मप्र में जेन-जी किंग मेकर!

  • मिशन 2028 के लिए भाजपा-कांग्रेस का फोकस युवाओं पर

मप्र में सत्ता का फाइनल भले ही 2028 में होगा, लेकिन भाजपा और कांग्रेस ने अभी से उसकी तैयारी शुरू कर दी है। इस कड़ी में दोनों पार्टियों का फोकस 1.41 करोड़ युवा वोटरों पर है, क्योंकि प्रदेश में सरकार बनाने की भूमिका में जेेन-जी मतदाता किंग मेकर बनेंगे।

गौरव चौहान/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)।
मध्यप्रदेश में 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भाजपा और कांग्रेस ने अपनी रणनीति का फोकस पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों से आगे बढ़ाते हुए युवा वोटरों, खासकर जेन-जी को अपने राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में लाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। दोनों पार्टियों की नजर प्रदेश के करीब 1.41 करोड़ युवा मतदाताओं पर है। मध्य प्रदेश में 18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या 1,41,34,168 बताई गई है। इनमें 18 से 19 वर्ष के 11,81,747 और 20 से 29 वर्ष के 1,29,52,421 मतदाता शामिल हैं। यह संख्या प्रदेश के कुल मतदाताओं की करीब 26 प्रतिशत है। युवा मतदाताओं की इतनी बड़ी संख्या उन्हें किसी भी राजनीतिक दल के लिए महत्वपूर्ण बनाती है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस की कोशिश है कि युवाओं से सीधे संवाद कर उनके मुद्दों को समझा जाए और उन्हें पार्टी के राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाया जाए। इसी कड़ी में निवाड़ी जिले के ओरछा में आयोजित प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में पार्टी ने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने के साथ युवाओं से सीधा संवाद बढ़ाने पर जोर दिया। दिल्ली में हुए जेन-जी आंदोलन के बाद युवा वर्ग की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता को भाजपा ने गंभीरता से लिया है। पार्टी नेताओं का मानना है कि युवा अब केवल पारंपरिक राजनीतिक भाषणों और नारों से प्रभावित होने वाला वर्ग नहीं है। रोजगार, शिक्षा, तकनीक, अवसर और भविष्य की आर्थिक संभावनाएं उसके राजनीतिक निर्णय को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दे बन रहे हैं। इसी वजह से भाजपा संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर युवाओं के साथ सीधा संवाद बढ़ाने की तैयारी में है। पार्टी की रणनीति बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक युवाओं तक पहुंच बनाने की है।
2028 के विधानसभा चुनाव में पहली बार बड़ी संख्या में ऐसे युवा मतदाता प्रभावी होंगे, जिनकी राजनीतिक पसंद रोजगार, शिक्षा, तकनीक और आर्थिक अवसरों जैसे मुद्दों से तय हो सकती है। ऐसे में भाजपा के लिए युवा वर्ग को अपने साथ जोडऩा केवल चुनावी आवश्यकता नहीं बल्कि संगठनात्मक चुनौती भी है। पार्टी नेताओं ने कार्यकर्ताओं से कहा कि युवाओं की समस्याओं और अपेक्षाओं को गंभीरता से समझना होगा। साथ ही विपक्ष द्वारा युवाओं को सरकार और भाजपा के खिलाफ प्रभावित या गुमराह करने की कोशिशों का राजनीतिक स्तर पर जवाब देना होगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बैठक में आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को लेकर सरकार की योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि किसी भी राज्य को आत्मनिर्भर बनाने के लिए किसानों और युवाओं का विकास जरूरी है। सरकार गरीबों और महिलाओं के सशक्तीकरण के साथ औद्योगिक विकास पर भी जोर दे रही है। भाजपा के लिए रोजगार और निवेश का मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि युवा मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग सीधे रोजगार और आर्थिक अवसरों से जुड़ा हुआ है। पार्टी नेताओं ने ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट और रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव के जरिए प्रदेश में आए निवेश प्रस्तावों का उल्लेख करते हुए कहा कि औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
जेन-जी पर भाजपा-कांग्रेस की नजर!
मध्यप्रदेश की राजनीति में 2028 के विधानसभा चुनाव भले ही अभी दूर हों, लेकिन सियासी दलों ने उसकी तैयारी अभी से शुरू कर दी है। इस बार चुनावी रणनीति का एक बड़ा केंद्र जेन-जी यानी नई युवा पीढ़ी बनने जा रही है। मोबाइल, सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो और डिजिटल कंटेंट के दौर में पली-बढ़ी इस पीढ़ी को साधने के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अपनी-अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। दोनों दलों की मंजिल एक है—युवाओं के बीच राजनीतिक पकड़ मजबूत करना, लेकिन रास्ता अलग-अलग है। भाजपा जहां क्रद्गद्गद्यह्य, शॉर्ट वीडियो, सोशल मीडिया और डिजिटल नैरेटिव के जरिए युवाओं तक पहुंच बढ़ाने की तैयारी में है, वहीं कांग्रेस सीधे छात्रों के बीच पहुंचकर संवाद करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। यानी आने वाले समय में मध्यप्रदेश की राजनीति में एक दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल सकता है—एक तरफ मोबाइल स्क्रीन पर भाजपा की क्रद्गद्गद्यह्य और दूसरी तरफ कॉलेज कैंपस में कांग्रेस का डायरेक्ट डायलॉग। भाजपा की रणनीति में सोशल मीडिया पहले से ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है, लेकिन अब पार्टी युवा वर्ग के लिए डिजिटल रणनीति को और आक्रामक बनाने की तैयारी में दिखाई दे रही है। प्रदेश संगठन की बैठकों में सोशल मीडिया की सक्रियता बढ़ाने और युवाओं तक सरकार की योजनाओं तथा संगठन की गतिविधियों को डिजिटल माध्यमों से पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है। पार्टी का प्रयास है कि उसके नेता और कार्यकर्ता अपने-अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ज्यादा सक्रिय रहें और ऐसी सामग्री तैयार करें, जिसे युवा आसानी से देख और साझा कर सकें। इसके लिए रील्स, शॉर्ट, छोटे वीडियो, इन्फोग्राफिक्स और डिजिटल कैंपेन को प्रमुख माध्यम बनाया जा सकता है। भाजपा के सामने चुनौती यह है कि नई पीढ़ी तक सिर्फ पारंपरिक भाषण, पोस्टर और लंबी राजनीतिक सभाओं के जरिए पहुंच बनाना आसान नहीं है। जेन-जी की बड़ी आबादी के लिए मोबाइल फोन ही सूचना, मनोरंजन और राजनीतिक बहस का सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है। ऐसे में पार्टी की रणनीति है-जहां युवा मौजूद है, वहीं राजनीतिक संदेश पहुंचाया जाए।
वहीं भाजपा जहां डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी मौजूदगी मजबूत करने की तैयारी में है, वहीं कांग्रेस ने युवाओं से सीधे संवाद का रास्ता चुना है। कांग्रेस की रणनीति में छात्रों और युवाओं के बीच जाकर उनके मुद्दों को सुनना प्रमुख है। इसी कड़ी में 19 सितंबर को राहुल गांधी के इंदौर दौरे के दौरान ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम प्रस्तावित है। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्रों के शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है। राहुल गांधी छात्रों से संवाद कर उनके सवाल सुनेंगे। कांग्रेस इस कार्यक्रम के जरिए युवाओं के बीच सीधे राजनीतिक संवाद स्थापित करने की कोशिश कर रही है। पार्टी की रणनीति का फोकस सिर्फ भाषण देने पर नहीं बल्कि छात्रों की समस्याओं को सामने लाने पर हो सकता है। युवाओं के बीच बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाएं, शिक्षा, सरकारी नौकरियों, भ्रष्टाचार और भविष्य की संभावनाओं जैसे मुद्दे उठाए जाने की संभावना है। कांग्रेस के लिए युवाओं के बीच सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा रोजगार और शिक्षा हो सकता है। मध्यप्रदेश में प्रतियोगी परीक्षाओं, सरकारी भर्ती, परीक्षा प्रक्रिया, शिक्षा की गुणवत्ता और युवाओं के रोजगार से जुड़े सवाल पहले से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। कांग्रेस इन्हीं मुद्दों को एक व्यापक युवा एजेंडे में बदलने की कोशिश कर सकती है। पार्टी का संदेश यह हो सकता है कि युवा केवल चुनाव के समय वोट देने वाला वर्ग नहीं है, बल्कि सरकार से रोजगार, बेहतर शिक्षा और पारदर्शी व्यवस्था की मांग करने वाला नागरिक है। इसीलिए कांग्रेस छात्रों के बीच जाकर उनके अनुभव और समस्याएं सुनने की रणनीति पर काम कर रही है। यदि यह अभियान लगातार आगे बढ़ता है तो आने वाले समय में कॉलेज, विश्वविद्यालय और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवाओं के मुद्दे मध्यप्रदेश की चुनावी राजनीति के केंद्र में आ सकते हैं।
जेन-जी इतनी महत्वपूर्ण क्यों
दोनों दलों की रणनीति में अचानक जेन-जी की अहमियत बढऩे के पीछे कई कारण हैं। यह पीढ़ी राजनीतिक जानकारी हासिल करने के लिए पारंपरिक माध्यमों पर पूरी तरह निर्भर नहीं है। सोशल मीडिया पर कोई मुद्दा सामने आता है तो वह कुछ ही घंटों में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। युवा किसी राजनीतिक बयान को सिर्फ सुनता नहीं, उसकी तुलना दूसरे वीडियो और सूचनाओं से भी करता है। वह सवाल पूछता है, प्रतिक्रिया देता है और अपने सोशल नेटवर्क के जरिए किसी मुद्दे को आगे बढ़ाता है। इसलिए राजनीतिक दलों के सामने चुनौती केवल युवाओं को अपने पक्ष में लाने की नहीं है, बल्कि युवाओं के बीच अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने की भी है। यही वजह है कि 2028 के विधानसभा चुनाव से काफी पहले दोनों दलों ने युवा वर्ग पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है। जेन-जी की राजनीतिक पसंद को समझना दोनों दलों के लिए आसान नहीं होगा। युवा सोशल मीडिया पर राजनीतिक संदेश जरूर देखता है, लेकिन वह केवल प्रचार सामग्री से प्रभावित हो, यह जरूरी नहीं। वह रोजगार, शिक्षा, महंगाई, परीक्षा व्यवस्था, तकनीक, स्टार्टअप, करियर और अवसर जैसे वास्तविक मुद्दों पर भी सवाल करता है। यही वजह है कि आने वाले समय में राजनीतिक दलों को केवल आकर्षक वीडियो बनाने से आगे बढक़र ठोस नीतियों और परिणामों की बात करनी होगी। भाजपा के सामने चुनौती होगी कि उसकी डिजिटल पहुंच को युवाओं के वास्तविक सवालों से कैसे जोड़ा जाए। वहीं कांग्रेस के सामने चुनौती होगी कि छात्रों के साथ होने वाला संवाद केवल कार्यक्रम बनकर न रह जाए और उसे लगातार राजनीतिक अभियान में कैसे बदला जाए।
मध्यप्रदेश की राजनीति में सोशल मीडिया की भूमिका लगातार बढ़ रही है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म अब राजनीतिक संवाद के महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं। पहले किसी नेता की सभा में हजारों लोगों की मौजूदगी उसकी लोकप्रियता का संकेत मानी जाती थी। अब किसी वीडियो के व्यूज, शेयर, कमेंट और वायरल होने की क्षमता भी राजनीतिक प्रभाव का पैमाना बनती जा रही है। भाजपा इस डिजिटल बदलाव का लाभ उठाने की कोशिश कर रही है। पार्टी का संगठनात्मक नेटवर्क पहले से मजबूत है। अब इस नेटवर्क को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोडक़र युवाओं तक तेजी से पहुंचने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस के सामने चुनौती अलग है। पार्टी युवाओं के बीच अपनी पुरानी छात्र राजनीति की पकड़ को फिर मजबूत करना चाहती है। छात्रों से सीधे संवाद, कैंपस स्तर पर कार्यक्रम और युवा मुद्दों पर आंदोलन कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा बन सकते हैं। यदि बेरोजगारी, भर्ती, परीक्षा और शिक्षा जैसे मुद्दों पर कांग्रेस छात्रों के बीच लगातार मौजूद रहती है, तो वह सरकार विरोधी माहौल को युवा वर्ग के बीच मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। लेकिन केवल मुद्दे उठाना पर्याप्त नहीं होगा। युवाओं के बीच कांग्रेस को यह भी बताना होगा कि सत्ता में आने की स्थिति में वह इन समस्याओं का समाधान किस तरह करेगी। यही वह जगह होगी जहां आंदोलन की राजनीति और वैकल्पिक नीति की राजनीति के बीच अंतर दिखाई देगा।
डिजिटल पहुंच को वोट में बदलने की चुनौती
भाजपा के पास डिजिटल नेटवर्क और संगठन की ताकत है, लेकिन सोशल मीडिया की लोकप्रियता अपने आप वोट में तब्दील हो जाए, यह जरूरी नहीं। एक क्रद्गद्गद्य वायरल हो सकती है, लेकिन युवा वोटर उसी समय दूसरे राजनीतिक दल का वीडियो भी देख सकता है। जेन-जी की यही सबसे बड़ी विशेषता है-वह किसी एक राजनीतिक सूचना स्रोत तक सीमित नहीं है। इसलिए भाजपा को अपनी डिजिटल रणनीति में केवल उपलब्धियां बताने के बजाय युवाओं के सवालों का जवाब भी देना होगा। यदि युवा रोजगार पूछता है तो जवाब रोजगार के आंकड़ों और अवसरों के साथ देना होगा। यदि वह शिक्षा पर सवाल करता है तो डिजिटल कंटेंट को शिक्षा की वास्तविक स्थिति से जोडऩा होगा। कांग्रेस की रणनीति में डायरेक्ट डायलॉग आकर्षक जरूर है, लेकिन इसे लगातार बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी। 12 सितंबर का इंदौर कार्यक्रम युवाओं के बीच चर्चा पैदा कर सकता है, लेकिन उसके बाद क्या? क्या कांग्रेस छात्रों के सवालों को पार्टी के नीति दस्तावेज में शामिल करेगी? क्या युवाओं के मुद्दों पर जिला और विधानसभा स्तर पर अभियान चलाएगी? क्या कॉलेज और विश्वविद्यालयों में लगातार संवाद होगा? यही सवाल कांग्रेस की रणनीति की सफलता तय करेंगे। अगर संवाद सिर्फ एक-दो बड़े कार्यक्रमों तक सीमित रह गया तो उसका असर सीमित हो सकता है। लेकिन अगर इसे संगठनात्मक अभियान बनाया गया तो यह 2028 तक लंबी राजनीतिक जमीन तैयार कर सकता है।
मध्यप्रदेश की राजनीति में 2028 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई शुरू हो चुकी है। भाजपा चाहती है कि युवा सरकार की योजनाओं और विकास के संदेश से जुड़े। कांग्रेस चाहती है कि युवा बेरोजगारी, शिक्षा, परीक्षा, भ्रष्टाचार और रोजगार जैसे सवालों के आधार पर सरकार से जवाब मांगे। यानी दोनों पार्टियां युवा वोटर को अलग-अलग नजरिए से देख रही हैं। भाजपा का फोकस सरकार की उपलब्धियां और डिजिटल कनेक्ट। कांग्रेस का फोकस युवा मुद्दे और सीधा संवाद। आने वाले महीनों में यही अंतर और स्पष्ट हो सकता है। 2028 तक बड़ी संख्या में ऐसे युवा मतदाता चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा होंगे, जो पहली बार विधानसभा चुनाव में वोट डालेंगे या हाल ही में पहली बार मतदान कर चुके होंगे। इन युवाओं के लिए पुरानी राजनीतिक पहचान उतनी निर्णायक नहीं हो सकती जितनी उनके सामने मौजूद वर्तमान मुद्दे हैं। कौन सा दल रोजगार की बात करता है? कौन शिक्षा की बात करता है? किसकी बात सोशल मीडिया पर भरोसेमंद लगती है? कौन युवाओं की भाषा में संवाद करता है? कौन उनके सवालों का जवाब देता है? इन सवालों के जवाब चुनावी रुझानों पर असर डाल सकते हैं। आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जेन-जी किसके साथ जाएगी? क्या वह भाजपा की डिजिटल पहुंच और सरकार की योजनाओं को प्राथमिकता देगी? या फिर कांग्रेस के बेरोजगारी, शिक्षा और व्यवस्था से जुड़े सवाल उसे ज्यादा प्रभावित करेंगे? इसका जवाब अभी देना जल्दबाजी होगी। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश की राजनीति में युवा अब केवल चुनावी भाषणों में इस्तेमाल होने वाला शब्द नहीं रह गया है। 2028 के चुनाव तक दोनों पार्टियों के पास युवाओं के बीच अपनी जगह बनाने के लिए पर्याप्त समय है। इस दौरान सोशल मीडिया पर हजारों वीडियो बनेंगे, कॉलेजों में कार्यक्रम होंगे, युवा संवाद होंगे, रोजगार और शिक्षा पर बहस होगी और दोनों दल अपने-अपने नैरेटिव को मजबूत करने की कोशिश करेंगे। मध्यप्रदेश की राजनीति में आने वाले दो सालों में मुकाबला सिर्फ रैलियों और पोस्टरों का नहीं होगा। मुकाबला मोबाइल स्क्रीन, सोशल मीडिया, कॉलेज कैंपस और युवाओं के सवालों के बीच भी होगा। भाजपा का संदेश है-युवा जहां है, वहां पहुंचो। कांग्रेस का संदेश है—युवा क्या सोचता है, उसके बीच जाकर सुनो। एक तरफ क्रद्गद्गद्यह्य और स्द्धशह्म्ह्लह्य हैं, दूसरी तरफ छात्रों से सीधा संवाद। लेकिन 2028 का जेन-जी वोटर शायद दोनों से एक ही सवाल पूछेगा—मेरे भविष्य के लिए आपके पास क्या ठोस योजना है? और संभव है कि इसी सवाल का सबसे विश्वसनीय जवाब देने वाला दल मध्यप्रदेश की अगली चुनावी कहानी में बढ़त हासिल करे।
जेन-जी के लिए रील्स का सहारा
राजनीति में जनसंपर्क का तरीका बदल रहा है। पोस्टर, पर्चे, सभाओं और नुक्कड़ बैठकों के बाद अब भाजपा की नजर उस मंच पर है, जहां नई पीढ़ी अपना सबसे ज्यादा समय बिताती है मोबाइल स्क्रीन। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से शुरू होने वाले सेवा संकल्प अभियान में भाजपा ने जेन-जी तक पहुंचने के लिए रील, इन्फ्लुएंसर और डिजिटल स्टोरीटेलिंग को बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने की तैयारी की है। इस अभियान का मकसद सिर्फ सरकारी योजनाओं का प्रचार करना नहीं, बल्कि उनके असर को ऐसी कहानियों में बदलना है, जिन्हें युवा इंस्टाग्राम और यू-ट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर आसानी से देख और साझा कर सकें। यानी भाजपा का नया फॉर्मूला साफ दिखाई देता है ग्राउंड पर काम, मोबाइल पर कहानी और सोशल मीडिया पर उसका विस्तार। भाजपा ने संगठन के निचले स्तर तक डिजिटल अभियान पहुंचाने की तैयारी की है। हर शक्ति केंद्र को कम से कम 10 रील तैयार करने का लक्ष्य दिए जाने की योजना है। कार्यकर्ता अपने क्षेत्र में सरकारी योजनाओं से लाभ पाने वाले लोगों की पहचान करेंगे और उनकी कहानी कैमरे में रिकॉर्ड करेंगे। इन वीडियो में लाभार्थी का नाम, स्थान, जिला, संबंधित योजना और योजना से हुए बदलाव को प्रमुखता से दिखाया जाएगा। वीडियो को 60 सेकंड तक सीमित रखने और तय फ्रेम, हैशटैग तथा अभियान की पहचान के साथ सोशल मीडिया पर साझा करने की योजना है। यह बदलाव इसलिए भी अहम है क्योंकि भाजपा अब केवल अपने कार्यकर्ताओं से सोशल मीडिया पोस्ट कराने तक सीमित नहीं रहना चाहती। पार्टी देशभर के डिजिटल क्रिएटर्स और इन्फ्लुएंसर्स को भी अभियान से जोडऩे की तैयारी कर रही है।
अभियान में डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स को ऐसे स्थानों पर ले जाने का प्रस्ताव है, जहां सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों से बदलाव का दावा किया जा रहा है। यहां क्रिएटर स्थानीय लोगों से बातचीत करेंगे, मौके को देखेंगे और फिर अपने अनुभव के आधार पर वीडियो तैयार करेंगे। इसके लिए राज्यों से ऐसे स्थानों की सूची मांगी जाएगी जहां इंफ्रास्ट्रक्चर, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, रोजगार, अवसर या जनजीवन में बदलाव दिखाई देता हो। राष्ट्रीय स्तर पर करीब 50 प्रमुख स्थलों को चुने जाने का प्रस्ताव है। यानी पार्टी की कोशिश यह है कि सरकारी दावों को सिर्फ नेताओं के भाषण के जरिए नहीं, बल्कि उन स्थानों पर जाकर डिजिटल क्रिएटर्स की नजर से दिखाया जाए। डिजिटल अभियान की शुरुआत सिर्फ सोशल मीडिया से नहीं होगी। 17 सितंबर की शाम ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम के जरिए बूथ स्तर तक संपर्क अभियान चलाने की तैयारी है। कार्यकर्ता लाभार्थियों और आम लोगों के घरों तक जाएंगे और दीप जलाने के लिए प्रेरित करेंगे। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 25 साल की जनसेवा के प्रति आभार तथा विकसित भारत 2047 के संकल्प से जोड़ा गया है। दीप जलाने के बाद इसकी फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर प्तआशीर्वाद_का_दीया के साथ साझा करने की योजना है।
कांग्रेस संगठन में युवा नदारद
मध्य प्रदेश में 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच कांग्रेस ने अपना फोकस प्रदेश के युवा मतदाताओं पर बढ़ा दिया है। 19 सितंबर को इंदौर में राहुल गांधी के प्रस्तावित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को इसी रणनीति की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। कांग्रेस के मुताबिक कार्यक्रम में करीब 50 हजार जेन-जी युवा शामिल होंगे और 30 वर्ष से कम उम्र के युवाओं को प्रवेश दिया जाएगा। लेकिन कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल सिर्फ युवाओं को कार्यक्रम में जुटाने का नहीं, बल्कि उन्हें पार्टी की राजनीति और संगठन से जोडऩे का है। प्रदेश में 1.41 करोड़ से अधिक युवा मतदाता हैं और 18 से 19 वर्ष आयु वर्ग के ही 11.81 लाख से ज्यादा मतदाता हैं। ऐसे में कांग्रेस की नजर जिस बड़े युवा वोट बैंक पर है, उसके सामने पार्टी के भीतर युवाओं की भागीदारी खुद एक चुनौती बनकर खड़ी है। कांग्रेस राहुल गांधी के इंदौर दौरे को केवल एक सभा तक सीमित रखने के बजाय इसे व्यापक छात्र अभियान में बदलने की तैयारी में है। पार्टी पेपर लीक, परीक्षा और भर्ती में कथित अनियमितता, बेरोजगारी और शिक्षा के व्यावसायीकरण जैसे मुद्दों पर युवाओं से संवाद करेगी। इसके बाद शहरों, कस्बों, विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और प्रतियोगी परीक्षा केंद्रों तक ‘छात्रों की गूंज’ अभियान ले जाने की योजना है। यानी कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई दे रही है-युवा मतदाताओं की नाराजगी को राजनीतिक मुद्दों में बदलना और उसे 2028 के चुनावी अभियान से जोडऩा।
इंदौर का आयोजन सिर्फ शहरी युवाओं तक सीमित नहीं रहने वाला है। कांग्रेस मालवा-निमाड़ के आदिवासी बहुल क्षेत्रों तक भी इसका राजनीतिक संदेश पहुंचाना चाहती है। धार, रतलाम, खंडवा, आलीराजपुर और झाबुआ जैसे क्षेत्रों में आदिवासी मतदाताओं के साथ जयस का प्रभाव भी कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण है। प्रदेश की करीब 82 विधानसभा सीटों पर आदिवासी समुदाय का प्रभाव माना जाता है। इसके साथ किसानों को भी संदेश देने की कोशिश होगी। ऐसे में राहुल गांधी का इंदौर दौरा कांग्रेस के लिए युवा, आदिवासी और किसान—तीनों वर्गों को साधने की कवायद बनता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस की रणनीति के सामने सबसे बड़ी कमजोरी उसका अपना संगठन है। पार्टी युवाओं को राजनीति में आगे लाने का संदेश देने जा रही है, लेकिन मौजूदा संगठनात्मक तस्वीर इस दावे को चुनौती देती है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक कांग्रेस की ओर से 40 साल से कम उम्र के गिने-चुने ही जनप्रतिनिधि और पार्टी पदाधिकारी हैं। यही वजह है कि युवाओं के बीच राहुल गांधी का संवाद सफल होने के बावजूद उसे स्थायी राजनीतिक समर्थन में बदलना आसान नहीं होगा। सवाल यह है कि कार्यक्रम में जुटने वाला युवा क्या सिर्फ श्रोता रहेगा या उसे संगठन में भूमिका भी मिलेगी? कांग्रेस के लिए युवा वोटरों पर दांव इसलिए भी अहम है क्योंकि 2018 में 114 विधानसभा सीटें जीतने वाली पार्टी 2023 के चुनाव में घटकर 66 सीटों पर आ गई थी। अब 2028 की तैयारी में पार्टी नए सामाजिक और आयु वर्गों को जोडऩे की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी का इंदौर दौरा इसी बदलाव की परीक्षा भी होगा। कांग्रेस के सामने चुनौती 50 हजार युवाओं की भीड़ जुटाने से ज्यादा 1.41 करोड़ युवा मतदाताओं के बीच भरोसा बनाने की है। अगर ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम संवाद से आगे जाकर संगठन में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने में सफल होता है, तभी इसे 2028 की चुनावी रणनीति की मजबूत शुरुआत माना जाएगा।

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