यों में भाजपा को अप्रत्याशित सफलता मिली। इसके कुछ माह बाद हुए लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में भाजपा ने सारी सीटें जीती। हालांकि चुनावी जीत-हार में कई फैक्टर काम करते हैं। सियासी जानकारों का मानना है कि अनुसूचित जाति का बड़ा तबका संत रविदास में आस्था रखता है। भाजपा की बंपर जीत में एक बड़ा फैक्टर संत रविदास मंदिर को माना गया। संत रविदास के सहारे भाजपा उस वोट बैंक (अनुसूचित जाति) में सेंध लगाने में सफल हुई, जिसे कांग्रेस का कोर वोट बैंक माना जाता रहा है। अब सागर में 101 करोड़ की लागत से 11.21 हेक्टेयर संत रविदास का भव्य मंदिर बनकर तैयार है। लेकिन मंदिर का लोकार्पण अब तक नहीं हो पाया।
सियासी गलियारों में चर्चा है कि फरवरी 2027 में पीएम नरेन्द्र मोदी मंदिर का लोकार्पण कर सकते हैं। तब तक 2027 के मध्य में संभावित 7 राज्यों के विधानसभा चुनाव का माहौल जोर पकड़ चुका होगा। खास बात ये है कि इनमें यूपी और पंजाब दो ऐसे राज्य हैं, जहां अनुसूचित जाति और खासकर रविदास संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या काफी ज्यादा है, जो भाजपा के लिए चुनाव में मददगार साबित हो सकते हैं। पंजाब में 32 फीसदी आबादी अनुसूचित जाति की है। देश में प्रतिशत के आधार पर इतने बड़े पैमाने में कहीं भी अनुसूचित जाति की जनसंख्या नहीं है। वहीं उत्तर प्रदेश में भी 21 फीसदी आबादी अनुसूचित जाति की है और 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, जो सरकार बनाने में निर्णायक साबित होती हैं।
मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति का अहम वोट बैंक
मध्य प्रदेश में 230 विधानसभा सीटों में से 35 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति की जनसंख्या 1 करोड 13 लाख से ज्यादा है। जो कुल आबादी का करीब 15.6 प्रतिशत है। बुंदेलखंड, ग्वालियर-चंबल, मालवा और पूरे राज्य में अनुसूचित जाति के मतदाताओं का बोलबाला है। मोटे तौर पर माना जाता है कि प्रदेश के करीब 25 जिलों में एससी मतदाता निर्णायक स्थिति में हैं। भाजपा इस वोट बैंक को हासिल करने संत रविदास के अनुयायियों को रिझाने के प्रयास कर रही है। राजनीति शास्त्र के विद्वान डॉ. अशोक पान्या का कहना है कि रविदास मंदिर को लेकर भाजपा और आरएसएस की रणनीति बेहतर है। रविदास मंदिर की स्थापना के साथ भाजपा और आरएसएस ने दलित वोटर और खासकर संत रविदास के अनुयायियों को रिझाने के लिए योजना बनायी है। इसका दलित मतदाताओं पर सकारात्मक असर पड़ेगा। दलित वोट बैंक पर संत रविदास मंदिर प्रभाव छोड़ेगा।
भाजपा की समरसता कलश यात्रा
सागर में बनाए गए संत रविदास मंदिर को भाजपा के पालिटिकल एजेंडे के तौर पर देखा जा रहा है। भाजपा ने पूरे देश में संत रविदास की 650 वीं जयंती के अवसर पर समरसता संकल्प अभियान एवं पावन माटी कलश वितरण का आयोजन किया है। वाराणसी से शुरू हुई समरसता कलश यात्रा राजधानी भोपाल पहुंची। आयोजन में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष हमेंत खंडेलवाल सहित कई दिग्गजों के साथ भाजपा अनुसूचित मोर्चा के नेता मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में जातिवाद और छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध लडऩे का आह्वान किया। कार्यक्रम में संत रविदास मंदिर का खास उल्लेख किया गया। अब इस कलश यात्रा को गांव-गांव तक लेकर जाने की योजना भाजपा ने बनाई है। सामाजिक समरसता की बात सभी दल करते हैं, लेकिन जब भी चुनाव की बात आती है तो जातीय समीकरण साधने की प्रक्रिया चलती है। आदिवासी वोटों के लिए बिरसा मुंडा जयंती, हबीबगंज स्टेशन का नाम रानी कमलापति रखना, ये सब आदिवासी वर्ग को रिझाने के प्रयास थे। इस मंदिर को बहुप्रचारित किया जाएगा। लोकार्पण में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी आमंत्रित किया जाएगा। इस तरह के 100 प्रयास होते हैं, जिनमें से 10 प्रयास ही सफल होते हैं। इसका असर आसपास जरूर पड़ेगा।
अब संतों के नाम पर राजनीति
पूर्व मंत्री व कांग्रेस नेता सुरेंद्र चौधरी कहते हैं कि भाजपा का संतों, महात्माओं, महापुरुषों और भगवान से कोई लेना-देना नहीं है। भाजपा इनका राजनीतिकरण करके वोट हासिल करना चाहती है। इसी उद्देश्य को लेकर भाजपा ने रविदास मंदिर का भूमिपूजन किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक साल में दो बार सागर आए। पहले उन्होंने मंदिर की घोषणा की, फिर महाकुंभ किया, तब भी चुनाव था और जब भूमिपूजन करने आए, तब मध्य प्रदेश और केंद्र के चुनाव पास में थे। अब पंजाब और उत्तर प्रदेश के चुनाव हैं और अगले साल प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव होना हैं। कांग्रेस का आरोप है कि अनुसूचित जाति वोट बैंक को साधने के लिए संत रविदास और गंगाजल का सहारा भाजपा ले रही है। घबराई हुई भाजपा को एकमात्र सहारा संत रविदास का रह गया है। राम मंदिर में चढ़ावा चोरी हो जाने से भाजपा में घबराहट है। अब इसलिए संत और महात्माओं के चरणों में जाकर उनकी फोटो दिखाकर लोगों की वोट हासिल करने के लिए भ्रमित करने की कोशिश है, जोकि नाकाम साबित होगी।
मंदिर जाने के लिए फोरलेन सडक़
भाजपा विधायक विधायक प्रदीप लारिया कहते हैं कि मंदिर का काम 95 प्रतिशत हो चुका है। अभी स्टेडियम से लेकर रविदास मंदिर तक और मंदिर से सांईखेड़ा रोड फोरलेन तक सडक़ का निर्माण हुआ है। एक सडक़ और बनाने की जरूरत है। मकरोनिया चौराहे से वटालियन और वटालियन से मुक्तिधाम से ऐसी सडक़ बनाई जा सकती है। जहां लोग पैदल चलकर मंदिर पहुंच सकेंगे। मंदिर के लोकार्पण का समय यूपी और पंजाब विधानसभा चुनाव देखकर किए जाने के सवाल पर विधायक प्रदीप लारिया कहते हैं कि ऐसा नहीं है और अभी कोई ऐसा विषय भी नहीं है। संत रविदास मंदिर का जब 2023 में भूमिपूजन हुआ था, उस समय भी लोगों ने कहा था कि चुनाव के कारण बन रहा है। लेकिन आज संत रविदास की 650 वीं जयंती मनाई जा रही है। मुझे लगता है कि इससे उपयुक्त कोई समय नहीं हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी मंदिर का लोकार्पण करेंगे। सागर के मकरोनिया नगरपालिका क्षेत्र के बड़तूमा में संत रविदास मंदिर को मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा बनाया गया है। राजस्थान के धौलपुर के वंशीपहाडपुर के लाल पत्थरों से मंदिर बना है। 66 फीट ऊंचे मंदिर के गर्भगृह में बिना लोहे के केवल पत्थर, रेत और गिट्टी का प्रयोग कर भव्य और दिव्य स्वरूप दिया गया है। ये मंदिर 5500 वर्ग फीट में नागर शैली की तर्ज पर तैयार हुआ है। परिसर में संत रविदास के जीवन का वर्णन दीवार पर कलाकृति (म्युरल स्कल्प्चर) के माध्यम से किया गया। दो भव्य प्रवेश द्वार के अलावा विशाल वाहन पार्किंग की व्यवस्था भी की गई है। इसके अलावा संत रविदास के दर्शन को प्रदर्शित करने के लिए व्याख्या संग्रहालय (इंटरप्रिटेशन म्यूजियम) का निर्माण भी किया गया है। इसमें संत रविदास के जीवन, दर्शन, पंथ और साहित्य से जुड़ी चार गैलरी बनाई गई हैं। संत रविदास परिसर में देश-विदेश से आने वाले श्रृद्धालुओं के लिए विशाल भक्त निवास भी बनाया गया है। यहां देश विदेश से आने वाले विद्वान, भक्त, रविदास पंथ के साधक और श्रृद्धालुओं को ठहरने का इंतजाम होगा। जहां 15 एसी कमरे, 50 व्यक्तियों की क्षमता वाला आवासगृह भी होगा। परिसर में अल्पाहार गृह भी है। तंबू के आकार वाले इस गृह में नाश्ता और भोजन किया जा सकेगा। यहां बैठने के लिए पारम्परिक बैठक व्यवस्था होगी।
यूपी की 140 सीटों पर नजर
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 नजदीक होने के चलते एकाएक दलितों को दिल में उतारने की दिलचस्पी बढ़ती नजर आ रही हैं। एक तरह से ‘डी’ फैक्टर पर यूपी की सियासत की सुई अटक सी गई हैं। भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस, आसपा सभी दल इस बार दलितों को साधने में सक्रिय हो गए हैं। सियासी जानकार इसे सियासी दलों का दलित प्रेम बता रहे हैं। पहले बात दलितों के बल पर सियासत करने वाली बसपा की करते हैं। चार बार सत्ता में रह चुकी बसपा 2024 के बाद से एकाएक कमजोर होती चली गई। 2022 में एक ही विधायक जीता। 2024 में कोई सांसद नहीं बना। निकाय चुनावों में भी हार मिली। संदेश गया कि बसपा का मूल वोटर छिटककर भाजपा और सपा के पाले में चला गया, लेकिन 2027 में बसपा ने दलितों को एकजुट करने के लिए मायावती ने संगठन में बड़े बदलाव किए। दलितों को समझा रही हैं कि 2027 में 2007 की तरह मुस्लिम और ब्राह्मण के साथ मिलकर सरकार बनाई जाएगी। दलितों का पहले ही की तरह उत्थान होगा। दलितों की बस्ती में बसपाई दस्तक देकर दूसरे सियासी दल के झांसे में नहीं आने की हिदायत दे रहे हैं। बसपा का फोकस अपने पारंपरिक जाटव वोट बैंक की मजबूती और गैर जाटव दलित वर्गों तक फिर पहुंच बनाने की है।
यूपी में दलितों की जनसंख्या करीब 21 प्रतिशत है। दलित 140 से अधिक विधानसभा सीटों पर चुनावी परिणामों को सीधे प्रभावित करते हैं। वेस्ट यूपी में दलित खासा दबदबा रखते हैं। बिजनौर में 20.94, आगरा में 21.78, सहारनपुर में 21.73, बुलंदशहर में 20.21, अलीगढ़ में 21.20 प्रतिशत दलित आबादी है, जबकि मेरठ में 18.44, गाजियाबाद में 18.40, गौतमबुद्धनगर में 16.31, मुरादाबाद में 15.86 , मुजफ्फरनगर में 13.50, रामपुर में 13.38. बरेली में 12.65 और बागपत में 10.98 प्रतिशत दलित आबादी है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव 2024 के लोकसभा चुनाव में सफलता मिलने के बाद पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण पर आगे बढ़ रहे हैं। सियासी रसातल से निकलने में जुटी कांग्रेस ने दलित समाज के राजेंद्र पाल गौतम को यूपी का प्रभारी बनाकर दलितों को तवज्जो देने की संदेश दिया है। कांग्रेस चाहती है कि दलितों का भरोसा दोबारा हासिल करने से 80 के दशक तक पार्टी की जैसी पकड़ रही वैसी स्थापित हो सकती है। बीजेपी हमेशा से दलितों को साथ लेकर चलने की कोशिश करती है, इसीलिए बीजेपी ने संगठन और सरकार में दलितों को प्रतिनिधित्व भी ठीक-ठाक दे रखा है। बीजेपी के पक्ष में दलितों को जोडऩे के लिए आरएसएस भी लंबे वक्त से काम कर रहा है। वह सरमरता के सिद्धांत पर चलता है। एक कुआं, एक श्मशान की बात आरएसएस करता है। छुआछूत समाप्त कर दलितों को मुख्य धारा में लाने के प्लान पर काम करता है। ऐसे में 2027 के चुनाव को देखते हुए बीजेपी ने अपने संगठनात्मक ढांचे में क्षेत्रीय और जातीय संतुलन का ध्यान रखा। नई नियुक्तियों में दलित को तवज्जो दी।

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