जिला अदालतों को मिले वित्तीय अधिकार

  • अब 80 लाख तक की खरीदी खुद कर सकेंगी जिला कोर्ट

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मध्य प्रदेश की जिला अदालतों में अब जरूरी सामान और सेवाओं की खरीदी के लिए हर छोटी प्रशासनिक स्वीकृति को हाई कोर्ट तक भेजने की जरूरत नहीं होगी। राज्य शासन के वित्त विभाग ने जिला एवं सत्र न्यायालयों के प्रधान न्यायाधीशों को उनकी अदालतों की संख्या के आधार पर 20 लाख से 80 लाख रुपये तक के वित्तीय अधिकार सौंप दिए हैं। इससे स्थानीय स्तर पर जरूरत के मुताबिक फैसले लेने और कोर्ट की सुविधाओं में तेजी से सुधार का रास्ता खुल गया है।
नई व्यवस्था का सबसे बड़ा असर उन जिला न्यायालयों पर पड़ेगा, जहां बड़ी संख्या में अदालतें संचालित हो रही हैं। अब कंप्यूटर, प्रिंटर, फर्नीचर, तकनीकी उपकरण, सुरक्षा संबंधी सामग्री, कार्यालयीन सामान और जरूरी सेवाओं की खरीदी के लिए लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरने की जरूरत कम होगी।
अदालतों की संख्या के हिसाब से अधिकार
शासन ने वित्तीय अधिकारों को न्यायालयों के आकार के अनुसार चार श्रेणियों में बांटा है। जिन न्यायालयों की स्थापना में 1 से 15 कोर्ट हैं, वहां प्रधान न्यायाधीश 20 लाख रुपये तक की खरीदी कर सकेंगे। 16 से 30 कोर्ट वाले न्यायालयों के लिए यह सीमा 40 लाख रुपये होगी। इसी तरह 31 से 45 कोर्ट वाले बड़े न्यायालयों को 60 लाख रुपये तक और 46 से अधिक कोर्ट वाले सबसे बड़े न्यायालयों को 80 लाख रुपये तक के वित्तीय अधिकार दिए गए हैं।
छोटी जरूरत के लिए नहीं अटकेगी फाइल
अब तक जिला न्यायालयों में कई बार सामान्य जरूरतों की खरीदी या रख-रखाव से जुड़े मामलों में भी उच्च स्तर की स्वीकृति की आवश्यकता पड़ती थी। इससे जरूरी उपकरणों की खरीदी, भवन रख-रखाव और अन्य कार्यों में समय लग सकता था। नई व्यवस्था में स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता बढऩे से ऐसी प्रक्रियाओं में तेजी आने की उम्मीद है। इसका सीधा फायदा न्यायालय के कामकाज के साथ अधिवक्ताओं, पक्षकारों और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों को मिलने वाली सुविधाओं पर पड़ सकता है।
80 लाख से ज्यादा पर चीफ जस्टिस की अनुमति
वित्तीय अधिकार पूरी तरह स्वायत्त नहीं होंगे। 80 लाख रुपये से अधिक की खरीदी या व्यय के लिए हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अनुमति आवश्यक होगी। साथ ही प्रधान न्यायाधीश इन अधिकारों का इस्तेमाल तभी कर सकेंगे, जब संबंधित बजट मद में पर्याप्त राशि उपलब्ध हो। इस निर्णय को जिला न्यायालयों के प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे एक ओर स्थानीय जरूरतों के अनुसार तेजी से फैसले लिए जा सकेंगे, वहीं दूसरी ओर बड़े व्यय पर उच्च स्तर की निगरानी भी बनी रहेगी।

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