- कैग की रिपोर्ट में खुली वाणिज्यिक कर विभाग की पोल

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र में वाणिज्यिक कर विभाग के अफसरों की लापरवाही के कारण सरकार को करोड़ों रुपए की चपत लगी है। इसका खुलासा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2023 और फरवरी 2024 के बीच राज्य के 10 उप-पंजीयक कार्यालयों के अभिलेखों के नमूनों की जांच में यह तथ्य सामने आया है कि अधिकारियों द्वारा संपत्ति का सही मूल्यांकन नहीं होने पर 8.73 करोड़ का स्टाम्प और और पंजीयन शुल्क कम जमा कराया गया। रिपोर्ट में कैग ने भारतीय स्टाम्प अधिनियम 1899 की धारा 27 का उल्लेख करते हुए कहा है कि किसी दस्तावेज की प्रभार्यता को प्रभावित करने वाले तथ्य जैसे कि बाजार मूल्य की राशि व अन्य जानकारी सटीक रुप से लिखी जानी चाहिए। धारा 35 के अनुसार शुल्क से प्रभार्य दस्तावेज को उस शुल्क के भुगतान पर पंजीयकृत किया जाएगा, जिससे वह प्रभार्य है। ऐसा नहीं करने पर धारा 48 के प्रावधानों के अनुसार सभी शुल्क, दंड और अन्य देय राशियां जिनका भुगतान किया जाना अपेक्षित है, कलेक्टर द्वारा संबंधित व्यक्ति की चल संपत्ति को जब्त करके या बेचकर संबंधित राशि वसूल की जा सकती है।
कैग रिपोर्ट में कहा गया है कि जुलाई 2023 और फरवरी 2024 के बीच राज्य के 10 उप-पंजीयक कार्यालयों के अभिलेखों के नमूनों की जांच की गई, जिसमें यह बात सामने आई कि अप्रैल 2017 से मार्च 2023 के बीच पंजीकृत 29 दस्तावेजों का पंजीकृत मूल्य 98.44 करोड़ रुपए था, जिन पर स्टाम्प शुल्क और पंजीयन शुल्क उसी मूल्य के आधार पर लगाया गया था। लेकिन जांच के दौरान जब संबंधित संपत्ति का क्रॉस-सत्यापन किया गया, तो पता चला कि तत्कालीन समय में संबंधित संपत्ति का बाजार मूल्य 168.85 करोड़ था, जबकि आवेदकों ने संपत्ति का कम मूल्यांकन किया, जिसके परिणामस्वरूप स्टाम्प शुल्क 6.59 करोड़ रुपए और पंजीयन शुल्क 2.14 करोड़ रुपए का कम भुगतान हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है कि उप पंजीयक की ओर से हुई चूक की वजह से 8.73 करोड़ की कम वसूली हुई और सरकार को राजस्व में इतनी राशि का चूना लगा। रिपोर्ट के अनुसार महानिरीक्षक पंजीयन मध्यप्रदेश ने कहा था कि उप पंजीयक कटनी, बुरहानपुर, नीमच, इंदौर के महू, इंदौर के ही सांवेर, भोपाल के गोविंदपुरा, ग्वालियर-1, ग्वालियर 2 के तहत 24 प्रकरण विचाराधीन थे, जबकि उप पंजीयक इंदौर-1 विदिशा और गोविन्दपुरा के तहत अन्य 3 प्रकरणों में 12.53 लाख की वसूली की गई थी। इस पर कैग ने कहा कि पंजीयक द्वारा गलत बाजार मूल्य बताने के बारे में किसी भी तरह का जवाब नहीं दिया गया है, जो कमजोर आंतरिक नियंत्रण और निगरानी को दर्शाता है।
परीक्षाओं के आयोजन में लापरवाही
रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2018-19 से 2022-23 तक की अवधि के दस्तावेजों की जांच के दौरान पाया गया है कि इस बीच आयोजित 44 परीक्षाओं में से केवल 28 के लिए ही विज्ञापन जारी किए गए। कैग ने कहा कि ऐसी स्थिति योजना निर्माण और क्रियान्वयन में गंभीर कमियों की वजह से निर्मित हुई है। इसी तरह 94 प्रस्तावित विज्ञापनों को जारी करने में निर्धारित समय सीमा से बहुत अधिक औसतन 136 दिन की अतिरिक्त देरी हुई, जिससे अभ्यर्थियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। रिपोर्ट में कहा गया है कि अव्यवस्थित परीक्षा आयोजन प्रणाली की वजह से 19 परीक्षाओं में से मात्र 5 को ही ऑनलाइन माध्यम से आयोजित किया जा सका। आयोग ने वर्ष 2013 के बाद अपनी नियमावली में भी किसी भी तरह का महत्वपूर्ण संशोधन नहीं किया जिसकी वजह से सरकार द्वारा जारी नए दिशा-निर्देश शामिल नहीं हो सके। इससे प्रशासनिक कार्यप्रणाली भी प्रभावित हुई है।
पीएससी भर्ती प्रक्रिया में अनावश्यक रुप से देरी
कैग की रिपोर्ट में मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग की भर्तियों में भी गड़बड़ी होने की बात कही गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन भर्ती प्रक्रिया में अनावश्यक रुप से देरी की गई, तो प्रशासनिक ढिलाई की वजह से प्रक्रिया बाधित हुई है। साथ ही वित्तीय प्रबंधन को लेकर भी रिपोर्ट में सवाल खड़े किए गए है, क्योंकि गलत वित्तीय प्रबंधन की वजह से आयोग उपलब्ध बजट का 42 प्रतिशत हिस्सा वापस करना पड़ा। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन परीक्षाओं और चयन प्रक्रियाओं को निर्धारित एक माह में पूरा करना था, उन्हें लगभग चार माह से भी ज्यादा समय लग गया। जो नियमानुसार सामान्य परिस्थितियों से भी कहीं ज्यादा है। इसी तरह जांच में यह तथ्य भी सामने आया है कि आयोग और संबंधित विभागों के बीच समुचित तालमेल का अभाव था। कई विभागों के रिक्त पदों की जानकारी समय पर आयोग को नहीं भेजी गई, जिससे पूरी प्रक्रिया प्रभावित हुई है, जिसका सीधा असर अपनी सरकारी नौकरी लगने की उम्मीद लगाए युवाओं पर पड़ा है।
