
- कैडर मिस मैनेजमेंट की वजह से नए अफसरों को करना पड़ रहा है इंतजार
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। आईएएस में चयन होने के बाद इस सेवा के हर अफसर का सपना कलेक्टर बन कर जिले की कमान संभालने का होता है। मप्र ऐसा राज्य है, जहां पर नए आईएएस अफसरों को कलेक्टर बनने के लिए अन्य राज्यों की तुलना में कई साल अधिक इंतजार करना पड़ता है। इसकी वजह है प्रदेश में इस कैडर को लेकर जारी मिस मैनेजमेंट। यही वजह है कि अन्य राज्यों में जहां दो से चार साल पहले नए आईएएस अफसरों को कलेक्टर बनाने का मौका मिल चुका है, जबकि प्रदेश में उनके साथ ही आईएएस बनने वाले अफसर अब भी अपनी बारी का इंतजार करने को मजबूर बने हुए हैं। इसकी वजह से उनके करियर प्रोफाइल पर भी बुरा असर पड़ रहा है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के युवा अधिकारियों को कलेक्टर बनाने के मामले में मप्र अन्य राज्यों की तुलना में काफी पीछे है। स्थिति यह है कि मप्र कैडर के आईएएस अधिकारियों को जिलों की कमान मिलने के लिए 7 से 9 वर्षों तक का इंतजार करना पड़ रहा है, जबकि अन्य कई राज्यों के जिलों में तीन से चार साल के आईएएस अफसर कलेक्टरी संभाल रहे हैं।
गौरतलब है कि अमूमन 4 से 6 साल की सेवा अवधि पूरी करने के बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को कलेक्टर बनने का मौका मिलता है। ऐसा पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड और उड़ीसा जैसे राज्यों में हो भी रहा है। इतने वर्ष की सेवा करने वाले अधिकारी जिलों की कमान संभालने लगते हैं। 2026 के प्रशासनिक परिदृश्य में, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा में जिला कलेक्टरों के रूप में मुख्य रूप से 2017 से 2019 बैच के आईएएस अधिकारियों की तैनाती है, जबकि 2020-2022 बैच के अधिकारी एडीएम या एसडीएम के रूप में फील्ड ट्रेनिंग ले रहे हैं। लेकिन मप्र में अब तक 2016 बैच के आईएएस अधिकारियों को जिलों की कमान मिल सकी है।
छह साल में मिलती है कलेक्टरी
दो साल के प्रशिक्षण के बाद आईएएस अफसर को एक साल एसडीएम, दो साल जिला पंचायत सीईओ और एक साल एडीएम या नगर निगम कमिश्नर के रूप में पदस्थ किया जाता है। इस छह साल की अवधि के बाद ही आईएएस अफसर को जिले की कमान दी जाती है, लेकिन मप्र में यह अवधि बढ़ती ही जा रही है। ऐसी स्थिति में यदि राज्य सरकार द्वारा अब वर्ष 2017 बैच के अधिकारियों को कलेक्टर बनाया जाता है, तो उन्हें अपनी सेवा अवधि के 9 साल बाद ही कलेक्टर बनने का मौका मिल पाएगा। इनमें से कई अधिकारी राज्य के जिला पंचायतों, नगर निगमों, मंत्रालय में उपसचिव या फिर संचालनालयों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इन सभी को कलेक्टर बनने का इंतजार है। राज्य की पिछली सरकारों की तुलना में मौजूदा सरकार ने युवा आईएएस अफसरों पर भरोसा जताया है। सरकार नई पीढ़ी के आईएएस अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे रही है। संभावित प्रशासनिक सर्जरी में ज्यादातर युवा अधिकारियों को जिलों की कमान सौंपी जा सकती है। यानि कि वर्ष 2017 से 2020 बैच के आईएएस अधिकारी जिलों के कलेक्टर बनाए जा सकते हैं। मप्र के 17 जिलों की कमान महिला आईएएस के पास है। बड़े निकायों में भी महिला आईएएस बतौर कमिश्नर पदस्थ हैं। पहली बार इस सरकार के कार्यकाल में संभव हो सका है कि इतनी महिला आईएएस अधिकारी कलेक्टर हैं। कई जिलों में तो दो से तीन साल से महिला जिले की कमान संभाले हुए हैं। कई अहम विभागों की मुखिया भी महिला अधिकारी पदस्थ हैं।
मनोबल पर पड़ रहा है विपरीत असर
कलेक्टर के पद पर पोस्टिंग में देरी का असर आईएएस अफसरों के मनोबल पर भी पड़ रहा है। एक ही पद पर कई वर्षों तक काम करने की वजह से उनका मनोबल टूट रहा है। दूसरे राज्यों में उनके बैच के अधिकारी कलेक्टर के पद पर पदस्थ हैं और मप्र में आईएएस वर्षों से जिला पंचायत सीईओ, मंत्रालय में उप सचिव, एडीएम जैसे पदों पर पदस्थ हैं। प्रशासनिक सूत्रों की मानें तो राज्य सरकार जिला पंचायतों में प्रमोटी आईएएस अधिकारियों के स्थान पर नए बैच के अधिकारियों को मुख्य कार्यपालन अधिकारी के तौर पर पदस्थ कर सकती है। जानकारों की मानें तो किसी भी अधिकारी को कलेक्टर बनाने से पहले प्रशासनिक अनुभव के लिए एसडीएम राजस्व से लेकर सहायक कलेक्टर या फिर जिला पंचायतों का मुख्य कार्यपालन अधिकारी बनाया जाता है। कई बार आईएएस अधिकारियों को संचालनालय में ऐसे पद पर बैठाया जाता है, जो सीधे जनता से या विकास कार्यों से जुड़े होते हैं, जिससे उन्हें पब्लिक जिम्मेदारियों की सीख मिलती है। निकायों में भी आईएएस अधिकारियों को भेजकर उन्हें विकास कार्यों के तरीकों से अवगत कराया जाता है।
