
- दतिया उपचुनाव ने बढ़ाई भाजपा की चुनौती
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
दतिया विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस की जीत और भाजपा की हार ने मध्य प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर दिए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार के कार्यकाल में यह तीसरा विधानसभा उपचुनाव था, लेकिन भाजपा केवल एक सीट बचाने में सफल रही, जबकि कांग्रेस ने दो सीटों पर जीत दर्ज कर सत्ता पक्ष की चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। लगातार दूसरे उपचुनाव में मिली हार को भाजपा के लिए केवल एक चुनावी झटका नहीं, बल्कि 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।
मोहन सरकार के कार्यकाल में अब तक तीन विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए। इनमें भाजपा को केवल अमरवाड़ा में सफलता मिली, जबकि विजयपुर और अब दतिया में उसे पराजय का सामना करना पड़ा। पहला उपचुनाव जुलाई 2024 में छिंदवाड़ा जिले की अमरवाड़ा विधानसभा सीट पर हुआ। यहां भाजपा प्रत्याशी कमलेश शाह ने कांग्रेस उम्मीदवार धीरन शाह इनवाती को 3,252 मतों से हराकर सीट अपने नाम की थी। इसके बाद नवंबर 2024 में विजयपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी मुकेश मल्होत्रा ने भाजपा के रामनिवास रावत को 7,288 मतों से पराजित कर भाजपा को बड़ा झटका दिया। अब दतिया उपचुनाव में भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। इस तरह तीन में से दो उपचुनाव कांग्रेस के खाते में चले गए और भाजपा लगातार दूसरे उपचुनाव में पराजित हुई।
सत्ता का लाभ भी नहीं दिला सका जीत
आमतौर पर उपचुनावों में सत्तारूढ़ दल को सरकारी मशीनरी, संगठनात्मक नेटवर्क और सत्ता के प्रभाव का लाभ मिलने की बात कही जाती है। दतिया में भी मुख्यमंत्री, मंत्री, संगठन और स्थानीय नेतृत्व ने पूरा चुनावी जोर लगाया, लेकिन इसके बावजूद भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी जीत दर्ज नहीं कर सके। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार दो उपचुनावों में मिली हार भाजपा के लिए संगठनात्मक समीक्षा का विषय बन सकती है। यह परिणाम स्थानीय असंतोष, उम्मीदवार चयन और चुनावी रणनीति जैसे मुद्दों पर भी चर्चा को बढ़ाएगा। गौरतलब है कि अमरवाड़ा और विजयपुर दोनों सीटों पर उपचुनाव राजनीतिक दल-बदल के कारण हुए थे। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाले कमलेश शाह और रामनिवास रावत ने लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली थी। उनके इस्तीफे के बाद इन दोनों सीटों पर उपचुनाव कराए गए। अमरवाड़ा में भाजपा सीट जीतने में सफल रही, लेकिन विजयपुर में कांग्रेस ने सीट वापस हासिल कर ली। अब दतिया में भी कांग्रेस की जीत ने भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
दतिया की हार से नरोत्तम मिश्रा की दावेदारी मजबूत?
दतिया में भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी की हार के बाद पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक वापसी को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि आशुतोष तिवारी उपचुनाव जीतकर विधायक बन जाते, तो 2028 के विधानसभा चुनाव में सिटिंग विधायक होने के कारण उनका टिकट बदलना पार्टी के लिए आसान नहीं होता। अब हार के बाद भाजपा के पास उम्मीदवार चयन के सभी विकल्प खुले हैं और ऐसे में डॉ. मिश्रा एक बार फिर दतिया से टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। हालांकि अंतिम फैसला भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व और संसदीय बोर्ड ही करेगा।
दतिया से रहा है नरोत्तम मिश्रा का मजबूत राजनीतिक रिश्ता
डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने वर्ष 2008 में पहली बार दतिया विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया था। इसके बाद वे लगातार तीन बार इस सीट से विधायक चुने गए और प्रदेश सरकार में महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी भी संभाली। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, जिसके बाद दतिया सीट भाजपा के हाथ से निकल गई। इससे पहले वे डबरा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे, लेकिन परिसीमन के बाद डबरा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने पर उन्होंने दतिया को अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाया। दतिया उपचुनाव में भी वे टिकट के दावेदार थे, लेकिन पार्टी ने आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया।
2028 की रणनीति पर असर
दतिया के नतीजे केवल एक सीट की हार-जीत तक सीमित नहीं हैं। लगातार दो उपचुनाव हारने के बाद भाजपा को संगठन, उम्मीदवार चयन और स्थानीय मुद्दों पर नई रणनीति बनानी पड़ सकती है। दूसरी ओर कांग्रेस इस जीत को आगामी विधानसभा चुनावों से पहले कार्यकर्ताओं के मनोबल और संगठनात्मक मजबूती के रूप में देख रही है। राजनीतिक दृष्टि से दतिया उपचुनाव का संदेश स्पष्ट है कि मध्य प्रदेश में आने वाले चुनावों से पहले दोनों प्रमुख दलों के लिए स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार चयन और जनसंपर्क की रणनीति निर्णायक भूमिका निभाएगी।
