अर्जुन सिंह की विरासत को घर-घर दस्तक से सहेज रहे अजय सिंह
डॉ. महेन्द्र सिंह चौहान
मध्यप्रदेश की सियासत में इन दिनों एक अलग तरह की सुगबुगाहट है। यह सुगबुगाहट किसी चुनावी शोर, रैली या दलीय बयानबाजी की नहीं है, बल्कि राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी है एक खामोश लेकिन बेहद रणनीतिक मुहिम। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह रइन दिनों बिना किसी तामझाम और प्रचार-प्रसार के जमीन पर उतरे हुए हैं। उनका संकल्प है—अपनी गौरवशाली विरासत को सहेजते हुए संगठन को जमीनी स्तर पर सशक्त बनाना। इस संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने जरिया बनाया है घर-घर दस्तक अभियान को, जो प्रदेश कांग्रेस में एक नई मिसाल पेश कर रहा है। संगठन को जमीनी संजीवनी: अजय सिंह वर्तमान में भले ही किसी बड़े पद पर न हों, लेकिन उनके पास एक ऐसी पूंजी है जिसे सियासत में सबसे कीमती माना जाता है—वह है उनके पिता, देश के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री स्व. अर्जुन सिंह की विरासत। राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले अर्जुन सिंह ने कभी विंध्य के छोटे से अंचल चुरहट से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अमिट पहचान बनाई थी। आज उसी विरासत के सहारे अजय सिंह प्रदेश के विभिन्न अंचलों, जिलों और ब्लॉक स्तर तक जाकर उन पुराने कांग्रेसियों की सुध ले रहे हैं, जो कहीं न कहीं मुख्यधारा से पीछे छूट गए थे। वे खुद जानकारी जुटाकर इन निष्ठावान कार्यकर्ताओं के घर पहुंच रहे हैं और उनसे आत्मीय मुलाकात कर रहे हैं। गुटबाजी से परे, एक अनूठा प्रयास: मध्यप्रदेश कांग्रेस के इतिहास में गुटबाजी हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। ऐसे माहौल में अजय सिंह का यह प्रयास न केवल अनूठा है, बल्कि अनुकरणीय भी है। इस अभियान की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि वे तमाम राजनीतिक पूर्वाग्रहों और गुटबाजी को दरकिनार कर सबके पास जा रहे हैं। वे बिना किसी भेदभाव के हर उस पुराने कांग्रेसी को गले लगा रहे हैं जिसने कभी पार्टी के लिए पसीना बहाया था। गुटबाजी से सदैव पीड़ित रहने वाली कांग्रेस पार्टी के भीतर इस तरह का निष्पक्ष और समावेशी प्रयास एकदम नई मिसाल पेश कर रहा है। कार्यकर्ताओं में जागी नई उम्मीद: किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत उसका आम कार्यकर्ता होता है। अजय सिंह की इस जमीनी दौड़धूप और बिना प्रचार के काम करने की शैली ने हाशिए पर बैठे आम कार्यकर्ता के भीतर एक नई उम्मीद और ऊर्जा जगाने का काम किया है। जब एक बड़ा नेता खुद चलकर कार्यकर्ता के घर पहुंचता है, तो उसका स्वाभिमान जाग उठता है। अजय सिंह की यह खामोश क्रांति आने वाले समय में मध्यप्रदेश की राजनीति में क्या रंग लाती है, यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन वर्तमान में उनकी इन कोशिशों ने मुर्झाए हुए सांगठनिक ढांचे में जान फूंकने का काम जरूर कर दिया है। अपने पिता के पद-चिह्नों पर चलते हुए अजय सिंह जिस परिपक्वता और धैर्य के साथ इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं, उससे यह साफ संकेत मिलता है कि वे अपनी राजनीतिक विरासत को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। जन्मदिन के इस विशेष अवसर पर उनका यह समर्पण न केवल उनके कद को और ऊंचा करता है, बल्कि कांग्रेस के भविष्य के लिए भी एक शुभ संकेत है।