
- विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता जाते ही बदला राज्यसभा का गणित
गौरव चौहान/भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र की राजनीति में दतिया से कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होना सिर्फ एक सीट का खाली होना नहीं है बल्कि यह आगामी राज्यसभा चुनाव का पूरी अंकगणित बदल देने वाला घटनाक्रम साबित हो सकता है. ऐसे समय में जब राज्यसभा की हर एक वोट निर्णायक होती है, कांग्रेस के लिए यह झटका दोहरी मार बनकर सामने आया है. दरअसल, दिल्ली की एमपी-एमएलए कोर्ट ने बैंक फर्जीवाड़े से जुड़े मामले में राजेंद्र भारती को तीन साल की सजा सुनाई. इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने सुप्रीम कोर्ट के 10 जुलाई 2013 के आदेश के पालन में संविधान के अनुच्छेद 191(1)(ई) और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 के तहत उन्हें 2 अप्रैल से अयोग्य घोषित कर दिया. यानी सजा दो साल से अधिक होते ही सदस्यता स्वत: समाप्त. कांग्रेस ने इसे संविधान खत्म करने वाला कदम बताया, जबकि भाजपा इसे पूरी तरह न्यायिक प्रक्रिया के तहत लिया गया निर्णय बता रही है. लेकिन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से बाहर इस सीट के रिक्त होने का सीधा असर राज्यसभा की रणनीति पर पडऩे वाला है.राज्यसभा चुनाव में विधायकों की संख्या ही असली ताकत होती है. एक-एक वोट से सीटों का समीकरण तय होता है. दतिया सीट रिक्त होने से कांग्रेस का संख्या बल घट गया है, और यह उस वक्त हुआ है जब पार्टी पहले से ही दबाव में है./
विधानसभा सचिवालय की इस कार्रवाई से प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र को कमजोर करने आरोप लगाते हुए मामले में उच्च न्यायालय जाने की बात कही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त किए जाने के मामले में राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली से स्पेशल मैसेज आया, जिसके बाद राजेंद्र भारती के खिलाफ कार्रवाई की गई। उन्होंने कहा कि भारती के मामले में कांग्रेस अलर्ट है। जैसे मैने कहा था कि मुकेश मल्होत्रा फिर विधायक बनेंगे। लोकतंत्र के हत्यारे लोग कितनी भी कोशिश कर लें, राजेंद्र भारती फिर से विधायक बनेंगे। सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट विवेक तन्खा, कपिल सिब्बल और उनकी टीम मामले को शीर्ष न्यायालय में ले जाने की तैयारी कर रही है। पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह भी सक्रिय हैं। उन्होंने कहा कि मप्र और देश में भाजपा, आरएसएस और नरेंद्र मोदी ने लोकतांत्रिक मूल्यों को समाप्त कर दिया है।
इनती जल्दबाजी क्यों?
पटवारी ने कहा कि राजेंद्र भारती को दिल्ली की कोर्ट ने उच्च न्यायालय में जाने के लिए 60 दिन का समय दिया है और सदस्यता समाप्ति पर कोई बात नहीं कही। भारती को 60 दिन का समय देकर कोर्ट ने संदेश दिया कि अभी उनकी सदस्यता समाप्त नहीं की जा सकती, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने सरकार के दबाव में भारती की सदस्यता समाप्त करने का अपराध किया है। आखिर इतनी जल्दबाजी क्यों की गई। पटवारी ने आगे कहा कि नरोत्तम मिश्र के खिलाफ पेड न्यूज का मामला इसी कोर्ट में लंबित है। उन्होंने दो कार्यकाल पूरे किए और तीसरा चुनाव हार गए, लेकिन अब तक कोई निर्णय नहीं हुआ। विधायक निर्मला सप्रे के केस को कैसे डिले करें, इसके लिए विधानसभा अध्यक्ष नए-नए हथकंडे अपनाते रहते हैं। राज्यसभा चुनाव के सवाल पर उन्होंने कहा कि राजेंद्र भारती के खिलाफ कार्रवाई भाजपा का राज्यसभा चुनाव का एक माध्यम है कि अभी कांग्रेस के विधायक कम करो, फिर वे राज्यसभा के चुनाव पर अटैक करेंगे। हम पूरी तरह से सजग है। कांग्रेस का मेंबर 100 प्रतिशत राज्यसभा जाएगा। हमें कोई डर नहीं है। रात में विस जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि मैं पूर्व विधायक हूं और 65 विधायकों की पार्टी का अध्यक्ष हूं तो मैं विधानसभा क्यों नहीं जा सकता? इसमें गलत क्या है? वहीं विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंधार ने कहा कि जब मामला न्यायालय में है और समय दिया गया है, तो फिर इतनी जल्दबाजी क्यों? दतिया से विधायक राजेंद्र भारती के मामले में आधी रात को विधानसभा सचिवालय खोलकर उनकी विधायकी समाप्त कर दी गई। यह साफ है कि राज्यसभा चुनाव से पहले भाजपा हर संभव प्रयास कर रही है कि विपक्ष के विधायकों को किसी भी तरह प्रक्रिया से बाहर किया जाए, लेकिन भाजपा यह याद रखें पूरी कांग्रेस अपने विधायकों के साथ मजबूती से खड़ी है और हर स्तर पर, हर मंच पर, संवैधानिक और कानूनी तरीके से इस लड़ाई को लड़ेगी।
विधानसभा की कार्रवाई विधिसंगत: सारंग
कांग्रेस के आरोपों का जवाब देते हुए सहकारिता, खेल एवं युवा कल्याण विभाग मंत्री विश्वास सारंग ने राजेंद्र भारती की विधानसभा सदस्यता समाप्त होने पर कहा कि कांग्रेस देश में हर संवैधानिक प्रक्रिया का विरोध करने की आदी हो चुकी है। एक ओर कांग्रेस के नेता संविधान की रक्षा की बात करते है, वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचार को संरक्षण देने के लिए लगातार संविधान की धज्जियां उड़ाने का कार्य करते हैं। सारंग ने कहा कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और पूर्व विधायक पीसी शर्मा ने विधानसभा के सदस्य ना होने के बावजूद असंवैधानिक तरीके से विधानसभा सचिवालय में प्रवेश कर एक भ्रष्टाचारी व्यक्ति को संरक्षण देने का प्रयास किया, जो पूर्णत: गैरकानूनी है। सारंग ने कहा कि भारती का मामला एक गंभीर भ्रष्टाचार का प्रकरण है। यह भ्रष्टचार उस समय का है, जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे। उन्होंने कहा कि राजेंद्र भारती ने अमानत में खयानत करते हुए अपनी माताजी के खाते के माध्यम से करोड़ों रुपये की हेराफेरी की। साथ ही उन्होंने न्यायालय को भ्रमित करने का भी प्रयास किया और मप्र में निष्पक्ष न्याय न मिलने की आशंका व्यक्त की थी। दिल्ली की अदालत ने गुण-दोष के आधार पर भारती को दोषी करार दिया और मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्हें तत्काल तिहाड़ जेल भेजा गया। भारत के संविधान एवं कानून में प्रत्येक परिस्थिति के लिए स्पष्ट प्रावधान हैं। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8(3) के अनुसार, यदि किसी जनप्रतिनिधि को दो वर्ष या उससे अधिक की सजा होती है, तो उसकी सदस्यता स्वत: समाप्त हो जाती है तथा वह छह वर्षों तक चुनाव लडऩे के लिए अयोग्य हो जाता है। मंत्री सारंग ने उदाहरण देते हुए कहा कि कांग्रेस की सरकार के समय जब पवई से भाजपा विधायक प्रह्लाद लोधी को एक मामले में 2 वर्ष की सजा हुई थी। उस समय के तात्कालिक स्पीकर एनपी प्रजापति ने भी यही निर्णय लिया था और लोधी की सदस्यता खत्म कर दी गई थी। इस पूरे मामले में कानून का उल्लंघन करने का कार्य जीतू पटवारी और कांग्रेस नेता पीसी शर्मा द्वारा किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों नेता विधानसभा के सदस्य न होने के बावजूद गैरसंवैधानिक तरीके से विधानसभा में प्रवेश कर सरकारी कार्य में बाधा डालने का प्रयास कर रहे थे, जो दंडनीय अपराध है। वहीं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमत खंडेलवाल ने कहा कि यह मामला पूरी तरह न्यायालय से जुड़ा है और इसमें किसी भी राजनीतिक दल की सीधी भूमिका नहीं है। हेमंत खंडेलवाल ने कहा कि कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई की है और सभी दलों को न्यायालय के निर्णय का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाजपा न्यायालय के फैसले का पूर्ण समर्थन करती है और उसके निर्देशों का पालन किया जाएगा। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि सदस्यता समाप्ति या उपचुनाव से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार भारत निर्वाचन आयोग और विधानसभा अध्यक्ष के पास है, जो संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।
