मप्र में कब लागू होगी… समान नागरिक संहिता?

  • गौरव चौहान
समान नागरिक संहिता

भारत में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर दशकों से चली आ रही बहस अब धरातल पर उतरने लगी है। उत्तराखंड के बाद अब गुजरात देश का दूसरा ऐसा राज्य बन गया है, जिसने अपने यहां इस ऐतिहासिक विधेयक को पारित कर दिया है। यह कानून केवल विवाह या संपत्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के हर वर्ग को एक समान कानूनी पायदान पर खड़ा करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।  गुजरात का यह फैसला देश की राजनीति और सामाजिक ढांचे में बड़े बदलावों का संकेत दे रहा है। वहीं सवाल उठ रहा है कि मप्र में यूसीसी कब लागू होगा।
गुजरात विधानसभा में यूसीसी बिल पारित होने के बाद देश में समान नागरिक संहिता का मुद्दा एक बार फिर गर्मा गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक्स पर पोस्ट में कहा, देश में हर नागरिक के लिए एक समान कानून हो, यह भाजपा का स्थापना से ही संकल्प रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की राज्य सरकारें इस दिशा में निरंतर आगे बढ़ रही हैं। केंद्रीय मंत्री शाह के पोस्ट ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि भाजपा शासित अन्य राज्यों में भी यूसीसी की दिशा में पहल हो सकती है। हालांकि गुजरात विधानसभा में यूसीसी बिल पारित होने के बाद मप्र में भी इसकी सुगबुगाहट तेज हो गई है। एक दिसंबर, 2022 को तत्कालीन सीएम शिवराज सिंह चौहान ने बड़वानी के सेंधवा की सभा में कहा था, मैं देश में एक समान नागरिक संहिता लागू करने का पक्षधर हूं। प्रदेश में इसके लिए कमेटी बनाई जाएगी। भारत में अब समय आ गया है कि समान नागरिक संहिता लागू होना चाहिए। कोई एक से ज्यादा शादी क्यों करे? एक देश में दो विधान क्यों चलें, एक ही होना चाहिए। यूसीसी में एक पत्नी रखने का अधिकार है, तो एक ही पत्नी होना चाहिए। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश में यूसीसी लागू करने के लिए एक विशेषज्ञ कमेटी बनाने का ऐलान किया था, लेकिन सत्ता परिवर्तन और लोकसभा चुनावों के शोर में यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया। अब जबकि पड़ोसी राज्यों ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं, सवाल उठ रहा है कि क्या मोहन यादव सरकार 2028 के विधानसभा चुनावों से पहले इस कार्ड को खेलने की तैयारी में है?
भोपाल से पीएम मोदी ने दिया था संदेश
27 जून 2023 को भोपाल में बीजेपी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूसीसी के पक्ष में पुरजोर वकालत की थी। इसके बाद माना जा रहा था कि मध्य प्रदेश इसे लागू करने वाला अग्रणी राज्य बनेगा। जनवरी 2025 में उत्तराखंड ने इसे जमीन पर उतार दिया और अब गुजरात के कदम ने एमपी सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मध्य प्रदेश सरकार फिलहाल आलाकमान के निर्देश का इंतजार कर रही है। राज्य में धार्मिक ध्रुवीकरण की स्थिति फिलहाल नियंत्रण में है, इसलिए सरकार किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर जल्दबाजी में कदम उठाकर विवाद मोल नहीं लेना चाहती। सूत्रों की मानें तो 2028 के विधानसभा चुनावों के करीब आने पर इसे मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया जा सकता है।
मप्र में कई तरह की अड़चनें
विशेषज्ञों के अनुसार, मध्य प्रदेश जैसे विविधता वाले राज्य में आदिवासियों की परंपराओं और विभिन्न धार्मिक कानूनों को एक सूत्र में पिरोना एक बड़ी चुनौती है। यही कारण है कि सरकार फूंक-फूंक कर कदम रख रही है और पहले दूसरे राज्यों के मॉडल का बारीकी से अध्ययन कर रही है। हालांकि विधानसभा चुनाव 2023 के बाद डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में नई सरकार बनी, जिससे उम्मीद थी कि यूसीसी पर ठोस निर्णय होगा। वर्ष 2024 में लोकसभा चुनाव के समय जब समान नागरिक संहिता का मुद्दा उठा, तो मप्र में इसको लेकर एक्सपर्ट कमेटी के गठन की सुगबुगाहट शुरू हो गई। सीएम सचिवालय के अधिकारियों का कहना था कि एक्सपार्ट कमेटी में रिटायर्ड न्यायाधीश, कानूनविद्, रिटायर्ड प्रशासनिक अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता आदि को शामिल किया जाएगा, लेकिन कोई कमेटी गठित नहीं हुई। लोकसभा चुनाव के बाद समान नगरिक संहिता का मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मप्र सरकार यूसीसी को लेकर सियासी नफा-नुकसान का आंकलन कर रही है। राज्य में धर्म आधारित ध्रुवीकरण अपेक्षाकृत कम होने के कारण सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर सतर्क रुख अपनाए हुए है। यही वजह है कि बार-बार घोषणाओं के बावजूद कमेटी गठन टलता रहा है।

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