दतिया हार के बाद नरोत्तम की भूमिका पर सवाल

  • एक खेमा टिकट काटने को हार की वजह बता रहा, दूसरा भितरघात के सबूत दे रहा
  • गौरव चौहान
नरोत्तम

दतिया विधानसभा उपचुनाव में हार के बाद भाजपा के भीतर अब चुनावी नतीजे से ज्यादा हार की वजह और जिम्मेदारी तय करने को लेकर मंथन चल रहा है। पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की भूमिका को लेकर पार्टी में एक राय नहीं बन पा रही है। एक खेमा जहां उनकी सक्रियता को पार्टी प्रत्याशी के लिए मददगार बता रहा है और टिकट काटे जाने को हार की बड़ी वजह मान रहा है, वहीं दूसरा खेमा दतिया में हुए भितरघात को हार का मुख्य कारण बता रहा है। इसी बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के दिल्ली दौरे के बाद भाजपा प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल को भी दिल्ली बुलाया गया है। माना जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व दतिया हार की विस्तृत रिपोर्ट के साथ प्रदेश संगठन की स्थिति और आगे की रणनीति पर चर्चा करेगा। दतिया में हार के बाद प्रदेश संगठन ने वहां का पूरा संगठन भंग कर दिया था। प्रत्याशी आशुतोष तिवारी समेत चुनाव से जुड़े नेताओं से रिपोर्ट मांगी गई है। अब पार्टी के अगले कदम पर सभी की नजर है।
दतिया चुनाव परिणाम के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दिल्ली प्रवास के दौरान पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी रिपोर्ट और फीडबैक रखा है। इस दौरान उनकी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से करीब एक घंटे की मुलाकात भी हुई। अब प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल को दिल्ली बुलाए जाने को इसी सिलसिले की अगली कड़ी माना जा रहा है। दिल्ली रवाना होने से पहले खंडेलवाल की क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल से मुलाकात होगी। माना जा रहा है कि दतिया की हार के साथ-साथ प्रदेश के दूसरे जिलों में संगठन की स्थिति पर भी चर्चा होगी। केंद्रीय नेतृत्व यह जानना चाहता है कि दतिया में टिकट घोषित होने के बाद संगठन में जिस तरह सार्वजनिक असंतोष और विरोध सामने आया, उसकी पुनरावृत्ति दूसरे जिलों में तो नहीं हो रही।
नरोत्तम को लेकर भाजपा में दो खेमे
दतिया हार के बाद सबसे बड़ा सवाल पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की भूमिका को लेकर खड़ा हुआ है। पार्टी के कुछ नेता मानते हैं कि नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटे जाने से स्थानीय कार्यकर्ताओं में नाराजगी पैदा हुई। उनका तर्क है कि लंबे समय तक दतिया में सक्रिय रहे नेता को चुनाव मैदान से हटाने से संगठन का एक वर्ग निराश हुआ और इसका असर मतदान पर पड़ा। इन नेताओं का यह भी दावा है कि नरोत्तम मिश्रा ने चुनाव प्रचार में सक्रिय रहकर भाजपा प्रत्याशी के लिए काम किया। उनका कहना है कि यदि वे चुनाव में सक्रिय नहीं होते तो पार्टी प्रत्याशी को मिले वोटों का आंकड़ा और कम हो सकता था। इसलिए इस खेमे की दलील है कि नरोत्तम मिश्रा को दतिया की हार के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। दूसरी ओर पार्टी के कुछ नेता दतिया हार को सीधे तौर पर भितरघात और अंदरूनी असंतोष से जोड़ रहे हैं। इन नेताओं ने प्रदेश नेतृत्व को कुछ ऐसे साक्ष्य और फीडबैक दिए हैं, जिनके आधार पर चुनाव में पार्टी के खिलाफ काम करने वालों पर कार्रवाई की मांग की जा रही है। यानी पार्टी के भीतर फिलहाल दो अलग-अलग नैरेटिव चल रहे हैं। एक  नरोत्तम का टिकट काटना और स्थानीय असंतोष, दूसरा  संगठन के भीतर भितरघात और अनुशासनहीनता। केंद्रीय नेतृत्व के सामने अब इन्हीं दोनों दावों की वास्तविकता जांचना सबसे बड़ी चुनौती है।
हेमंत की दिल्ली यात्रा में बड़े फैसलों के संकेत
प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की दिल्ली यात्रा को सामान्य संगठनात्मक बैठक से अलग देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि खंडेलवाल दतिया चुनाव की रिपोर्ट के साथ प्रदेश के दूसरे जिलों के संगठन की स्थिति की जानकारी भी केंद्रीय नेतृत्व के सामने रखेंगे। दतिया की समीक्षा के बाद पार्टी के भीतर यह सवाल भी उठा है कि क्या सिर्फ दतिया संगठन की गलती थी या प्रदेश के दूसरे जिलों में भी इसी तरह के गुटीय समीकरण मौजूद हैं? इसी आधार पर कुछ और जिलों में संगठनात्मक बदलाव की संभावना जताई जा रही है।
11 जिलों के संगठन पर दिल्ली की नजर
दतिया में टिकट को लेकर जिस तरह भाजपा का स्थानीय संगठन सार्वजनिक तौर पर असहज दिखाई दिया, उसने पार्टी नेतृत्व को चिंता में डाल दिया है। भाजपा की अनुशासन वाली छवि के विपरीत दतिया में टिकट घोषित होने के बाद संगठन से जुड़े लोगों का विरोध और इस्तीफे चर्चा में रहे। इसके बाद प्रदेश संगठन ने उन जिलों की सूची तैयार कराई है जहां जिलाध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों की नियुक्तियां वरिष्ठ नेताओं की सिफारिश पर हुई हैं। सूत्रों के मुताबिक ऐसे 11 जिलों की रिपोर्ट तैयार की गई है। इनमें यह देखा जा रहा है कि जिलाध्यक्ष और संगठन के पदाधिकारी पार्टी संगठन के अनुसार काम कर रहे हैं या किसी विशेष नेता के प्रभाव में हैं। खंडेलवाल दिल्ली में इन जिलों की स्थिति की जानकारी केंद्रीय नेतृत्व के साथ साझा कर सकते हैं। अगर केंद्रीय नेतृत्व को लगता है कि इन जिलों में संगठन कमजोर है या गुटीय राजनीति हावी है, तो राष्ट्रीय टीम के गठन के बाद जिला संगठनों में बड़े बदलाव किए जा सकते हैं। दतिया को पार्टी एक चेतावनी के रूप में देख रही है—टिकट को लेकर स्थानीय संगठन में असंतोष अगर चुनाव के दौरान खुलकर सामने आया तो उसका सीधा असर नतीजों पर पड़ सकता है।

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