चुनावी राज्यों में प्रचार की कमान थामेंगे मप्र के नेता

  • पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिए बनने लगी रणनीति

गौरव चौहान
पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और  पुडुचेरी में चुनावी तिथि की घोषणा के साथ ही राजनीतिक पार्टियों की हलचल तेज हो गई है। पांच राज्यों के अलावा मप्र में भी चुनावी राज्यों की रणनीति बन रही है। यहां की दो बड़ी पार्टियां भाजपा और कांग्रेस ने पांचों राज्यों के लिए चुनावी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। इसके तहत दोनों पार्टियां अपने रणनीतिकार नेताओं को पांचों राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए भेजेंगी।
गौरतलब है कि मप्र के नेता चुनावी रणनीति में माहिर माने जाते हैं। इसलिए भाजपा और कांग्रेस विभिन्न राज्यों में अपने नेताओं को चुनावी मोर्चे पर तैनात करती है। विशेष कर सत्ताधारी दल भाजपा के नेताओं की रणनीति पर सबको भरोसा है। इसलिए भाजपा ने चुनावी राज्यों में अपने नेताओं को भेजना शुरू कर दिया है। पार्टी 50 से ज्यादा नेताओं को पश्चिम बंगाल और असम चुनाव प्रचार के लिए भेजेगी। जानकारों की माने को चुनाव की घोषणा से पहले मप्र के 11 नेता असम में सक्रिय रहे है, जहां उन्हें ऐसे क्षेत्रों में सक्रिय किया गया था, जहां भाजपा अपेक्षाकृत कमजोर मानी जाती है। इन नेताओं ने प्रथम चरण में अपने टास्क को पूरा किया है। बताया गया है कि जल्द भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व मप्र के नेताओं की पश्चिम बंगाल और असम में चुनावी दायित्व दिए जाने का निर्देश जारी कर सकता है। इन नेताओं को चुनाव प्रभारी, पर्यवेक्षक या सहयोगी के तौर पर जिम्मेदारी दी जाएगी।
मप्र के नेताओं की चुनावी कौशलता का टेस्ट
देश के 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव राजनीतिक तौर पर उन राज्यों के लिए अहम माने जा रहे है, लेकिन इन चुनावों में मप्र के नेताओं की चुनावी कौशलता का टेस्ट होगा। असम और पश्चिम बंगाल के लिए मध्यप्रदेश के नेताओं को टास्क मिलेगा। इनमें से कुछ नेता सरकार और निगम मंडल के पदों के दावेदार भी है। बताया गया है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भी बिहार और दिल्ली चुनाव की तरह असम और पश्चिम बंगाल में भी चुनावी सभाएं आयोजित की जा सकती है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों सीएम की असल में कई दौरे हो चुके है। भाजपा सूत्रों की माने तो राज्य सरकार के आधा दर्जन से ज्यादा मंत्रियों को असम और पश्चिम बंगाल में चुनावी मोर्चे पर लगाया जा सकता है। इनमें उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा, वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, विश्वास सारंग, राकेश सिंह, विजय शाह और गौतम टेटवाल के नाम सामने आ रहे है। पार्टी अपने कुछ विधायकों को भी मैदान में उतार सकती है। पूर्व मंत्री अरविन्द भदौरिया, वरिष्ठ नेता विनोद गोटिया सहित कुछ पूर्व विधायकों व वरिष्ठ नेताओं को भी इन चुनावों में दायित्व सौंपा जा सकता है। बताया भाजपा सूत्रों का कहना है कि केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा केंद्रीय मंत्री वीरेन्द्र खटीक को भी केन्द्रीय नेतृत्व इन राज्यों में चुनावी प्रबंधन संभालने के लिए भेज सकता है। इनके अलावा संघ की पृष्ठभूमि वाले ऐसे नेताओं को भी चुनावी कमान सौंपी जा सकती है जो मप्र में किसी ने किसी रूप में सक्रिय है। इधर कांग्रेस भी अपने मप्र के वरिष्ठ नेताओं को इन पांच राज्यों के चुनावी समर में उतार सकती है। विशेषकर पश्चिम बंगाल और असम में प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं के चुनावी कौशल का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंधार सीडब्ल्यूसी सदस्य कमलेश्वर पटेल, राष्ट्रीय सचिव कुणाल चौधरी के अलावा पार्टी के कुछ विधायकों को भी इन राज्यों में चुनाव प्रबंधन संभालने के लिए भेजा जा सकता है। प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी को भी इन राज्यों में किसी भी एक अंचल की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।
राजनीतिक नियुक्ति पर विराम!
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की तारीखों के ऐलान के साथ मप्र में होने वाली राजनीतिक नियुक्तियों पर लगभग विराम सा लग गया है। चुनावी घोषणा के साथ ही निगम-मंडल से लेकर मंत्रिपरिषद के संभावित फेरबदल और विस्तार में अपनी उम्मीद की राह देख रहे नेताओं की धड़कनें बढ़ा दी है। इन नेताओं को इस बात का डर सता रहा है कि राज्यों के चुनावों की वजह से कहीं उनकी नियुक्तियां एक बार फिर से न टल जाएं। इस संबंध में ऐसे ही एक दावेदार से चर्चा की, तो उन्होंने स्वीकार किया कि तारीखों ने उनका टेंशन बढ़ा दिया है। फिलहाल वे अपने स्तर पर दिल्ली और भोपाल के वरिष्ठ नेताओं ने इस संबंध में फीडबैक ले रहे हैं।

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