- 13/04/2023
- shailendra
कवितायन…/हम जब नंगे होते हैं….
मुकेश आर पाण्डेय हम जब नंगे होते हैं….यूं जब जब दंगे होते हैं । सब के सब नंगे होते हैं ।।व्यवस्था गंजे सर जैसी हर हाथ में कंघे होते हैं…
Read More- 03/06/2022
- shailendra
कवितायन
श्रुति कुशवाह जब भी मिलूं खुद से आंखें नीची न हो संसार की नदी में डूबते उतरातेसमझ की इतनी काई लगीअक्सर ही हाथ से फिसल जाती है सरलता फिर भी…
Read More- 30/03/2022
- shailendra
कवितायन
हम करेंगे कन्यादान कन्यादान हम करेंगे अब लाडली मुस्कुराएगीपचपन हजार का दहेज साथ लेते जाएगी, फ्री में अच्छी उनको शिक्षा देदो शिवराजवर्ना पराये घर मे जाके फिर दबाई जाएगीरुपया पैसा तो…
Read More- 25/03/2022
- shailendra
कवितायन
श्रुति कुशवाह प्यार, सम्मान या मजाक में भी पति को “पतिदेव” कहना बंद कीजिये माँ सबसे महान होती है..महान की बजाय उन्हें इंसान मानिये सुपर मॉम/सुपर डैड का क्विंटलों बोझ मत लीजिये…
Read More- 23/03/2022
- shailendra
कवितायन
जागने के अपने खतरे थेअंधेरे के साथ सोना इस तरह जुड़ा रहाकि रात होते ही माएं बच्चों को थपकियां देने लगतीजबकि अंधेरे समय में सबसे जरूरी था जागना सोकर अंधेरा…
Read More- 16/01/2022
- shailendra
कवितायन
डॉ विजय सक्सेना 01कुछ अजीब सा रिवाज है तेरी रियासत में,लोग खुद पर नहीं रिवायत पर यकीन करते हैं।परेशानियों का सबब जिंदगी का उसूल है,हल ढूंढते नहीं शिकायत पर…
Read More- 15/11/2021
- shailendra
कवितायन…
ओम द्विवेदी(1) व्यवस्था धन के आगे नंगी होकर नाचती हैया सत्ता के समक्ष पड़ी रहती है निर्वसनइसे या तो खरीदा जा सकता हैया फिर कुचला।यह जो दिखती हैकिसी वेश्या या…
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