- पटवारी और सिंघार ने कांग्रेस आलाकमान को सुझाए अपने-अपने फॉर्मूले

गौरव चौहान
मप्र की राजनीति में राज्यसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस ने अंदरखाने रणनीति बनाना शुरू कर दिया है। इस बीच कांग्रेस में नेतृत्व और संगठन को लेकर चल रही अंदरूनी खींचतान भी खुलकर सामने आने लगी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के अलग-अलग दिल्ली दौरे ने पार्टी के भीतर चल रहे पॉवर गेम की चर्चाओं को और हवा दे दी है।
कांग्रेस को सबसे बड़ा डर इस बात का सता रहा है कि सत्ता में बैठी भाजपा क्रॉस वोटिंग के जरिए उसके हिस्से की संभावित सीट भी छीन सकती है। यही कारण है कि पार्टी नेतृत्व प्रत्याशी चयन से लेकर विधायकों की एकजुटता तक हर पहलू पर सतर्क नजर बनाए हुए है। कुछ दिन पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने दिल्ली पहुंचकर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की थी। इस दौरान प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी भी मौजूद रहे। सूत्रों के अनुसार पटवारी ने राज्यसभा उम्मीदवारों के नामों को लेकर अपना फीडबैक केंद्रीय नेतृत्व को सौंपा। इसी कड़ी में सोमवार को नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भी दिल्ली पहुंचे और उन्होंने मल्लिकार्जुन खरगे से करीब एक घंटे तक बंद कमरे में चर्चा की। बताया जा रहा है कि सिंघार ने स्पष्ट रूप से नेतृत्व को आगाह किया कि यदि उम्मीदवार चयन और विधायकों की निगरानी में सावधानी नहीं बरती गई तो भाजपा कांग्रेस की सीट पर भी कब्जा कर सकती है। उन्होंने भाजपा द्वारा कांग्रेस विधायकों से संपर्क साधे जाने की आशंका जताते हुए राज्यसभा सीट बचाने का एक फॉर्मूला भी नेतृत्व के सामने रखा। सूत्रों का कहना है कि सिंघार ने अपने सुझाव लिखित रूप में भी कांग्रेस अध्यक्ष को सौंपे हैं।
संगठन की कमजोरी पर भी हुई चर्चा
राज्यसभा चुनाव के बहाने कांग्रेस में संगठनात्मक कमजोरी का मुद्दा भी फिर सामने आ गया है। बताया जाता है कि उमंग सिंघार ने राष्ट्रीय नेतृत्व को प्रदेश संगठन की स्थिति पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि भाजपा बूथ स्तर तक बेहद सक्रिय है और हर जिले में उसका मजबूत नेटवर्क काम कर रहा है, जबकि कांग्रेस अभी भी कई क्षेत्रों में कमजोर स्थिति में है। सिंघार ने निकाय चुनाव से पहले संगठन को मजबूत करने की जरूरत पर जोर देते हुए सुझाव दिया कि जिला और ब्लॉक स्तर पर नए सिरे से सक्रियता बढ़ाई जाए। उन्होंने कुछ जिलों में संगठन की कमजोरी का उल्लेख करते हुए वहां विशेष रणनीति बनाने की आवश्यकता बताई। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस के भीतर चल रही यह समानांतर गतिविधियां पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती हैं। पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि जब प्रदेश नेतृत्व ही अलग-अलग रणनीति के साथ दिल्ली दरबार में पहुंच रहा है, तब कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति बनना स्वाभाविक है। उनका कहना है कि कांग्रेस का यही आंतरिक शक्ति संघर्ष उसे लगातार सत्ता से दूर रखे हुए है।
भाजपा भी साध रही जातीय समीकरण
दूसरी ओर भाजपा ने भी राज्यसभा चुनाव को लेकर अपनी रणनीति तेज कर दी है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक भाजपा इस चुनाव के जरिए जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश करेगी। यदि पार्टी स्थानीय नेताओं को राज्यसभा भेजने का फैसला करती है, तो सवर्ण नेताओं को प्राथमिकता मिल सकती है। संभावित नामों में पूर्व मंत्री अरविंद भदौरिया, पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष कांतदेव सिंह के अलावा पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा और सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के नाम प्रमुखता से चर्चा में हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि भाजपा कैलाश विजयवर्गीय को राज्यसभा भेजकर उन्हें एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका दे सकती है। पार्टी उन्हें संसदीय बोर्ड में शामिल करने जैसे विकल्पों पर भी विचार कर सकती है। वहीं डॉ. नरोत्तम मिश्रा के नाम को लेकर भी अटकलें जारी हैं। माना जा रहा है कि यदि वे दतिया की राजनीति से हटकर दिल्ली की भूमिका पसंद करते हैं तो पार्टी उनके नाम पर भी गंभीरता से विचार कर सकती है। भाजपा के सामने जातीय संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी है। वर्तमान में मध्यप्रदेश से भाजपा के राज्यसभा सांसदों में पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व पहले से मौजूद है। ऐसे में पार्टी एक सीट पर सवर्ण और दूसरी सीट पर अनुसूचित जनजाति वर्ग के चेहरे को मौका देने की रणनीति बना सकती है। सूत्रों का कहना है कि यदि चुनावी गणित ऐसा बना कि भाजपा तीसरी सीट पर भी दांव लगाए, तो वहां भी किसी प्रभावशाली सवर्ण चेहरे को मैदान में उतारा जा सकता है। कुल मिलाकर राज्यसभा चुनाव को लेकर मध्यप्रदेश में राजनीतिक बिसात बिछ चुकी है और आने वाले दिनों में कांग्रेस तथा भाजपा दोनों में अंदरूनी समीकरण और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।
