‘जैसे कि कुछ हुआ ही न हो’ मगर… सब-कुछ करते जा रहे मोहन यादव

मोहन यादव
  • अवधेश बजाज कहिन

‘ना, निरापद कोई नहीं है’ अजर अमर पंक्तियों के रचयिता भवानी प्रसाद मिश्र जब याद आते हैं, तब भीतर तक हिला देने वाला सच मन-मस्तिष्क को तब-तब मथता जाता है, जब-तक कि नया वैचारिक नवनीत स्वयं पर कब्जा न कर ले। फिर भी निरापद न रहते हुए तमाम आपदाओं के सहज और सुखद अतिक्रमण का विषय आता है तो डॉ. मोहन यादव की बात सहसा ही विचारों पर अधिकार जमा लेती है। आज बुधवार को अपना जन्मदिन मना रहे डॉ. यादव जब-तब उज्जैन के सांदीपनि आश्रम की बात करते हैं। भगवान कृष्ण के उल्लेख के साथ। डॉ. यादव सतयुग से लेकर त्रेता और द्वापर के भी सजीव उदाहरण देते हैं। कृष्ण ने कंस का संहार किया और राम ने ‘भय बिन होए न प्रीत’ के साथ रावण को ख़त्म किया।  मोहन यादव जब इन कालखंड की बात करते हैं, तो इनके अनुरूप ही उदाहरण भी गढ़ते हैं। बात राम या कृष्ण से मोहन यादव की तुलना वाली हिमाकत की नहीं है, लेकिन बात मिलते-जुलते उदाहरणों की तो हो ही सकती है। सीधी में कलेक्टर और गुना में पुलिस अधीक्षक को हटाना यह बताता है कि मध्यप्रदेश  एक बेहद लंबे अरसे के बाद फिर से ‘जितना गलत, उतना सख्त’ वाले रास्ते पर चल पड़ा है। और ये अपने आप में पहला मौका नहीं है। क्योंकि 13 दिसंबर, 2023 को मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद से डॉ. यादव ने अनेक कड़े और बड़े फैसलों से यह पुख्ता संकेत स्थापित कर दिया है कि राज्य की जनता सिस्टम के हिसाब से नहीं चलेगी, बल्कि सिस्टम को जनता के हिसाब से ही चलना होगा। बल्कि अब तो ‘चलते ही रहना होगा’ कहना भी अतिशयोक्ति नहीं लग रहा है।
इस सबके बीच डॉ. मोहन यादव की खास बात यह कि उन्होंने तंत्र को सुधारने के अपने निर्णयों में कभी भी ‘प्रचार की भूख’ का परिचय नहीं दिया। कठोर निर्णय लिए और फिर ऐसे निर्विकार हो गए, ज्यों धर्मवीर भारती ‘गुनाहों का देवता’ के अंत में लिखते हैं, ‘जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो।’ ऐसा शायद इसलिए कि डॉ.यादव ने प्रचार को एक कोने में रखकर अच्छे शासन के प्रचार को साकार करने की तरफ ही पूरा ध्यान केंद्रित किया है। न वो देवता बनने के दंभ में आए और न ही गुनाहों को अपने आसपास भी फटकने दिया।वो तो सियासी कर्मकांड से अधिक आग्रह अपने सियासी कर्म-धर्म के लिए रखते हैं। इसीलिए यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए राज्य में अनीति के खिलाफ फैसला केवल ‘ऑन दि स्पॉट’ ही नहीं, बल्कि गलत के गाल पर ‘तड़ाक’ वाले तमाचे के रूप में भी होने लगा है। हां, इस सबसे सर्वथा विपरीत ध्रुव पर खड़े होकर देखें तो साफ दिखता है कि मोहन यादव ने सच के प्रति ‘ऑन दि स्पॉट’ के लिहाज से राज्य को ‘न्याय के लिए नीयत साफ’ वाले मुकाम पर भी पहुंचा दिया है। ये-सब समझने के लिए किसी बड़े प्रयास की जरूरत नहीं है। किसी सार्वजनिक आयोजन से लेकर निजी जीवन में भी डॉ. यादव को देख लीजिए। आप पाएंगे कि वो ‘मुखिया मुख सो चाहिए…’  के अनुसरण में वह आगे बढ़ते ही जा रहे हैं। बाकी निरापद चाहे कोई भी न हो, मगर ऐसे हालात की आमद से लेकर उनके निदान तक डॉ. मोहन यादव ने खुद को औरों के मुकाबले बहुत आगे ला कर खड़ा कर दिया है। सहज तरीके से और सफल तरीके से भी।

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