435 करोड़ में से 248 करोड़ ही हो पाया खर्च

  • केंद्र ने पैसा दिया, सिस्टम रहा सुस्त…
  • मप्र में हवा सुधारने का फंड बना शोपीस

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश के शहरों की हवा सुधारने के लिए केंद्र से करोड़ों रुपए मिले, लेकिन प्रदूषण रोकने के काम में सरकारी सिस्टम की रफ्तार बेहद धीमी रही। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत 2023-24 से 2025-26 के बीच प्रदेश के सात शहरों को 435.38 करोड़ रूपए मिले, लेकिन अब तक सिर्फ 228.37 करोड़ रूपए यानी 52.45 प्रतिशत राशि ही खर्च हो सकी। यानी करीब 207 करोड़ रूपए की राशि खर्च ही नहीं हो पाई। सबसे ज्यादा सवाल भोपाल के प्रदर्शन पर खड़े हो रहे हैं। राजधानी को 102.80 करोड़ रूपए की केंद्रीय सहायता मिली, लेकिन इसमें से सिर्फ 11.37 करोड़ रूपए यानी करीब 11.1 प्रतिशत ही खर्च किए जा सके। यानी प्रदूषण से निपटने के लिए मिले हर 100 रुपए में भोपाल करीब 11 रुपए ही जमीन पर उतार पाया।
राजधानी में पैसा पड़ा रहा जबलपुर ने ज्यादा काम किया
केंद्रीय सहायता के उपयोग में भोपाल की तुलना में जबलपुर और इंदौर आगे हैं। जबलपुर को 105.56 करोड़ रूपए मिले, जिसमें 83.64 करोड़ रूपए खर्च किए जा चुके हैं। वहीं इंदौर को 120.64 करोड़ रूपए मिले और उसने 57.30 करोड़ रूपए का उपयोग किया है। दूसरी ओर भोपाल में बड़ी राशि उपलब्ध होने के बावजूद खर्च का आंकड़ा बेहद कम है। भोपाल में 102.80 करोड़ रूपए में से 11.37 करोड़ रूपए ही खर्च हो पाए। ऐसे में सवाल यह है कि प्रदूषण कम करने के लिए राशि मिलने के बाद भी राजधानी में काम शुरू करने और पूरा करने की गति इतनी धीमी क्यों रही? ग्वालियर का आंकड़ा बाकी शहरों से अलग है। शहर को 35.15 करोड़  रूपए जारी किए गए, जबकि उपयोग 39.86 करोड़ रूपए बताया गया है। यानी यहां खर्च राशि आवंटन से भी अधिक है। सागर को 19.60 करोड़ रूपए मिले और 16.53 करोड़ रूपए खर्च हुए। उज्जैन को 32.97 रूपए करोड़ के मुकाबले 12.19 करोड़ रूपए तथा देवास को 18.06 करोड़ रूपए के मुकाबले 7.48 करोड़ रूपए खर्च हुए।  
धूल-धुएं के स्रोत वही, काम की रफ्तार धीमी
प्रदेश के बड़े शहरों में सडक़ की धूल, निर्माण कार्य, बढ़ता ट्रैफिक और खुले में कचरा जलाना वायु प्रदूषण के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। एनसीएपी की राशि का इस्तेमाल इन्हीं स्रोतों को नियंत्रित करने के लिए शहरी कार्ययोजनाओं में किया जाना है। इसमें सडक़ों को पक्का करना और धूल कम करना, हरित क्षेत्र बढ़ाना, प्रदूषण की निगरानी और दूसरे प्रदूषण नियंत्रण उपाय शामिल हैं। लेकिन आवंटित राशि और वास्तविक खर्च के बीच बड़ा अंतर बताता है कि फंड उपलब्ध होने के बावजूद योजनाओं के क्रियान्वयन की रफ्तार अपेक्षित नहीं रही।
सवाल सिर्फ पैसा खर्च होने का नहीं, हवा सुधरने का भी
स्वच्छ हवा के लिए केंद्र से मिली राशि का मकसद सिर्फ बजट खर्च करना नहीं, बल्कि शहरों में प्रदूषण के स्रोतों पर ठोस कार्रवाई करना है। ऐसे में 435 करोड़ रूपए में से करीब 207 करोड़ रूपए का अब तक उपयोग नहीं होना सिस्टम की कार्यक्षमता पर सवाल खड़ा करता है। खासकर भोपाल जैसे शहर में, जहां 100 करोड़ रूपए से ज्यादा की राशि उपलब्ध होने के बावजूद खर्च 12 करोड़ रुपए के आसपास ही पहुंच पाया है, वहां यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि जब प्रदूषण कम करने के लिए पैसा उपलब्ध था, तो उसे जमीन पर उतारने में इतनी देरी क्यों हुई?

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