26 जिलों के देसी श्रीअन्न का बनेगा जर्मप्लाज्म बैंक

  • मप्र में आदिवासियों और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की कवायद

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर सरकार वर्ष 2026 को कृषि कल्याण वर्ष के रूप में मना रही है। इसके पीछे सरकार की कोशिश है कि किसानों को आत्मनिर्भर बनाया जाए। इसी कड़ी में आदिवासियों को भी आत्मनिर्भर बनाने के लिए 26 जिलों के देसी श्रीअन्न का जर्मप्लाज्म बैंक बनाने की पहल की गई है। राज्य सरकार ने परियोजना के लिए 25 लाख रुपए दिए हैं।

बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)।
मध्यप्रदेश अब श्रीअन्न यानी मोटे अनाज की खेती को केवल पारंपरिक कृषि के दायरे में रखने के बजाय इसे वैज्ञानिक अनुसंधान और भविष्य की खेती की जरूरतों से जोडऩे की तैयारी में है। प्रदेश के 26 जिलों से श्रीअन्न की प्रमुख फसलों के स्थानीय और पारंपरिक बीजों का जर्मप्लाज्म तैयार किया जाएगा। इस संग्रह में ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी, सांवा, कंगनी और चीना जैसी फसलों की किस्मों को शामिल किया जाएगा। इस परियोजना का मकसद केवल पुराने बीजों को सुरक्षित रखना नहीं है, बल्कि उनमें मौजूद उन कृषि गुणों की पहचान करना है, जो बदलते मौसम, कम पानी और सीमित सिंचाई की परिस्थितियों में खेती को अधिक टिकाऊ बना सकते हैं। वैज्ञानिक परीक्षणों के जरिए यह देखा जाएगा कि किन स्थानीय किस्मों में कम पानी में बेहतर उत्पादन, स्थानीय जलवायु के अनुरूप ढलने, प्रतिकूल परिस्थितियों को सहने और उत्पादन क्षमता बनाए रखने जैसे गुण मौजूद हैं। राज्य सरकार ने इस परियोजना के लिए राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय को 25 लाख रुपए का अनुदान दिया है। इस राशि का इस्तेमाल जर्मप्लाज्म के संग्रहण, संरक्षण, परीक्षण और उससे जुड़े अनुसंधान कार्यों में किया जाएगा। परियोजना के जरिए प्रदेश के अलग-अलग कृषि क्षेत्रों में उपलब्ध श्रीअन्न की जैव विविधता को एक जगह वैज्ञानिक आधार पर दर्ज करने की कोशिश होगी।
मध्यप्रदेश के कई आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में श्रीअन्न की खेती लंबे समय से स्थानीय कृषि व्यवस्था का हिस्सा रही है। खासकर ऐसे क्षेत्रों में, जहां सिंचाई के संसाधन सीमित हैं और बारिश पर खेती की निर्भरता अधिक है, वहां किसान कम पानी वाली फसलों के रूप में ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी और सांवा जैसी फसलों का इस्तेमाल करते रहे हैं। इन इलाकों में पीढिय़ों से संरक्षित देसी बीज केवल एक कृषि परंपरा नहीं हैं, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित प्राकृतिक संसाधन भी हैं। समय के साथ इन बीजों में मिट्टी, वर्षा, तापमान और खेती की स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक कई ऐसे गुण विकसित हुए हैं, जो आधुनिक कृषि अनुसंधान के लिए उपयोगी हो सकते हैं। इसी संभावना को देखते हुए विश्वविद्यालय अब इन स्थानीय बीजों को वैज्ञानिक नजरिए से जांचेगा। अलग-अलग जिलों से एकत्र किए गए नमूनों का परीक्षण कर यह पता लगाया जाएगा कि कौन-सी किस्म में कौन-सा गुण बेहतर है। इसके बाद उपयोगी गुणों वाली प्रजातियों को आगे के अनुसंधान और प्रजनन कार्यक्रम में शामिल किया जा सकेगा। इस प्रक्रिया का अंतिम लक्ष्य ऐसी नई या बेहतर किस्मों का विकास करना है, जो किसानों को कम पानी में भी अच्छी उपज दे सकें और स्थानीय जलवायु के अनुरूप बेहतर प्रदर्शन करें।
झाबुआ-अलीराजपुर पर विशेष फोकस
जर्मप्लाज्म संग्रह में झाबुआ और अलीराजपुर को प्राथमिकता दी जा रही है। इन दोनों जिलों में आदिवासी समुदायों के बीच श्रीअन्न की पारंपरिक खेती का लंबा अनुभव रहा है। सीमित वर्षा और सिंचाई संसाधनों के बावजूद किसान कई क्षेत्रों में ज्वार, बाजरा, कोदो और कुटकी जैसी फसलों की खेती करते हैं। इन क्षेत्रों में उपलब्ध देसी बीजों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ढलने की क्षमता विकसित हुई है। इसलिए वैज्ञानिकों के लिए ये बीज महत्वपूर्ण शोध सामग्री बन सकते हैं। परियोजना के तहत इन जिलों के साथ अन्य कृषि क्षेत्रों से भी बीज नमूने एकत्र किए जाएंगे। इन नमूनों का संरक्षण करने के साथ-साथ उनके कृषि गुणों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाएगा। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि अलग-अलग भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों में कौन-सी श्रीअन्न किस्म बेहतर प्रदर्शन करती है।
परियोजना का एक अहम पहलू कम पानी में उत्पादन क्षमता का परीक्षण होगा। बदलते मौसम और पानी के दबाव के बीच कृषि क्षेत्र में ऐसी फसलों और किस्मों की जरूरत बढ़ रही है, जो कम सिंचाई में भी उत्पादन दे सकें। श्रीअन्न की कई फसलों को पहले से ही अपेक्षाकृत कम पानी वाली खेती के लिए जाना जाता है। अब वैज्ञानिक इनके भीतर मौजूद विविधता का अध्ययन करेंगे। संभव है कि एक ही फसल की अलग-अलग स्थानीय किस्मों में पानी की कमी सहने और उत्पादन बनाए रखने की क्षमता अलग-अलग हो। इसी अंतर की पहचान इस परियोजना के जरिए की जाएगी। वैज्ञानिक यह देखेंगे कि कौन-से जर्मप्लाज्म में कम जल उपलब्धता के बावजूद बेहतर उत्पादन क्षमता बनी रहती है। साथ ही स्थानीय जलवायु के अनुरूप अनुकूलन और प्रतिकूल परिस्थितियों में टिके रहने जैसे गुणों का भी मूल्यांकन किया जाएगा। ऐसे गुणों वाली प्रजातियों को आगे के प्रजनन कार्यक्रम में शामिल कर नई वैरायटी विकसित करने का प्रयास किया जा सकता है।
जर्मप्लाज्म बैंक क्यों महत्वपूर्ण
जर्मप्लाज्म किसी फसल की आनुवंशिक विविधता को संरक्षित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। किसी क्षेत्र में किसान वर्षों से जिन देसी किस्मों का उपयोग करते आए हैं, उनमें कई विशिष्ट कृषि गुण हो सकते हैं। यदि ये किस्में धीरे-धीरे खेती से बाहर होती हैं तो उनके साथ मौजूद आनुवंशिक विविधता भी खत्म हो सकती है। ऐसे में जर्मप्लाज्म संग्रह भविष्य के कृषि अनुसंधान के लिए सुरक्षित भंडार की तरह काम करता है। मध्यप्रदेश के 26 जिलों से श्रीअन्न की किस्मों का संग्रह इस लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। अलग-अलग इलाकों से आने वाले बीजों में पाए जाने वाले गुणों का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकेगा। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने का अवसर मिलेगा कि किसी विशेष क्षेत्र की किस्म में सूखा सहन करने, कम पानी में उत्पादन देने या स्थानीय परिस्थितियों में टिके रहने की क्षमता कितनी है। इस तरह पारंपरिक बीजों को केवल संग्रहालय की वस्तु बनाने के बजाय उन्हें आधुनिक कृषि अनुसंधान से जोडऩे की दिशा में काम होगा। राज्य सरकार ने परियोजना के लिए 25 लाख रुपए का अनुदान दिया है। इस राशि से जर्मप्लाज्म संग्रहण, संरक्षण, परीक्षण और अनुसंधान संबंधी गतिविधियां संचालित की जाएंगी। अलग-अलग जिलों में उपलब्ध श्रीअन्न की विविधता का अध्ययन करने के लिए नमूने एकत्र किए जाएंगे। इसके बाद वैज्ञानिक इन नमूनों को सुरक्षित रखने के साथ उनके गुणों का परीक्षण करेंगे। परियोजना में केवल बीजों का संग्रह ही लक्ष्य नहीं है। मिट्टी, वर्षा, खेती की परिस्थितियों और स्थानीय स्तर पर प्रचलित किस्मों का अध्ययन भी किया जाएगा। इससे किसी बीज के गुणों को उसके प्राकृतिक कृषि वातावरण के संदर्भ में समझने में मदद मिलेगी। यानी परियोजना का फोकस बीज से लेकर खेत तक की पूरी स्थिति को समझने पर है। श्रीअन्न के स्थानीय बीजों को संरक्षित करने का एक बड़ा फायदा यह होगा कि किसानों द्वारा वर्षों से बचाए गए पारंपरिक बीज वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए उपलब्ध हो सकेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में कई किसान अपनी पसंद की फसल के बीज अगली फसल के लिए सुरक्षित रखते हैं। स्थानीय परिस्थितियों में अच्छा प्रदर्शन करने वाले बीज पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते रहे हैं। इन बीजों की विशेषताओं को वैज्ञानिक तरीके से दर्ज करने से कृषि जैव विविधता को संरक्षित किया जा सकेगा। इसके साथ ही ऐसे बीज भविष्य में नई किस्मों के विकास के लिए आनुवंशिक संसाधन भी बन सकते हैं। यदि किसी स्थानीय किस्म में कम पानी, कम वर्षा या किसी विशेष जलवायु परिस्थिति को सहन करने की क्षमता मिलती है तो उस गुण का इस्तेमाल नई वैरायटी विकसित करने में किया जा सकता है।
श्रीअन्न की सात प्रमुख फसलों पर फोकस
परियोजना में जिन प्रमुख फसलों का जर्मप्लाज्म एकत्र किया जाना है, उनमें ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी, सांवा, कंगनी और चीना शामिल हैं। इन फसलों की खासियत यह है कि ये प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग कृषि परिस्थितियों में उगाई जाती हैं। इनके स्थानीय रूपों में भी विविधता मौजूद है। वैज्ञानिक इन विविधताओं का अध्ययन कर यह पता लगाएंगे कि कौन-सी किस्म किन परिस्थितियों में बेहतर है। इससे भविष्य में क्षेत्र-विशिष्ट कृषि के लिए भी उपयोगी जानकारी तैयार हो सकती है। मसलन, किसी जिले में कम वर्षा की स्थिति रहती है तो वहां की ऐसी स्थानीय किस्मों को चिन्हित किया जा सकता है, जिनका प्रदर्शन कम पानी में बेहतर रहता है। इसी तरह किसी दूसरे क्षेत्र में मिट्टी या मौसम की अलग परिस्थितियों के लिए उपयुक्त किस्म की पहचान की जा सकती है। जर्मप्लाज्म संग्रह को नई वैरायटी विकसित करने की दिशा में शुरुआती लेकिन महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। किसी नई किस्म के विकास के लिए पहले यह जानना जरूरी होता है कि उपलब्ध आनुवंशिक संसाधनों में कौन-कौन से उपयोगी गुण मौजूद हैं। इसीलिए परियोजना में बेहतर विशेषताओं वाली प्रजातियों की पहचान की जाएगी। इसके बाद इन विशेषताओं को आगे के प्रजनन कार्यक्रमों में इस्तेमाल करने का प्रयास किया जाएगा। यह प्रक्रिया तत्काल परिणाम देने वाली नहीं होगी। बीज संग्रह, संरक्षण, परीक्षण, गुणों की पहचान और फिर प्रजनन के जरिए नई किस्म विकसित करने में समय लग सकता है। लेकिन यदि परियोजना सफल रहती है तो इसका लाभ लंबे समय तक कृषि क्षेत्र को मिल सकता है। कृषि में बदलती जलवायु परिस्थितियों के बीच कम पानी में उत्पादन देने वाली और प्रतिकूल मौसम में टिकने वाली फसलों की उपयोगिता बढ़ रही है। ऐसे में स्थानीय देसी बीजों में मौजूद अनुकूलन क्षमता महत्वपूर्ण संसाधन बन सकती है। मध्यप्रदेश में वर्षा और सिंचाई की स्थिति सभी जिलों में एक जैसी नहीं है। कुछ क्षेत्रों में पर्याप्त सिंचाई सुविधा है, जबकि कई इलाकों में किसान बारिश पर निर्भर हैं। ऐसे क्षेत्रों के लिए ऐसी किस्में उपयोगी हो सकती हैं, जो कम पानी में भी फसल को बनाए रख सकें। इसी वजह से परियोजना में कम जल उपलब्धता, स्थानीय जलवायु के अनुरूप अनुकूलन, प्रतिकूल परिस्थितियों में टिकाऊपन और उत्पादकता जैसे गुणों का मूल्यांकन किया जाएगा। झाबुआ और अलीराजपुर जैसे जिलों में श्रीअन्न केवल फसल नहीं, बल्कि स्थानीय खाद्य और कृषि परंपरा का हिस्सा है। इन क्षेत्रों में पारंपरिक बीजों का संरक्षण ग्रामीण जीवन से जुड़ा रहा है। जर्मप्लाज्म संग्रह के जरिए इन पारंपरिक संसाधनों को वैज्ञानिक दस्तावेज और अनुसंधान का आधार मिलने की संभावना है। इससे स्थानीय कृषि ज्ञान और आधुनिक कृषि विज्ञान के बीच भी एक कड़ी बन सकती है। हालांकि परियोजना का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि एकत्र किए गए बीजों का संरक्षण किस तरह किया जाता है, उनके गुणों का परीक्षण कितनी व्यापकता से होता है और अनुसंधान के परिणामों को आगे किसानों तक किस रूप में पहुंचाया जाता है।

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