
- इंदौर में दूषित पेयजल मामले में सामने आई गोपनीय रिपोर्ट
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की जांच रिपोर्ट में नगर निगम के तीन अफसरों को दोषी पाए जाने की बात सामने आयी है। सूत्रों के मुताबिक इस पूरे कांड में जनप्रतिनिधियों को क्लीन चिट दी गई है। जांच में पाइपलाइन बदलने में हुई देरी को दूषित पानी की समस्या की अहम वजह माना गया है। रिपोर्ट के मुताबिक यदि पाइपलाइन समय पर बदल दी जाती तो दूषित पानी की स्थिति को रोका जा सकता था। इसके बावजूद पाइपलाइन का काम समय पर आगे नहीं बढ़ा। जांच में टेंडर प्रक्रिया में हुई देरी और संबंधित अधिकारियों की कार्यशैली को भी जिम्मेदारी के दायरे में लिया गया है। जांच कमेटी ने इस पूरे घटनाक्रम में जल विभाग के अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल की। जानकारी के मुताबिक तत्कालीन अपर आयुक्त रोहित सीसोनिया, संदीप सोनी और जल विभाग के कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव, सहित अन्य अधिकारियों को दोषी पाए जाने की बात सामने आई है। इससे सवाल खड़ा होता है कि जब पाइपलाइन बदलने की जरूरत सामने आ चुकी थी तो टेंडर और निर्माण प्रक्रिया को समय रहते पूरा क्यों नहीं किया गया? क्या अधिकारियों ने खतरे की गंभीरता को नजरअंदाज किया? यदि काम पहले पूरा हो जाता तो क्या लोगों को दूषित पानी पीने की नौबत ही नहीं आती?
अब निगम प्रशासन की अग्निपरीक्षा
भागीरथपुरा कांड की जांच ने नगर निगम की जल व्यवस्था की उस कमजोर कड़ी को सामने ला दिया है, जहां एक पाइपलाइन को समय पर बदलने में हुई देरी के गंभीर परिणाम सामने आए। नेताओं को जांच में राहत मिल गई, लेकिन अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खड़े हो गए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है- जब समय पर पाइपलाइन बदलने से संकट टल सकता था, तो काम में देरी किस स्तर पर हुई? जिम्मेदारी तय होने के बाद दोषी अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी? और क्या उन परिवारों को न्याय और मुआवजा मिलेगा, जिन्होंने इस लापरवाही की सबसे बड़ी कीमत चुकाई ?
दूषित पानी से 36 मौतों के बाद भी सवाल… चूक कहां हुई?
दिसंबर 2025 में भागीरथपुरा में दूषित पानी की समस्या सामने आने के बाद बड़ी संख्या में लोग उल्टी-दस्त और अन्य बीमारियों की चपेट में आए थे। हालात ने कुछ ही समय में गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले लिया। मामले में 36 मौतों के आंकड़े ने प्रशासन और नगर निगम की व्यवस्था पर कई सवाल खड़े किए। मामले को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिकाएं दायर हुईं। इसके बाद हाईकोर्ट ने रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता वाली एक सदस्यीय समिति गठित कर मामले की जांच कराई। समिति ने अपनी रिपोर्ट कोर्ट में जमा कर दी है। जांच की सबसे अहम बात यह है कि उपलब्ध जानकारी के अनुसार किसी जनप्रतिनिधि को इस घटना के लिए जिम्मेदार नहीं माना गया है। नगर निगम की मेयर-इन-काउंसिल यानी एमआईसी को भी क्लीन चिट दिए जाने की जानकारी है। कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी रिपोर्ट में जिम्मेदारी तय नहीं की गई है। इस तरह जांच का मुख्य फोकस राजनीतिक नेतृत्व के बजाय प्रशासनिक और तकनीकी स्तर की चूक पर रहा है।
जांच समिति की रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं
जांच समिति की रिपोर्ट फिलहाल सार्वजनिक नहीं की गई है और रजिस्ट्रार के पास सुरक्षित रखी गई है। संबंधित पक्षों के अधिवक्ता रजिस्ट्रार के पास जाकर रिपोर्ट का अध्ययन कर सकते हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से रिपोर्ट सार्वजनिक करने और उसकी प्रति उपलब्ध कराने की मांग अदालत के समक्ष रखी गई है। याचिकाकर्ता प्रमोद द्विवेदी की ओर से एडवोकेट मनीष यादव ने मामले में जवाबदेही तय करने के साथ पीडि़त परिवारों के मुआवजे के मुद्दे को भी उठाया है। उनका कहना है कि मामला केवल पिछली घटना की जांच तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए जिम्मेदारी और व्यवस्था दोनों तय होनी चाहिए।
