- आयुष्मान अस्पतालों पर दोहरी निगरानी: अब फर्जीवाड़े के साथ इलाज की गुणवत्ता पर भी सख्ती
- गौरव चौहान
आयुष्मान भारत योजना में अब केवल फर्जीवाड़े पर कार्रवाई ही नहीं, बल्कि अस्पतालों की इलाज संबंधी गुणवत्ता भी जांच के दायरे में है। मध्य प्रदेश में चार बड़े शहरों के करीब 90 निजी अस्पताल एंट्री-लेवल एनएबीएच प्रमाणीकरण पूरा नहीं कर पाए हैं। इसके चलते इन अस्पतालों में एक अक्टूबर से नए आयुष्मान मरीजों की भर्ती पर रोक लगा दी गई है। संबद्धता समिति की बैठक के बाद इन अस्पतालों को योजना से बाहर करने पर अंतिम फैसला होगा। भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में आयुष्मान योजना से जुड़े अस्पतालों की गुणवत्ता को लेकर यह कार्रवाई की गई है। इनमें भोपाल के 46, इंदौर के 20, जबलपुर के 13 और ग्वालियर के 11 अस्पताल शामिल हैं। अधिकारियों के अनुसार, आयुष्मान योजना के तहत मरीजों को सुरक्षित और निर्धारित मानकों के अनुरूप इलाज मिले, इसी उद्देश्य से अस्पतालों के लिए गुणवत्ता संबंधी शर्तों को सख्त किया जा रहा है।
आयुष्मान भारत योजना के तहत प्रदेश में पहले से ही अस्पतालों की संबद्धता और उनके कामकाज की जांच जारी है। योजना शुरू होने के बाद से मध्य प्रदेश में अब तक 462 अस्पतालों को योजना से असंबद्ध किया जा चुका है। देशभर में 3095 अस्पतालों को योजना से बाहर किया गया है। इस मामले में मध्य प्रदेश का आंकड़ा उत्तर प्रदेश के बाद सबसे अधिक है। अधिकारियों के अनुसार, असंबद्ध किए गए अस्पतालों में करीब 80 प्रतिशत ऐसे होते हैं, जिनके खिलाफ किसी तरह की गड़बड़ी या फर्जीवाड़े के मामले सामने आते हैं। बाकी करीब 20 प्रतिशत अस्पताल खुद योजना से बाहर होने के लिए आवेदन करते हैं। बिलिंग में गड़बड़ी, बिना जरूरत मरीजों को भर्ती रखना और सामान्य मरीजों को आईसीयू में भर्ती करने जैसे मामले जांच में सामने आते रहे हैं। गंभीर मामलों में अस्पतालों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई जाती है। हाल ही में भोपाल के सृष्टि अस्पताल के खिलाफ आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने एफआईआर दर्ज की है। इससे पहले भी आयुष्मान योजना में कथित अनियमितताओं को लेकर अस्पतालों पर कार्रवाई होती रही है।
चार शहरों में 90 अस्पतालों पर असर
आयुष्मान से संबद्ध अस्पतालों की संख्या देखें तो भोपाल में 226, इंदौर में 91, जबलपुर में 68 और ग्वालियर में 81 अस्पताल संबद्ध थे। अब तक असंबद्ध किए गए अस्पतालों में भोपाल के 92, इंदौर के 62, जबलपुर के 51 और ग्वालियर के 42 अस्पताल शामिल हैं। एनएबीएच यानी नेशनल एक्रीडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा, स्टाफ की योग्यता, उपचार की प्रक्रिया, रिकॉर्ड और अन्य व्यवस्थाओं के मानकों का आकलन करता है। सरकार का मानना है कि आयुष्मान योजना के मरीजों को गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित इलाज उपलब्ध कराने के लिए इन मानकों का पालन जरूरी है।
प्रमाणीकरण का खर्च भी अस्पतालों की चिंता
निजी अस्पताल संचालकों का कहना है कि एनएबीएच प्रमाणीकरण के लिए अतिरिक्त स्टाफ, उपकरण, दस्तावेज और अन्य व्यवस्थाएं करनी पड़ती हैं। अस्पताल संचालकों के अनुसार पूरी प्रक्रिया में करीब 25 से 30 लाख रुपये तक अतिरिक्त खर्च आ सकता है। ऐसे में आयुष्मान के भुगतान में देरी के बीच प्रमाणीकरण का अतिरिक्त खर्च उनके लिए आर्थिक दबाव बढ़ा रहा है।
आपत्ति वाले अस्पतालों का भुगतान ऑडिट के बाद
आयुष्मान योजना के सीईओ अरविंद शाह के अनुसार अस्पतालों को अगस्त तक का भुगतान किया जा चुका है। इसके बाद जिन अस्पतालों के भुगतान में आपत्तियां हैं, उनका ऑडिट कराया जा रहा है। ऑडिट पूरा होने के बाद भुगतान किया जाएगा। उनका कहना है कि ऐसे मामले पिछले दो-तीन महीने की अवधि के हैं। एनएबीएच एंट्री-लेवल प्रमाणीकरण पूरा नहीं करने वाले 90 अस्पतालों में नए मरीजों की भर्ती पर रोक लगाई गई है।
