अब जिले से दुनिया तक पहुंचेगा मप्र का कारोबार

  • मोहन ‘राज’ की नई औद्योगिक रणनीति

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मप्र में औद्योगिक विकास की जो रणनीति बनाई है उसका असर दिखने लगा है। मध्यप्रदेश की औद्योगिक नीति अब बड़े शहरों और बड़े निवेश तक सीमित रहने के बजाय जिलों में तैयार होने वाले स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोडऩे की दिशा में बढ़ रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रदेश के नाम संदेश में औद्योगिक कॉरिडोर विकसित करने के साथ जिलों के उत्पादों के निर्यात के लिए नई कार्ययोजना तैयार करने की घोषणा की है। इसका मकसद छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में बनने वाले उत्पादों को केवल स्थानीय बाजार तक सीमित रखने के बजाय उन्हें बड़े व्यापारिक केंद्रों, निर्यात हब और वैश्विक बाजार तक पहुंचाना है।

गौरव चौहान/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)।
मध्यप्रदेश अब औद्योगिक विकास की अपनी रणनीति को केवल बड़े निवेश, बड़े उद्योग और बड़े शहरों तक सीमित रखने के बजाय गांवों और छोटे जिलों में तैयार होने वाले स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाजार से जोडऩे की दिशा में आगे बढ़ रहा है। स्वतंत्रता दिवस पर लाल परेड ग्राउंड से प्रदेश के नाम संदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने औद्योगिक कॉरिडोर विकसित करने के साथ ही जिलों के उत्पादों के निर्यात के लिए नई कार्ययोजना तैयार करने की घोषणा की है। सरकार का फोकस अब उत्पादन से आगे बढक़र उत्पादन, कनेक्टिविटी, बाजार और निर्यात की पूरी श्रृंखला तैयार करने पर है। इस रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा औद्योगिक कॉरिडोर होगा। सरकार भोपाल और इंदौर को पहले ही मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के रूप में अधिसूचित कर चुकी है। अब इन दोनों बड़े आर्थिक केंद्रों को औद्योगिक गतिविधियों के व्यापक नेटवर्क से जोडऩे की तैयारी है। इसके साथ भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और उज्जैन को नए रिंग रोड नेटवर्क से जोडऩे का काम भी जारी है। सरकार का मानना है कि बेहतर सडक़ कनेक्टिविटी से औद्योगिक क्षेत्रों तक माल पहुंचाने का समय और लागत दोनों कम होंगे और छोटे शहरों में तैयार होने वाले उत्पादों को बड़े बाजारों तथा निर्यात केंद्रों तक पहुंचाना आसान होगा। यह रणनीति केवल उद्योग तक सीमित नहीं है। इसके साथ युवा वर्ष 2027, स्टार्टअप, कौशल विकास, रोजगार, ग्रीन एनर्जी, कृषि, पर्यटन और सार्वजनिक परिवहन को भी जोड़ा गया है। यानी सरकार प्रदेश की अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों को एक-दूसरे से जोडक़र रोजगार और निवेश का नया मॉडल तैयार करना चाहती है। मध्यप्रदेश के कई जिलों में ऐसे उत्पाद तैयार होते हैं जिनकी पहचान स्थानीय स्तर पर तो मजबूत है, लेकिन बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक उनकी पहुंच सीमित है। स्थानीय हस्तशिल्प, कृषि आधारित उत्पाद, खाद्य प्रसंस्करण, वन उत्पाद, पारंपरिक वस्तुएं और छोटे उद्योगों के उत्पादों को अब निर्यात से जोडऩे की योजना बनाई जा रही है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि प्रदेश के विभिन्न जिलों में ऐसे अनेक उत्पाद तैयार होते हैं, जिनमें वैश्विक बाजार में जगह बनाने की क्षमता है। इन उत्पादों को ग्लोबल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने के लिए नई कार्ययोजना तैयार की जाएगी। इसका अर्थ केवल उत्पादों को दूसरे देशों में भेजना नहीं है। इसके लिए उत्पादन की गुणवत्ता, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, प्रमाणन, लॉजिस्टिक्स, बाजार की मांग और निर्यात प्रक्रिया को भी व्यवस्थित करना होगा। सरकार की नई रणनीति की सफलता इसी बात पर निर्भर करेगी कि स्थानीय उत्पादक को केवल उत्पादन करने वाला व्यक्ति न मानकर उसे वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बनाया जाए। छोटे जिले यदि बड़े शहरों के उत्पादन केंद्रों से जुड़ते हैं और वहां से उत्पाद बंदरगाहों, एयर कार्गो तथा अन्य निर्यात केंद्रों तक पहुंचते हैं, तो स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी इसका सीधा लाभ मिल सकता है।

औद्योगिक कॉरिडोर बनेगा नई रणनीति की रीढ़
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि औद्योगिक निवेश को कुछ चुनिंदा शहरों से बाहर कैसे फैलाया जाए। भोपाल और इंदौर जैसे शहर पहले ही औद्योगिक और कारोबारी गतिविधियों के बड़े केंद्र बन चुके हैं। अब इनकी क्षमता का इस्तेमाल आसपास के जिलों और छोटे शहरों के विकास के लिए करने की तैयारी है। औद्योगिक कॉरिडोर इसी सोच का हिस्सा है। भोपाल और इंदौर को मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र का दर्जा दिए जाने के बाद अब इन्हें औद्योगिक गतिविधियों के बड़े नेटवर्क से जोडऩे की दिशा में काम किया जा रहा है। वहीं ग्वालियर, जबलपुर और उज्जैन जैसे शहरों को भी बेहतर सडक़ नेटवर्क से जोडऩे पर जोर है। सरकार का अनुमान है कि बेहतर कनेक्टिविटी के कारण उद्योगों के लिए कच्चा माल लाना और तैयार माल को बाजार तक पहुंचाना आसान होगा। परिवहन की लागत घटेगी तो प्रदेश में उत्पादन की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी बढ़ सकती है। औद्योगिक कॉरिडोर के साथ रिंग रोड नेटवर्क को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे शहरों के भीतर भारी वाहनों का दबाव कम करने में मदद मिलेगी। उद्योगों को शहर के बाहरी हिस्सों और प्रमुख परिवहन मार्गों से जोडऩा लॉजिस्टिक्स के लिहाज से महत्वपूर्ण होगा।
सरकार औद्योगिक विस्तार की आधारभूत जरूरत के रूप में सडक़ नेटवर्क को देख रही है। मुख्यमंत्री ने ढाई साल में करीब 15 हजार किलोमीटर सडक़ निर्माण का दावा किया है। यदि औद्योगिक क्षेत्रों, उत्पादन केंद्रों और बाजारों को बेहतर सडक़ नेटवर्क मिलता है तो इसका फायदा केवल बड़े उद्योगों को नहीं बल्कि छोटे और मध्यम उद्योगों को भी मिलेगा। स्थानीय उत्पादों को जिला स्तर से राज्य और राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने में परिवहन सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। निर्यात की स्थिति में यह महत्व और बढ़ जाता है। किसी उत्पाद की उत्पादन लागत कम होने के बावजूद यदि उसे बाजार तक पहुंचाने में अत्यधिक परिवहन लागत लगती है तो वह अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पीछे रह सकता है। इसलिए औद्योगिक कॉरिडोर की सफलता केवल सडक़ बनाने से नहीं, बल्कि सडक़, औद्योगिक क्षेत्र, वेयरहाउस, लॉजिस्टिक्स, बिजली, बाजार और निर्यात सुविधा को एक साथ विकसित करने से तय होगी। मध्यप्रदेश में अब तक 34 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव मिलने की बात सरकार ने कही है। इनमें करीब 10 लाख करोड़ रुपये के निवेश जमीन पर उतरने का दावा किया गया है। यह आंकड़ा सरकार के लिए बड़ा अवसर भी है और चुनौती भी। निवेश प्रस्ताव और वास्तविक निवेश के बीच का अंतर बताता है कि निवेश आकर्षित करने के साथ उसे वास्तविक परियोजनाओं में बदलना भी जरूरी है। जमीन, बिजली, पानी, पर्यावरणीय अनुमति, सडक़, लॉजिस्टिक्स, स्थानीय स्वीकृतियां और कुशल श्रम जैसी जरूरतों को समय पर पूरा करना होगा। सरकार की नई औद्योगिक रणनीति में अब निवेश प्रस्तावों को रोजगार और निर्यात क्षमता से जोडऩे का प्रयास दिखाई देता है। यानी केवल कितनी राशि का निवेश आया, यह पर्याप्त नहीं होगा। यह भी देखना होगा कि उससे कितने उद्योग लगे, कितने लोगों को रोजगार मिला और कितना उत्पादन बाजार तक पहुंचा। प्रदेश में विनिर्माण इकाइयों की संख्या 3.44 लाख से अधिक होने और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से करीब 33.80 लाख युवाओं को रोजगार मिलने का दावा किया गया है। बड़ी औद्योगिक इकाइयों से करीब 50 हजार युवाओं को रोजगार मिलने की बात भी सामने आई है। अब चुनौती इन आंकड़ों को अगले स्तर तक ले जाने की है।

भोपाल में इंजीनियरिंग सेक्टर का नया केंद्र
राजधानी भोपाल को औद्योगिक रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका देने की तैयारी है। यहां इंजीनियरिंग क्षेत्र के लिए करीब 30 करोड़ रुपये की लागत से नया केंद्र स्थापित किया जा रहा है। यह केंद्र उद्योगों की जरूरत के मुताबिक तकनीकी क्षमता, प्रशिक्षण और नवाचार को बढ़ावा देने में उपयोगी हो सकता है। यदि इसे औद्योगिक इकाइयों, तकनीकी संस्थानों और स्टार्टअप से जोड़ा जाता है तो भोपाल में इंजीनियरिंग आधारित उद्योगों के लिए नया इकोसिस्टम विकसित हो सकता है। सरकार वर्ष 2027 में ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट भोपाल में आयोजित करने की तैयारी भी कर रही है। ऐसे में राजधानी में उद्योग, तकनीक और निवेश से जुड़ी सुविधाओं को मजबूत करने का प्रयास बड़े निवेशकों को आकर्षित करने की रणनीति का हिस्सा है। निवेश प्रस्तावों को जमीन पर उतारने के साथ सरकार की नजर नए निवेश पर भी है। वर्ष 2027 में भोपाल में ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट आयोजित करने की तैयारी है। समिट का लक्ष्य केवल निवेश प्रस्ताव जुटाना नहीं बल्कि ऐसे निवेश आकर्षित करना होना चाहिए जो प्रदेश की औद्योगिक प्राथमिकताओं से मेल खाते हों। मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य प्रसंस्करण, ऑटोमोबाइल, नवीकरणीय ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स और निर्यात आधारित उद्योगों में निवेश प्रदेश के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकता है। यदि निवेश को औद्योगिक कॉरिडोर से जोड़ा जाता है तो इसके परिणाम छोटे शहरों तक पहुंच सकते हैं। औद्योगिक रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा स्टार्टअप और इनक्यूबेशन सेंटर हैं। प्रदेश में फिलहाल करीब 8 हजार स्टार्टअप संचालित होने की जानकारी दी गई है, जिनमें लगभग आधे का नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं। सरकार अगले ढाई साल में 12 हजार नए स्टार्टअप शुरू कराने और 100 नए इनक्यूबेशन सेंटर स्थापित करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। यदि इन इनक्यूबेशन सेंटरों को जिलों के स्थानीय उत्पादों से जोड़ा जाता है तो नई तकनीक और स्थानीय कारोबार के बीच एक नया संबंध बन सकता है। उदाहरण के तौर पर पैकेजिंग, ई-कॉमर्स, डिजिटल मार्केटिंग, सप्लाई चेन, डिजाइन और निर्यात से जुड़े स्टार्टअप छोटे उत्पादकों के लिए बाजार का रास्ता खोल सकते हैं।

स्टार्टअप से छोटे शहरों तक पहुंचेगा नया उद्योग
सरकार की औद्योगिक रणनीति का दूसरा बड़ा आधार स्टार्टअप इकोसिस्टम है। प्रदेश में करीब आठ हजार स्टार्टअप संचालित होने की जानकारी दी गई है। इनमें करीब 50 प्रतिशत का नेतृत्व महिलाओं द्वारा किए जाने की बात कही गई है। अगले ढाई साल में 12 हजार नए स्टार्टअप शुरू कराने और 100 नए इन्क्यूबेशन सेंटर स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। यदि इन्क्यूबेशन सेंटर केवल भोपाल और इंदौर तक सीमित न रहकर छोटे शहरों और विश्वविद्यालयों तक पहुंचते हैं तो प्रदेश में स्टार्टअप संस्कृति का विस्तार हो सकता है। इसका औद्योगिक कॉरिडोर से सीधा संबंध भी बन सकता है। स्थानीय समस्याओं पर आधारित स्टार्टअप परिवहन, कृषि, पैकेजिंग, ई-कॉमर्स, सप्लाई चेन, ग्रामीण उद्योग और निर्यात से जुड़े समाधान विकसित कर सकते हैं। यानी भविष्य का औद्योगिक कॉरिडोर केवल कारखानों की कतार नहीं बल्कि स्टार्टअप, तकनीक और उत्पादन का नेटवर्क भी हो सकता है।
मुख्यमंत्री ने 2027 को युवा वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा की है। इसके लिए सात स्तंभों पर आधारित रोडमैप तैयार किया गया है। इसमें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास, उद्यमिता और स्वरोजगार, सरकारी एवं निजी क्षेत्र में रोजगार, स्टार्टअप सहयोग, खेल-कला-संस्कृति, शोध एवं अनुसंधान तथा नेतृत्व क्षमता विकास को शामिल किया गया है। औद्योगिक रणनीति के संदर्भ में यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उद्योगों को केवल जमीन और बिजली की जरूरत नहीं होती। उन्हें प्रशिक्षित मानव संसाधन भी चाहिए। यदि प्रदेश में उद्योगों की संख्या बढ़ती है लेकिन स्थानीय युवाओं के पास आवश्यक कौशल नहीं होता तो रोजगार के अवसरों का बड़ा हिस्सा बाहर के श्रमिकों को मिल सकता है। इसलिए कौशल विकास और उद्योगों की जरूरत के बीच सीधा तालमेल जरूरी होगा। सरकार का लक्ष्य युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला बनाने पर भी है।

कृषि को उद्योग और बाजार से जोडऩे की कोशिश
औद्योगिक विकास के साथ कृषि क्षेत्र को भी नई रणनीति का हिस्सा बनाया गया है। सरकार अधिग्रहित भूमि के लिए चार गुना मुआवजा, उपार्जन की गारंटी और डिफाल्टर किसानों के लिए कवच योजना जैसी पहलों का उल्लेख कर रही है। ढाई साल में किसानों के खातों में करीब तीन लाख करोड़ रुपये ट्रांसफर किए जाने का दावा किया गया है। सिंचाई का रकबा बढ़ाकर 100 लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य रखा गया है। दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रतिदिन 12 लाख लीटर दूध खरीदी का लक्ष्य, लखपति गोपालक दीदी योजना और मछली पालन को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया है। कृषि क्षेत्र को औद्योगिक रणनीति से जोडऩे का सबसे बड़ा अवसर खाद्य प्रसंस्करण में है। यदि जिलों में कृषि उत्पादन के आसपास प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित होती हैं तो किसान को कच्चे माल की बजाय मूल्यवर्धित उत्पाद का लाभ मिल सकता है। यही उत्पाद आगे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच सकते हैं। औद्योगिक विकास के लिए ऊर्जा सबसे महत्वपूर्ण आधार है। सरकार ने गर्मी के दौरान अधिकतम मांग के समय करीब 21 हजार मेगावाट बिजली उपलब्ध कराने का उल्लेख किया है। प्रदेश के कुल बिजली उत्पादन में ग्रीन एनर्जी की हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत बताई गई है, जिसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य है। सौर ऊर्जा उत्पादन के साथ अब उसके भंडारण पर भी जोर दिया जा रहा है। औद्योगिक निवेशकों के लिए यह महत्वपूर्ण है। भविष्य में कंपनियां उत्पादन के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन कम करने पर भी ध्यान दे रही हैं। ऐसे में नवीकरणीय ऊर्जा की पर्याप्त उपलब्धता मध्यप्रदेश को ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दे सकती है। यदि औद्योगिक कॉरिडोर के आसपास सौर ऊर्जा और स्टोरेज की सुविधाएं विकसित की जाती हैं तो उद्योगों को भरोसेमंद और अपेक्षाकृत स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराई जा सकती है। औद्योगिक और शहरी विस्तार के बीच सार्वजनिक परिवहन की जरूरत भी बढ़ेगी। मुख्यमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के संदेश में सरकारी लोक परिवहन सेवा जल्द शुरू करने की बात दोहराई है। इंदौर से इसकी शुरुआत प्रस्तावित है। करीब 40 मार्ग अधिसूचित किए जा चुके हैं, लेकिन विभिन्न अड़चनों के कारण सेवा शुरू नहीं हो पाई। औद्योगिक कॉरिडोर विकसित होने के साथ यदि शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों के बीच सार्वजनिक परिवहन मजबूत नहीं हुआ तो कर्मचारियों की आवाजाही एक बड़ी समस्या बन सकती है। इसलिए औद्योगिक नीति और सार्वजनिक परिवहन को अलग-अलग देखने के बजाय दोनों को एक ही आर्थिक विकास मॉडल का हिस्सा बनाना होगा। मध्यप्रदेश में पिछले साल करीब 14 करोड़ पर्यटकों के आने का दावा किया गया है। सरकार पर्यटन को रोजगार और अर्थव्यवस्था के बड़े क्षेत्र के रूप में विकसित करने पर जोर दे रही है। उड़ान योजना के तहत पांच नए एयरपोर्ट मिलने की बात कही गई है। इंदौर से अबूधाबी के लिए सीधी उड़ान शुरू हो चुकी है और भोपाल से शारजाह के लिए सीधी उड़ान शुरू करने की तैयारी है। बेहतर एयर कनेक्टिविटी का लाभ पर्यटन के साथ व्यापार और निर्यात को भी मिल सकता है। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की संख्या बढऩे से कारोबारी यात्राएं आसान होंगी और प्रदेश के निवेशकों तथा निर्यातकों की वैश्विक बाजार तक पहुंच बेहतर हो सकती है।

स्वास्थ्य और मानव संसाधन पर भी निवेश
औद्योगिक विकास के साथ सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में भी विस्तार की योजना बता रही है। तीन महीने में एक हजार नए डॉक्टरों की नियुक्ति की जानकारी दी गई है और अगले छह महीने में इतने ही और डॉक्टर नियुक्त करने का लक्ष्य बताया गया है। नए मेडिकल कॉलेज खोलने, चिकित्सा शिक्षा का विस्तार करने और आयुर्वेदिक कॉलेजों की संख्या बढ़ाने की योजना भी है। औद्योगिक निवेश के लिए किसी भी प्रदेश की सबसे बड़ी ताकत उसका मानव संसाधन होता है। स्वास्थ्य, शिक्षा और कौशल की बेहतर व्यवस्था उद्योगों के लिए आकर्षक वातावरण तैयार करती है। युवा वर्ग के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मामलों के शीघ्र निराकरण के लिए चार फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने की घोषणा भी की गई है। भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवाद लंबे समय तक चलते हैं तो इसका सीधा असर युवाओं के भविष्य और सरकारी विभागों में रिक्तियों पर पड़ता है। ऐसे मामलों के तेजी से निराकरण से भर्ती प्रक्रिया को गति मिल सकती है। यह पहल सरकार की व्यापक रोजगार रणनीति से जुड़ी हुई है। मध्यप्रदेश की नई विकास रणनीति का दायरा बड़ा है। औद्योगिक कॉरिडोर, निवेश, निर्यात, सडक़ नेटवर्क, स्टार्टअप, युवा वर्ष, कृषि, ग्रीन एनर्जी, पर्यटन और सार्वजनिक परिवहन—इन सभी को एक साथ जोडक़र सरकार प्रदेश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की कोशिश कर रही है। लेकिन इस पूरी रणनीति की असली परीक्षा अब क्रियान्वयन के स्तर पर होगी। सबसे पहली चुनौती निवेश प्रस्तावों को वास्तविक उद्योगों में बदलने की है। दूसरी चुनौती छोटे जिलों के उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार के मानकों के अनुरूप तैयार करने की है। इसके लिए गुणवत्ता, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, प्रमाणन और निर्यात संबंधी सुविधाएं जिला स्तर तक पहुंचानी होंगी। तीसरी चुनौती लॉजिस्टिक्स की लागत घटाने की है। औद्योगिक कॉरिडोर और रिंग रोड तभी प्रभावी होंगे जब वे उत्पादन केंद्रों को बाजार, वेयरहाउस, रेलवे, एयरपोर्ट और निर्यात केंद्रों से जोड़ेंगे। चौथी चुनौती स्थानीय युवाओं को रोजगार योग्य बनाने की है। उद्योगों की जरूरत के अनुसार कौशल प्रशिक्षण नहीं हुआ तो निवेश और रोजगार के बीच अपेक्षित तालमेल नहीं बन पाएगा।

तीन स्तरों पर बदलेगी मप्र की अर्थव्यवस्था
सरकार की वर्तमान घोषणाओं को एक साथ देखा जाए तो प्रदेश की विकास रणनीति तीन स्तरों पर आगे बढ़ती दिखाई देती है। पहला स्तर-स्थानीय उत्पादन। छोटे जिलों और स्थानीय उद्योगों की उत्पादन क्षमता बढ़ाना। दूसरा स्तर-कनेक्टिविटी। औद्योगिक कॉरिडोर, रिंग रोड, सडक़, एयर कनेक्टिविटी और सार्वजनिक परिवहन के जरिए उत्पादन केंद्रों को बड़े बाजारों से जोडऩा। तीसरा स्तर-वैश्विक बाजार। स्थानीय उत्पादों को गुणवत्ता, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और निर्यात सुविधा के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाना। इसके समानांतर स्टार्टअप और युवा वर्ष जैसी योजनाएं नई पीढ़ी को इस आर्थिक ढांचे से जोडऩे का काम कर सकती हैं। ग्रीन एनर्जी औद्योगिक उत्पादन की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का आधार बन सकती है, जबकि पर्यटन और एयर कनेक्टिविटी सेवा क्षेत्र में रोजगार बढ़ा सकती है। मध्यप्रदेश की नई औद्योगिक रणनीति का सबसे बड़ा बदलाव यही हो सकता है कि विकास का केंद्र केवल भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और उज्जैन जैसे बड़े शहर न रहें। यदि स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाजार से जोडऩे की योजना वास्तव में जिला स्तर तक पहुंचती है तो छोटे शहर और ग्रामीण क्षेत्र भी निर्यात अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं। किसी जिले का स्थानीय उत्पाद यदि गुणवत्ता और पैकेजिंग के अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरता है, उसे डिजिटल बाजार मिलता है, परिवहन लागत कम होती है और निर्यात की प्रक्रिया आसान बनाई जाती है तो वह स्थानीय रोजगार का बड़ा स्रोत बन सकता है। यही वह बिंदु है जहां औद्योगिक कॉरिडोर और निर्यात कार्ययोजना एक-दूसरे से जुड़ते हैं। एक तरफ बड़े उद्योगों के लिए निवेश और उत्पादन का ढांचा तैयार होगा, दूसरी तरफ छोटे उद्योगों और स्थानीय उत्पादकों को बाजार मिलेगा। बीच में सडक़, रिंग रोड, लॉजिस्टिक्स, एयर कनेक्टिविटी और डिजिटल प्लेटफॉर्म की कड़ी होगी। यदि यह मॉडल सफल होता है तो मध्यप्रदेश की औद्योगिक कहानी केवल बड़े निवेश की कहानी नहीं रहेगी। यह छोटे जिलों के उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने और स्थानीय रोजगार को वैश्विक मांग से जोडऩे की कहानी बन सकती है। फिलहाल सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि 34 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव, 15 हजार किलोमीटर सडक़ निर्माण, औद्योगिक कॉरिडोर, 12 हजार नए स्टार्टअप, 100 इन्क्यूबेशन सेंटर और निर्यात कार्ययोजना जैसे बड़े लक्ष्यों को अलग-अलग योजनाओं के बजाय एक एकीकृत आर्थिक नेटवर्क में बदला जाए। यही नेटवर्क आने वाले वर्षों में यह तय करेगा कि मध्यप्रदेश केवल निवेश आकर्षित करने वाला राज्य बनता है या वास्तव में उत्पादन से निर्यात और स्थानीय अर्थव्यवस्था से वैश्विक बाजार तक पहुंच बनाने वाला औद्योगिक राज्य। अब तक औद्योगिक निवेश की चर्चा मुख्य रूप से बड़े शहरों और स्थापित औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास होती रही है। नई रणनीति का फोकस छोटे जिलों की उत्पादन क्षमता को आर्थिक गतिविधियों की मुख्यधारा में लाने पर है।
सरकार का मानना है कि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कच्चे माल, पारंपरिक कौशल और छोटे उद्योगों को यदि बेहतर बाजार मिल जाए तो इन क्षेत्रों में रोजगार और आय दोनों बढ़ सकते हैं। इसके लिए स्थानीय उत्पादों को बड़े शहरों में मौजूद प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स केंद्रों से जोडऩा होगा। इससे छोटे उत्पादकों को सीधे बड़े बाजार तक पहुंचने का रास्ता मिल सकता है। उदाहरण के तौर पर किसी जिले में तैयार होने वाला कृषि या हस्तशिल्प उत्पाद स्थानीय स्तर पर तैयार होने के बाद भोपाल या इंदौर जैसे बड़े केंद्र तक पहुंच सकता है। वहां उसकी पैकेजिंग, ब्रांडिंग और गुणवत्ता प्रमाणन के बाद उसे देश के अन्य हिस्सों या निर्यात बाजार में भेजा जा सकता है। सरकार की इस रणनीति में औद्योगिक कॉरिडोर को सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। औद्योगिक कॉरिडोर केवल उद्योग लगाने के लिए जमीन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होगा, बल्कि इसके साथ सडक़, परिवहन, लॉजिस्टिक्स, बाजार और उत्पादन केंद्रों की कनेक्टिविटी को मजबूत करने का प्रयास होगा। भोपाल और इंदौर को पहले ही मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया जा चुका है। अब इन दोनों बड़े आर्थिक केंद्रों को व्यापक औद्योगिक नेटवर्क से जोडऩे की दिशा में काम किया जा रहा है। इसके साथ भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और उज्जैन को नए रिंग रोड नेटवर्क से जोडऩे की योजनाएं भी चल रही हैं। सरकार का तर्क है कि बेहतर सडक़ संपर्क से माल की आवाजाही तेज होगी और परिवहन लागत कम होगी। यही नेटवर्क आगे चलकर छोटे जिलों के उत्पादों को बड़े बाजारों और निर्यात केंद्रों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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