निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की महंगी सीटों से मोहभंग

एमबीबीएस की महंगी सीटों
  • मेडिकल करियर की पसंद में बदल रहा ट्रेंड…

    भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। नीट में अच्छे अंक हासिल करने के बाद भी एमबीबीएस ही पहली पसंद हो, अब ऐसा जरूरी नहीं रह गया है। मध्य प्रदेश में मेडिकल काउंसलिंग के तीन मुख्य दौर पूरे होने के बाद सामने आए प्रवेश के रुझान बताते हैं कि कई मेधावी अभ्यर्थियों ने निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की महंगी सीट लेने के बजाय सरकारी आयुष कॉलेजों में बीएएमएस और बीएचएमएस को चुना है। इंदौर, उज्जैन और भोपाल के सरकारी आयुष संस्थानों में दाखिला लेने वाले कुछ अभ्यर्थियों के अंक नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों और निजी एमबीबीएस संस्थानों के कटऑफ से भी अधिक रहे हैं। इस बदलाव के पीछे केवल एमबीबीएस में प्रवेश नहीं मिल पाना ही कारण नहीं है। निजी मेडिकल कॉलेजों की भारी फीस, सरकारी आयुष संस्थानों में कम खर्च पर पढ़ाई और आयुष चिकित्सा पद्धतियों में करियर की संभावनाएं भी अभ्यर्थियों की पसंद को प्रभावित कर रही हैं। हालांकि, सभी अभ्यर्थियों के लिए यह फैसला समान परिस्थितियों में लिया गया हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता। किसी के लिए आर्थिक दबाव अहम है, तो किसी के लिए सरकारी संस्थान में पढ़ाई प्राथमिकता है। इंदौर के इंडेक्स मेडिकल कॉलेज और भोपाल के एलएनसीटी सेवाकुंज जैसे निजी मेडिकल संस्थानों में सामान्य वर्ग की एमबीबीएस सीटें लगभग 484-485 अंकों पर बंद हुईं। इसके मुकाबले इंदौर के सरकारी अष्टांग आयुर्वेद कॉलेज और भोपाल के पंडित खुशीलाल शर्मा आयुर्वेद कॉलेज में बीएएमएस के कुछ शीर्ष अभ्यर्थियों के अंक 490 से 535 के बीच रहे। यानी इन अभ्यर्थियों के पास अंकों के लिहाज से कुछ निजी एमबीबीएस कॉलेजों में प्रवेश की संभावना थी, लेकिन उन्होंने सरकारी आयुर्वेद कॉलेजों को चुना। यह अंतर मेडिकल शिक्षा में बदलती प्राथमिकताओं की ओर संकेत करता है। हालांकि, कटऑफ की तुलना संबंधित काउंसलिंग दौर, श्रेणी और सीट के प्रकार के संदर्भ में ही की जानी चाहिए।
    नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों के कटऑफ से भी आगे
    मंदसौर, नीमच, श्योपुर और सिंगरौली के नए सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एससी, एसटी और सरकारी स्कूल कोटे के तहत कुछ अभ्यर्थियों को 380 से 455 अंकों के बीच एमबीबीएस सीटें मिलीं। दूसरी ओर, सरकारी आयुष कॉलेजों में बीएएमएस और बीएचएमएस चुनने वाले कुछ अनारक्षित और ओबीसी अभ्यर्थियों के अंक 465 से 535 के बीच रहे। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि केवल अंकों के आधार पर मेडिकल कोर्स की पसंद तय नहीं हो रही। श्रेणी, कोटा, कॉलेज की उपलब्धता, फीस और अभ्यर्थी की व्यक्तिगत प्राथमिकता भी प्रवेश के फैसले में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
    एमजीएम में चूके, लेकिन निजी कॉलेज की महंगी सीट भी नहीं चुनी: इंदौर के महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय (एमजीएम) में अनारक्षित श्रेणी का एमबीबीएस कटऑफ 607 अंक तक पहुंचा। वहीं सरकारी बीएएमएस कॉलेजों में प्रवेश लेने वाले कुछ शीर्ष अभ्यर्थियों के अंक 530 से 535 के आसपास रहे। इस तरह एमजीएम के बताए गए कटऑफ और इन अभ्यर्थियों के अंकों के बीच लगभग 72 से 77 अंकों का अंतर था। कुछ अभ्यर्थी शीर्ष सरकारी एमबीबीएस कॉलेज में प्रवेश की सीमा तक नहीं पहुंच सके, लेकिन उनके पास निजी मेडिकल कॉलेजों के विकल्प हो सकते थे। इसके बावजूद सरकारी आयुष संस्थानों को चुनना बताता है कि कई छात्रों के लिए सरकारी कॉलेज में पढ़ाई और खर्च का अंतर महत्वपूर्ण है।
    कटऑफ की असमानता से तुलना में सावधानी जरूरी
    नीट पीजी या एमबीबीएस प्रवेश की तरह ही स्नातक मेडिकल काउंसलिंग में भी श्रेणी, आरक्षण, कोटा और सीट की उपलब्धता कटऑफ को प्रभावित करते हैं। अनारक्षित श्रेणी के किसी आयुष अभ्यर्थी के अंक दूसरे कोटे में एमबीबीएस पाने वाले अभ्यर्थी से अधिक हो सकते हैं, लेकिन इससे दोनों की प्रवेश परिस्थितियां समान नहीं हो जातीं। इसलिए सरकारी आयुष कॉलेजों में अधिक अंक वाले विद्यार्थियों का प्रवेश एक महत्वपूर्ण रुझान जरूर है, मगर इससे यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि मेधावी अभ्यर्थियों ने बड़े पैमाने पर एमबीबीएस छोडऩा शुरू कर दिया है। इसके लिए पिछले वर्षों के तुलनात्मक आंकड़ों और अभ्यर्थियों की पसंद का विस्तृत अध्ययन जरूरी होगा। फिलहाल, मध्य प्रदेश की काउंसलिंग से इतना स्पष्ट है कि मेडिकल करियर के विकल्प चुनते समय केवल नीट स्कोर और एमबीबीएस की प्रतिष्ठा निर्णायक नहीं रह गए हैं। सरकारी संस्थान में पढ़ाई, निजी शिक्षा का खर्च और आयुष चिकित्सा में रुचि भी कुछ मेधावी विद्यार्थियों के फैसले को दिशा दे रहे हैं।
    आयुष में करियर की संभावनाएं भी आकर्षित कर रहीं
    आयुर्वेद और होम्योपैथी को करियर विकल्प के रूप में चुनने के पीछे रोजगार और पेशेवर संभावनाएं भी हैं। आयुष सेवाओं का विस्तार, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में अवसर और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के प्रति बढ़ती दिलचस्पी कुछ अभ्यर्थियों को इन पाठ्यक्रमों की ओर आकर्षित कर सकती है। लेकिन बीएएमएस, बीएचएमएस और एमबीबीएस अलग-अलग चिकित्सा पाठ्यक्रम हैं। इनके अध्ययन, प्रशिक्षण, पेशेवर कार्यक्षेत्र और आगे की विशेषज्ञता के रास्ते भी अलग हैं। इसलिए केवल फीस या प्रवेश के अंकों की तुलना से किसी एक कोर्स को दूसरे से बेहतर नहीं माना जा सकता। अभ्यर्थियों के लिए अपने करियर लक्ष्य और संबंधित चिकित्सा पद्धति में रुचि को ध्यान में रखना भी जरूरी है।

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