- हाई कोर्ट के फैसले पर सरकार पहुंची सुप्रीम कोर्ट में

गौरव चौहान
मध्य प्रदेश के करीब 50 हजार सरकारी कर्मचारियों के पूरे वेतन का इंतजार फिर लंबा हो गया है। परिवीक्षा अवधि में 70, 80 और 90 प्रतिशत वेतन देने की व्यवस्था खत्म करने के हाई कोर्ट के फैसले के बाद कर्मचारी पूरा वेतन और बकाया राशि मिलने की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन राज्य सरकार ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी है। मामले में 14 सितंबर को सुनवाई प्रस्तावित है। इसके बाद ही कर्मचारियों के वेतन और बकाया भुगतान को लेकर स्थिति स्पष्ट होगी।
हाई कोर्ट ने 8 सितंबर को कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए परिवीक्षा अवधि में कम वेतन देने की व्यवस्था को भेदभावपूर्ण माना था। कोर्ट के आदेश के बाद कर्मचारी संगठनों ने सरकार से इसे तत्काल लागू करने की मांग शुरू कर दी थी। लेकिन सरकार ने फैसले का परीक्षण करने के साथ ही इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर मामले को नई कानूनी प्रक्रिया में पहुंचा दिया है।
तीन साल तक कम वेतन, अब बकाया की उम्मीद
2019 में लागू व्यवस्था के तहत कर्मचारी को परिवीक्षा के पहले वर्ष में 70 प्रतिशत, दूसरे वर्ष में 80 प्रतिशत और तीसरे वर्ष में 90 प्रतिशत वेतन दिया जाता है। चौथे वर्ष में उसे पूरा वेतन मिलता है। यानी कर्मचारी को नियुक्ति के बाद तीन वर्ष तक कम वेतन पर काम करना पड़ता है। हाई कोर्ट का फैसला लागू होने की स्थिति में संबंधित कर्मचारियों को पिछली अवधि का बकाया भी मिल सकता है। अनुमान के मुताबिक प्रत्येक कर्मचारी को करीब दो से तीन लाख रुपये तक का आर्थिक लाभ हो सकता है। इससे सरकार पर करीब चार हजार करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त वित्तीय भार आने की संभावना है।
भर्ती के रास्ते के आधार पर अलग नियम
कर्मचारियों का मुख्य तर्क यह भी है कि समान सरकारी सेवा में आने वाले कर्मचारियों के लिए परिवीक्षा और वेतन की व्यवस्था अलग-अलग है। कर्मचारी चयन मंडल के माध्यम से भर्ती होने वालों पर 70-80-90 प्रतिशत वेतन वाली व्यवस्था लागू है, जबकि लोक सेवा आयोग के जरिए नियुक्त कर्मचारियों की परिवीक्षा अवधि दो वर्ष है और उन्हें पहले वर्ष से पूरा वेतन मिलता है। कर्मचारी संगठनों ने इसी अंतर को आधार बनाकर व्यवस्था को भेदभावपूर्ण बताया था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी नजर
मध्य प्रदेश तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ के महामंत्री उमाशंकर तिवारी का कहना है कि कर्मचारियों से पूरा काम लेने के बावजूद परिवीक्षा के दौरान कम वेतन देना न्यायसंगत नहीं है। संगठन लंबे समय से इस व्यवस्था को खत्म करने की मांग कर रहे हैं। अब कर्मचारियों की नजर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर है। यदि हाई कोर्ट का फैसला बरकरार रहता है तो प्रदेश के हजारों कर्मचारियों को न केवल आगे से पूरा वेतन मिलने का रास्ता साफ होगा, बल्कि पिछली अवधि के वेतन अंतर का भुगतान भी मिल सकता है। वहीं सरकार के लिए यह फैसला सीधे तौर पर हजारों करोड़ रुपये के अतिरिक्त वित्तीय भार से जुड़ा होगा।
