
- दो हिस्सों में बंटे विभागीय कार्यालयों ने बढ़ाई उलझन
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र में उच्च शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली इस कदर गड़बड़ाई हुई है कि एक को सुधारने में दूसरी उलझन बढ़ जा रही है। खासकर प्रोफेसरों की वरिष्ठता सूची तो ऐसी गड़बड़ाई है कि किसी को कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है। आलम यह है कि उच्च शिक्षा विभाग ने 2011 के बाद से असिस्टेंट प्रोफेसरों की वरिष्ठता सूची ही नहीं बनाई है, जबकि नियमानुसार यह ग्रेडेशन लिस्ट हर साल या अधिकतम 3 साल में जारी होनी चाहिए थी। हैरानी की बात यह है कि वर्ष 2024 में तत्कालीन आयुक्त निशांत वरवड़े के कार्यकाल में जो प्रोविजनल सूची जारी हुई थी, विभाग ने अब उसे रिजेक्ट कर दिया है। अब विभाग 2026 में वापस पीछे लौट गया और 2012 की प्रोविजनल सूची जारी कर दी है। एक ओर इससे प्रोफेसर्स की सीनियरिटी को लेकर असमंजस और बढ़ गया हैं।
नियमानुसार 2024 में जारी सूची को अद्यतन मानते हुए 2023 तक की स्थिति स्पष्ट मानी जा रही थी। इसके विपरीत 2026 में 2012 की प्रोविजनल सूची जारी होना यह दर्शाता है कि अभी विभाग को केवल 2011 तक की स्थिति स्पष्ट है। 2012 से नियमित तौर पर सूची न बनाना और अब पिछले दो साल में आयुक्त कार्यालय और मंत्रालय स्तर पर अलग-अलग कार्यवाही करना प्रश्न खडे करता है। सूत्रों के अनुसार नई सूची पर विभाग को ढेरों आपत्तियां मिल चुकी हैं। इन विसंगतियों के चलते आने वाले दिनों में कोर्ट केस बढऩे की पूरी संभावना जताई जा है, जिससे पूरी प्रक्रिया और अधिक उलझ सकती है।
सामने आ रही खामियां
इधर, 2012 की सूची में 2006 से 2009 के बीच के कई ऐसे शिक्षकों को असिस्टेंट प्रोफेसर बताया गया है, जो अब एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर बन चुके हैं। इन्हें वर्ष 2018 में डीपीसी की अनुशंसा के बाद प्रोफेसर का पदनाम दिया जा चुका था। पदनाम का लाभ लेकर 933 शिक्षक प्रोफेसर बन चुके हैं और आगे चलकर इनमें से कई एडिशनल डायरेक्टर, कुलगुरु व प्राचार्य जैसे पदों तक पहुंच गए। इन पदों पर रहते हुए उन्होंने अपने से वरिष्ठ प्रोफेसरों की गोपनीय प्रविष्टियां (सीआर) तक लिखीं। वहीं करीब 70 प्राफेसर जिन्हें यह लाभ नहीं मिला, उन्हें न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। अब 2025 में कोर्ट में विभाग ने कहा है कि भर्ती नियमों में पदनाम का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे में पदनाम के आधार पर हुए प्रमोशन, नियुक्तियां और उनसे जुड़े प्रशासनिक निर्णयों की स्थिति को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। भर्ती नियमों में हर दस साल में यूजीसी रेगुलेशन को समन्वित किया जाना चाहिए, लेकिन प्रदेश में लंबे समय से इसमें संशोधन नहीं किया गया। सूत्रों के अनुसार 1990 के बाद 2015 में केवल आंशिक संशोधन किया गया। अब कहीं 2018 के नियमों से प्रोफेसरों की सीआर लिखी जा रही है, जबकि कई प्रक्रियाएं पुराने नियमों से संचालित हो रही हैं। यही असंगति विभागीय निर्णयों को और उलझा रही है। विभाग के अधिकारियों ने बताया कि नियमानुसार हर साल ग्रेडेशन यानी सीनियरिटी लिस्ट बननी चाहिए, लेकिन 2011 के बाद से सूची नहीं बनी। 2024 में तत्कालीन आयुक्त ने जो सूची बनाई थी, अब वह अस्तित्व में नहीं है। अभी विभाग ने जो 2012 की प्रोविजनल सूची जारी की है, प्रक्रियानुसार उसे फाइनल किया जाएगा। उसे बेसलाइन मानते हुए जल्द ही आगे के वर्षों की सूची तैयार की जाएगी। प्रांताध्यक्ष शासकीय महाविद्यालयीन प्राध्यापक संघ प्रो. आनंद शर्मा का कहना है कि मंत्रालय और आयुक्त कार्यालय के बीच समन्वय की कमी स्पष्ट है। 2024 में प्रोविजनल सूची के बाद फाइनल सूची आनी चाहिए थी, लेकिन 2026 में 2012 की प्रोविजनल सूची जारी कर दी गई है, इससे असमंजस बढ़ा है। स्पष्टता के लिए विभाग का रूख किया जाता है लेकिन यहां तो उलझन ही उलझन है। वहीं एसीएस उच्च शिक्षा विभाग अनुपम राजन का कहना है कि विभाग की ओर से जारी 2012 की प्रोविजनल सूची को जल्द ही अंतिम स्वरूप दिया जाएगा। यही सूची फाइनल होगी।
