
- आयुष्मान योजना से बाहर नहीं होंगे 300 से ज्यादा निजी अस्पताल
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। भोपाल सहित प्रदेश के 300 से अधिक उन निजी अस्पतालों को फिलहाल आयुष्मान भारत योजना से बाहर नहीं किया जाएगा जिनके पास एनएबीएच यानी नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स का अनिवार्य इंट्री लेवल प्रमाणपत्र नहीं है। आयुष्मान भारत निरामयम योजना के तहत मरीजों को मुफ्त इलाज देने वाले निजी अस्पतालों को मप्र सरकार ने राहत पहुंचाई है। एक अप्रैल से लागू होने वाली एनएबीएच फाइनल लेवल सर्टिफिकेट की शर्त को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। गौरतलब है कि यह शर्त प्रदेश के चार जिलों भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर के निजी अस्पतालों पर लागू होना थी। लेकिन अंतिम समय में स्वास्थ्य विभाग ने अपना निर्णय बदल लिया। हालांकि स्वास्थ्य विभाग ने उक्त चारों जिलों के सभी निजी अस्पतालों को अगले दो साल का समय दिया है, इन दो साल में अस्पतालों को एनएबीएच का फाइनल लेवल सर्टिफिकेट लेना होगा। जानकारी के अनुसार, आयुष्मान भारत निरामयम मप्र के अधिकारियों ने बताया कि हमने एनएबीएच का फाइनल लेवल सर्टिफिकेट अनिवार्य किया था। दरअसल सितंबर 2025 में आयुष्मान भारत निरामय मप्र के सीईओ योगेश भर्सट ने एक आदेश जारी किया था। इस आदेश में लिखा था कि भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर के ऐसे निजी अस्पताल, जो आयुष्मान योजना के तहत इम्पैनल्ड हैं और मरीजों को 5 लाख तक का मुफ्त उपचार दे रहे हैं। वह अस्पताल अप्रैल 2026 से पहले एनएबीएच का फाइनल लेवल सर्टिफिकेट लेकर कार्यालय में जमा करें। यदि ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें आयुष्मान योजना की सूची से बाहर कर दिया जाएगा और वह मरीजों को मुफ्त इलाज नहीं कर सकेंगे।
55 अस्पतालों के पास ही एनएबीएच प्रमाण पत्र
बीते छह महीने में सिर्फ 55 अस्पताल ऐसे मिले, जिनके पास यह प्रमाण पत्र है। यह संख्या सभी चार जिलों को मिलाकर है। यदि हम अपने नियम को सख्ती से लागू करते तो बहुत से अस्पताल सूची से बाहर हो जाते। इससे सबसे ज्यादा परेशानी गरीब मरीजों को होती। हमने मरीजों की सहूलियत के लिए फिलहाल नियम को लागू करने से रोक लिया है। क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया के तहत अस्पतालों को एनएबीएच सर्टिफिकेट दिया जाता है। इसके तीन स्तर होते हैं, इंट्री, प्रोग्रेसिव और फाइनल। यह अस्पतालों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने का मानक है। जिसमें संक्रमण नियंत्रण, बायोमेडिकल वेस्ट प्रबंधन, ऑपरेशन थिएटर के मानक, स्टाफ प्रशिक्षण, मरीज सुविधाएं और रिकॉर्ड प्रबंधन जैसे पहलुओं का गहन मूल्यांकन किया जाता है। जैसे जैसे प्रमाण पत्र का स्तर बढ़ता जाता है, वैसे वैसे अस्पताल की क्वालिटी भी बढ़ती जाती है। फाइनल लेवल प्रमाण पत्र हासिल करना हर किसी निजी अस्पताल के लिए आसान नहीं है। यही कारण है कि इस नियम का निजी अस्पतालों ने मिलकर विरोध भी किया था।
