- जंगलों पर बढ़ा कब्जे का खतरा, बांधवगढ़ में वन समितियों का अस्तित्व संकट में
- गौरव चौहान

मध्य प्रदेश में जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए गठित वन समितियां अपने उद्देश्य से भटकती नजर आ रही हैं। प्रदेश में हजारों समितियां गठित होने के बावजूद करीब 52 प्रतिशत समितियां निष्क्रिय हैं। कई समितियों का कार्यकाल वर्षों पहले समाप्त हो चुका है, जबकि कुछ में पदाधिकारियों के बीच विवाद के कारण कामकाज ठप है। इसका सीधा असर जंगलों की सुरक्षा और वन्यजीवों के संरक्षण पर पड़ रहा है। सबसे गंभीर स्थिति बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में सामने आ रही है, जहां वन समितियों की संख्या शून्य बताई गई है। यह वही क्षेत्र है, जहां पिछले दस वर्षों में बाघों की मौत की कई घटनाएं सामने आई हैं। ऐसे में स्थानीय लोगों की भागीदारी से जंगलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की व्यवस्था कमजोर पडऩा चिंता बढ़ाने वाला है।
बांधवगढ़ देश के प्रमुख बाघ अभयारण्यों में शामिल है। यहां पिछले एक दशक में बाघों की कई मौतें हो चुकी हैं। शिकार और बाघों के बीच आपसी संघर्ष इसके प्रमुख कारणों में शामिल बताए जाते हैं। करीब 1536.83 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या बढऩे के साथ उनके संरक्षण की चुनौतियां भी बढ़ी हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, बाघों की बढ़ती आबादी के साथ उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा, मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण जरूरी है। इसके लिए वन विभाग के साथ स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी भी अहम है। लेकिन वन समितियों के निष्क्रिय रहने से यह व्यवस्था कमजोर पड़ रही है।
चार प्रकार की समितियों से होनी थी जंगलों की सुरक्षा
प्रदेश में स्थानीय स्तर पर वन संरक्षण और प्रबंधन में लोगों की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से चार प्रकार की समितियां गठित की गई थीं। इनमें ग्राम वन समिति, वन संरक्षण समिति, इको विकास समिति और वन एक्सटेंशन समिति शामिल हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में ग्राम वन समितियों की संख्या 9,244, वन संरक्षण समितियों की 4,311 और इको विकास समितियों की 606 रह गई है। वहीं, वन एक्सटेंशन समितियों की संख्या घटकर तीन बताई गई है। इन समितियों का उद्देश्य स्थानीय लोगों को जंगलों की सुरक्षा से जोडऩा, अवैध कटाई और अतिक्रमण पर निगरानी रखना तथा वन्यजीवों के संरक्षण में समुदाय की भूमिका सुनिश्चित करना था। हालांकि, जमीनी स्तर पर कई समितियां अपनी जिम्मेदारियां निभाने में नाकाम साबित हो रही हैं।
सामूहिक भागीदारी कमजोर, अतिक्रमण करने वालों को मौका
वन समितियों में स्थानीय लोगों को अध्यक्ष और सचिव जैसे पदों की जिम्मेदारी दी जाती है, ताकि जंगलों के संरक्षण में उनकी सीधी भागीदारी हो सके। लेकिन कई जगह समितियों के भीतर विवाद, पदाधिकारियों की निष्क्रियता और वन विभाग के अधिकारियों की उदासीनता के कारण व्यवस्था प्रभावित हो रही है। जंगलों से लगे इलाकों में पहले शहरों के आसपास वन भूमि पर अतिक्रमण बढ़ा और अब गांवों के आसपास के जंगल भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। खाली जमीन पर रातोंरात कब्जे किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। आबादी का दबाव बढऩे के साथ वन भूमि पर अतिक्रमण की समस्या भी गंभीर होती जा रही है। यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो जंगलों का क्षेत्रफल घटने के साथ वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर भी असर पड़ सकता है।
समितियों के पदाधिकारी ही सवालों के घेरे में
कई जिलों में वन समितियों के अध्यक्ष, सचिव और कुछ सदस्य ही कथित तौर पर जंगलों में अवैध गतिविधियों में शामिल पाए जा रहे हैं। कहीं जंगल के भीतर से रेत चोरी करने तो कहीं पेड़ों की अवैध कटाई में मिलीभगत के आरोप सामने आ रहे हैं। कुछ क्षेत्रों में पदाधिकारी समितियों में बने रहना चाहते हैं, लेकिन रिश्तेदारी और स्थानीय समीकरणों के चलते अतिक्रमण करने वालों तथा पेड़ काटने वालों की जानकारी वन विभाग तक नहीं पहुंचाते। इससे अवैध गतिविधियों पर समय रहते कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है। वहीं, कुछ सदस्यों पर वन विभाग की औचक जांच से जुड़ी सूचनाएं कथित तौर पर वन माफिया तक पहुंचाने और इसके बदले आर्थिक लाभ लेने के आरोप भी हैं। ऐसी गतिविधियां समितियों के मूल उद्देश्य को कमजोर करती हैं।
अधिकारियों और समितियों के बीच समन्वय की कमी
वन समितियों को सक्रिय बनाए रखने के लिए वन विभाग के अधिकारियों, मैदानी कर्मचारियों और स्थानीय पदाधिकारियों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। लेकिन विवादों का समाधान नहीं होने और नियमित निगरानी की कमी से कई समितियां केवल कागजों तक सीमित रह गई हैं। वन बल प्रमुख से लेकर मुख्य वन संरक्षक और जिला वन अधिकारियों तक के स्तर पर समितियों की समीक्षा, लंबित विवादों का निराकरण और निष्क्रिय इकाइयों को दोबारा सक्रिय करने की जरूरत है। साथ ही, समिति पदाधिकारियों की जवाबदेही तय करना और अवैध गतिविधियों में संलिप्त पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना भी जरूरी है।
जबलपुर में सबसे ज्यादा वन समितियां
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के जिन वन वृत्तों में वन समितियों की संख्या अधिक है, उनमें जबलपुर सबसे आगे है। इसके बाद भोपाल और रीवा का स्थान है। जबलपुर में 1,570, भोपाल में 1,211, रीवा में 1,111, सिवनी में 1,057, सागर में 1,019, शिवपुरी में 980, खंडवा में 884 और उज्जैन में 768 वन समितियां हैं। वन समितियों की बड़ी संख्या तभी उपयोगी साबित हो सकती है, जब वे नियमित रूप से काम करें और जंगलों की सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभाएं। बांधवगढ़ जैसे संवेदनशील क्षेत्र में समितियों की अनुपस्थिति और प्रदेश के अन्य हिस्सों में उनकी निष्क्रियता वन संरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अब जरूरत केवल समितियां गठित करने की नहीं, बल्कि उन्हें जवाबदेह, सक्रिय और प्रभावी बनाने की है, ताकि जंगलों पर बढ़ते अतिक्रमण को रोका जा सके और बाघों सहित अन्य वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सुरक्षित रह सकें।
