सेल्फ डिक्लेरेशन से शुरू होंगे 15 तरह के कारोबार

सेल्फ डिक्लेरेशन
  • ईज ऑफ डूइंग बिजनेस एक्ट लागू, एमपी में उद्योग लगाने की प्रक्रिया आसान
  • एमपीआईडीसी को बनाया नोडल एजेंसी,ऑनलाइन आवेदन पर 30 दिन में मंजूरी का प्रावधान

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्य प्रदेश में नया उद्योग, कारखाना या स्टार्टअप शुरू करने के लिए निवेशकों को अलग-अलग सरकारी विभागों के चक्कर लगाने से राहत देने की तैयारी है। राज्य सरकार ने कारोबार शुरू करने की प्रक्रिया सरल बनाने के लिए ईज ऑफ डूइंग बिजनेस एक्ट लागू किया है। इसके तहत सिंगल विंडो सिस्टम, ऑनलाइन आवेदन और स्व-घोषणा यानी सेल्फ डिक्लेरेशन की व्यवस्था की गई है। निर्धारित श्रेणियों में आने वाले 15 तरह के उद्योग केवल घोषणा-पत्र के आधार पर काम शुरू कर सकेंगे। सरकार का उद्देश्य उद्योगों की स्थापना में लगने वाला समय कम करना और निवेशकों के लिए मंजूरी की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना है।
अब निवेशकों को अलग-अलग विभागों में जाकर प्रत्येक अनुमति के लिए स्वतंत्र आवेदन करने की जरूरत कम होगी। नए प्रावधानों के तहत एक ही आवेदन के माध्यम से संबंधित विभागों की मंजूरी मांगी जा सकेगी। मध्य प्रदेश इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एमपीआईडीसी) को इस व्यवस्था की नोडल एजेंसी बनाया गया है। इसके तहत गठित ईज ऑफ डूइंग बिजनेस सचिवालय सिंगल विंडो सिस्टम के माध्यम से निवेशकों के प्रस्तावों और अनुमतियों की प्रक्रिया का समन्वय करेगा। आवेदन ऑनलाइन लिए जाएंगे और निर्धारित व्यवस्था के अनुसार 30 दिनों के भीतर अनुमति देने का प्रावधान है। यदि कोई अधिकारी तय समय में आवेदन पर निर्णय नहीं लेता है, तो आवेदन समीक्षा के लिए स्वत: वरिष्ठ अधिकारी के पास पहुंच जाएगा। इससे फाइलों के लंबे समय तक एक ही स्तर पर अटके रहने की समस्या कम करने की कोशिश की गई है। निवेशक ऑनलाइन डैशबोर्ड पर अपने आवेदन और शिकायतों की स्थिति देख सकेंगे। उद्योगपतियों की शिकायतों के समाधान के लिए भी ऑनलाइन व्यवस्था बनाई गई है।
व्हाइट और ग्रीन श्रेणी के उद्योगों को राहत
नई व्यवस्था में व्हाइट और ग्रीन श्रेणी के कुछ उद्योगों को स्व-घोषणा के आधार पर काम शुरू करने की सुविधा दी गई है। इसके तहत संबंधित उद्योग संचालक निर्धारित घोषणा-पत्र जमा कर कारोबार शुरू कर सकेंगे। अन्य जरूरी औपचारिकताएं निर्धारित नियमों के अनुसार पूरी करनी होंगी। इस व्यवस्था से उन उद्यमियों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें उद्योग की स्थापना से पहले कई विभागों की प्रक्रियाओं के कारण इंतजार करना पड़ता है। हालांकि, सेल्फ डिक्लेरेशन का लाभ संबंधित उद्योग की निर्धारित श्रेणी और लागू शर्तों के अधीन होगा।
सेल्फ डिक्लेरेशन के दायरे में आने वाले उद्योग
नई व्यवस्था के तहत सेल्फ डिक्लेरेशन के दायरे में जो उद्योग आएंगे उनमें ग्रीन श्रेणी, कपास जिनिंग और कॉटन प्रोसेसिंग, टायर और रबर उद्योग, गन्ने से संबंधित उत्पाद बनाने वाली इकाइयां, जैविक कोयला इकाइयां, जैव उर्वरक उत्पादन, पशु आहार उत्पादन, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर इकाइयां, व्हाइट श्रेणी, एयर कूलर और एयर कंडीशनर असेंबली, साइकिल और बच्चों की गाडिय़ां बनाने वाली इकाइयां, जैविक कीटनाशक निर्माण, चाय पैकिंग, चॉक निर्माण, विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक लैंप और सीएफएल असेंबली, वैज्ञानिक अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशालाएं और हथकरघा और बुनाई इकाइयां शामिल हैं।
मुख्य सचिव करेंगे निगरानी, जिलों में कलेक्टर की कमेटी
नई व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए राज्य स्तर पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति गठित की गई है। यह समिति हर तीन महीने में बैठक कर अनुमतियों में देरी और निवेशकों की समस्याओं की समीक्षा करेगी। उद्योग विभाग के सचिव समिति के समन्वयक होंगे। वित्त, नगरीय प्रशासन, राजस्व, ऊर्जा, श्रम, पर्यावरण, एमएसएमई, गृह और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जुड़े सचिव इसमें सदस्य होंगे। जिला स्तर पर कलेक्टर की अध्यक्षता में भी समितियां बनाई गई हैं। इनमें जिला व्यापार एवं उद्योग केंद्र, बिजली कंपनी, श्रम विभाग, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नापतौल विभाग, नगरीय निकाय और अग्निशमन सेवाओं के अधिकारी शामिल होंगे। इन समितियों का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर उद्योग स्थापित करने में आने वाली समस्याओं का समाधान करना है।
निवेश आकर्षित करने की कोशिश
सरकार की इस पहल का असर इस बात पर निर्भर करेगा कि ऑनलाइन आवेदन, विभागीय समन्वय और समय-सीमा का पालन जमीन पर कितना प्रभावी रहता है। सिंगल विंडो और स्व-घोषणा की व्यवस्था से छोटे उद्यमियों को शुरुआती प्रक्रियाओं में राहत मिल सकती है। वहीं, समय पर मंजूरी और शिकायतों के समाधान से निवेशकों का भरोसा बढ़ाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, उद्योगों को वास्तविक राहत मिलने के लिए यह भी जरूरी होगा कि विभागीय स्तर पर अनावश्यक देरी न हो और सेल्फ डिक्लेरेशन के दायरे में नहीं आने वाले उद्योगों की मंजूरी प्रक्रिया भी समयबद्ध तरीके से पूरी की जाए।

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