कवितायन

कवितायन…/हम जब नंगे होते हैं….

मुकेश आर पाण्डेय हम जब नंगे होते हैं….यूं जब जब दंगे होते हैं । सब के सब नंगे होते हैं ।।व्यवस्था गंजे सर जैसी हर हाथ में कंघे होते हैं…

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कवितायन

श्रुति कुशवाह जब भी मिलूं खुद से आंखें नीची न हो संसार की नदी में डूबते उतरातेसमझ की इतनी काई लगीअक्सर ही हाथ से फिसल जाती है सरलता फिर भी…

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हम करेंगे कन्यादान कन्यादान हम करेंगे अब लाडली मुस्कुराएगीपचपन हजार का दहेज साथ लेते जाएगी, फ्री में अच्छी उनको शिक्षा देदो शिवराजवर्ना पराये घर मे जाके फिर दबाई जाएगीरुपया पैसा तो…

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  श्रुति कुशवाह प्यार, सम्मान या मजाक में भी पति को “पतिदेव” कहना बंद कीजिये माँ सबसे महान होती है..महान की बजाय उन्हें इंसान मानिये सुपर मॉम/सुपर डैड का क्विंटलों बोझ मत लीजिये…

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जागने के अपने खतरे थेअंधेरे के साथ सोना इस तरह जुड़ा रहाकि रात होते ही माएं बच्चों को थपकियां देने लगतीजबकि अंधेरे समय में सबसे जरूरी था जागना सोकर अंधेरा…

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डॉ विजय सक्सेना   01कुछ अजीब सा रिवाज है तेरी रियासत में,लोग खुद पर नहीं रिवायत पर यकीन करते हैं।परेशानियों का सबब जिंदगी का उसूल है,हल ढूंढते नहीं शिकायत पर…

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कवितायन…

ओम द्विवेदी(1)  व्यवस्था धन के आगे नंगी होकर नाचती हैया सत्ता के समक्ष पड़ी रहती है निर्वसनइसे या तो खरीदा जा सकता हैया फिर कुचला।यह जो दिखती हैकिसी वेश्या या…

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