
- कांग्रेस में तालमेल का अभाव, आलाकमान परेशान
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। 2023 की हार के बाद कांग्रेस आलाकमान ने मप्र कांग्रेस संगठन में भले ही आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया है, लेकिन पठ्ठेबाजी और गुटबाजी का रोग फिर भी खत्म नहीं हुआ है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि कांग्रेस संगठन और विधायक दल के बीच समन्वय की कमी दिख रही है। मप्र कांग्रेस में तालमेल का अभाव इस कदर देखने को मिल रहा है कि इससे पार्टी पर लगातार खतरा मंडरा है। इससे पार्टी की मुश्किलें बढ़ी हुई हैं। जिसका असर राज्यसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है।
गौरतलब है कि मप्र में बीते कुछ समय में कांग्रेस के लिए संकट के बादल छंटने का नाम नहीं ले रहे हैं। इस साल जून में राज्य में तीन सीटों पर राज्यसभा चुनाव होने हैं। इससे पहले कांग्रेस की एक विधायक के बारे में माना जा रहा है कि वह भाजपा के साथ चलीं गईं हैं वहीं दो अन्य विधायकों में से एक वोट नहीं कर सकता है और तीसरे को तीन साल की सजा हो गई है। ऐसे में राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ती दिख रहीं हैं। जून में संभावित राज्यसभा चुनाव के पहले मप्र कांग्रेस संगठन और विधायक दल के बीच समन्वय की कमी दिख रही है। इससे पार्टी की मुश्किलें बढ़ी हुई हैं। प्रदेश में पार्टी की स्थिति को देखकर आलाकमान परेशान है।
नेतृत्व केवल चुनींदा नेताओं के साथ
मप्र कांग्रेस के भीतर यह धारणा बन रही है कि संगठन विधायकों की कानूनी और राजनीतिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रहा है। कुछ विधायकों और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच इस बात को लेकर भी असंतोष है कि नेतृत्व केवल चुनींदा नेताओं पर ध्यान दे रहा है। इससे विधायक दल में बिखराव जैसी स्थिति बन रही है। दतिया से विधायक रहे राजेंद्र भारती की अयोग्यता को रोकने के लिए प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने देर रात विधानसभा सचिवालय में विरोध दर्ज कराया, लेकिन कुछ लोग इसे नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के अधिकारों पर अतिक्रमण मान रहे हैं। इस मामले ने विधायकों के छिटकने जैसी चिंताओं को बढ़ा दिया है। यह स्थिति राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए चुनौती बन सकती है। बता दें, मध्य प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव में कांग्रेस को एक सीट सुरक्षित करने के लिए 58 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता है। राजेंद्र भारती की सदस्यता जाने के बाद कांग्रेस के पास अब 62 विधायकों के वोट बचे हैं, लेकिन क्रास-वोटिंग के डर और अंदरूनी असंतोष ने पार्टी की चिंता बढ़ा दी है। तालमेल का अभाव और आंतरिक कलह अब केवल बंद कमरों की चर्चा नहीं, बल्कि सडक़ों और विधानसभा की दहलीज तक दिखाई देने लगी है। कुछ दिन पहले विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष हेमंत कटारे का इस्तीफा भी इसी खींचतान का परिणाम बताया जा रहा है। मध्य प्रदेश कांग्रेस के महासचिव एवं संगठन प्रभारी डा. संजय कामले ने बताया कि विधायकों के अधिकार की सुरक्षा न कर पाने जैसी कोई बात नहीं है। जिन विधायकों पर अभी कार्रवाई हुई है वे उनके निजी और पुराने कानूनी मामले हैं। पार्टी संगठन में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद सर्वोपरि है, विधायक भी संगठन के अंतर्गत ही हैं। सभी मिलकर भाजपा के राज्यसभा चुनाव के मंसूबों पर पानी फेर देंगे।
घटती जा रही विधायकों की संख्या
मध्य प्रदेश में बीते कुछ समय में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए संकट के बादल छंटने का नाम नहीं ले रहे हैं। इस साल जून में राज्य में तीन सीटों पर राज्यसभा चुनाव होने हैं। इससे पहले कांग्रेस की एक विधायक के बारे में माना जा रहा है कि वह भारतीय जनता पार्टी के साथ चलीं गईं हैं वहीं दो अन्य विधायकों में से एक वोट नहीं कर सकता है और तीसरे को तीन साल की सजा हो गई है। ऐसे में राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ती दिख रहीं हैं। वर्ष 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में 66 सीटें जीतने वाली कांग्रेस अब 64 तक आ पहुंची है। वहीं तीन और विधायकों की कमी से विधानसभा में उसकी संख्या 61 तक दिख रही है। ऐसे में माना जा रहा है कि राज्यसभा में 2 सीटें, भारतीय जनता पार्टी आराम से जीत सकती है। वहीं तीसरी के लिए कांग्रेस को संघर्ष करना पड़ सकता है भले ही उसके पास पर्याप्त मत हैं। फिलहाल एमपी से बीजेपी के जॉर्ज कुरियन, सुमेर सिंह सोलंकी और कांग्रेस से दिग्विजय सिंह राज्यसभा सांसद हैं।
