- भूजल के अंधाधुंध दोहन से कई विकासखंडों में गंभीर स्थिति

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
इस बार मार्च में ही गर्मी का कोप दिखने लगा है। गर्मी की दस्तक के साथ ही मप्र में जल संकट गहराने लगा है। दरअसल, प्रदेश में भूजल के अंधाधुंध दोहन ने जल संकट की गंभीर स्थिति पैदा कर दी है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (पीएचई) विभाग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के 313 विकास खंडों में से 26 ब्लाक अतिदोहित श्रेणी में पहुंच चुके हैं, जिनमें से 25 मालवा-निमाड़ क्षेत्र के हैं। इसके अलावा छह ब्लाक दोहित (क्रिटिकल) और 64 अर्धदोहित (सेमी क्रिटिकल) श्रेणी में हैं। चिंताजनक बात यह है कि पिछले लगभग 15 वर्षों से स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते भूजल संरक्षण के लिए ठोस और दीर्घकालिक प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में प्रदेश के कई हिस्सों में गंभीर जल संकट खड़ा हो सकता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की जानकारी के आधार पर लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने यह रिपोर्ट तैयार की है।
रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के कई क्षेत्रों में भूजल का अत्यधिक दोहन लगातार जारी है। पिछले डेढ़ दशक से स्थिति लगभग समान बनी हुई है, लेकिन इसके समाधान के लिए गंभीर और प्रभावी प्रयास नहीं किए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरक्षण के प्रति जागरूकता और सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के बिना स्थिति में सुधार संभव नहीं है। पूर्व राष्ट्रीय नोडल अधिकारी (पेयजल सुरक्षा) सुधींद्र मोहन शर्मा का कहना है कि प्रदेश में लगभग 85 प्रतिशत नल जल योजनाएं भूजल पर निर्भर हैं। ऐसे में भूजल संरक्षण और संवर्धन के लिए व्यापक और दीर्घकालीन योजना बनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार इस दिशा में वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराती है, लेकिन राज्य स्तर पर कई बार इसका पूरा उपयोग नहीं हो पाता। इसलिए पीएचई और अन्य संबंधित विभागों को आपसी समन्वय के साथ काम करते हुए जल संरक्षण के लिए ठोस रणनीति बनानी होगी, तभी प्रदेश को भविष्य के जल संकट से बचाया जा सकेगा।
20 प्रतिशत ब्लाक अर्धदोहित श्रेणी में
रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के 313 ब्लाकों में से 64 यानी लगभग 20 प्रतिशत अर्धदोहित श्रेणी में हैं। इनमें शिवपुरी जिले के पांच ब्लाक सबसे अधिक प्रभावित हैं, जबकि टीकमगढ़ और छतरपुर के चार-चार ब्लाक इस श्रेणी में शामिल हैं। इसका प्रमुख कारण सिंचाई के लिए ट्यूबवेल पर अत्यधिक निर्भरता है। हालांकि बुंदेलखंड क्षेत्र में केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत नहरों के माध्यम से सिंचाई की योजना बनाई जा रही है। इससे आने वाले वर्षों में भूजल पर निर्भरता कम होने की उम्मीद जताई जा रही है। प्रदेश में छह ब्लाक दोहित (क्रिटिकल) श्रेणी में भी शामिल हैं। इनमें राजगढ़ जिले का नरसिंहगढ़, सीहोर का आष्टा, धार का तिरला, इंदौर शहर, सतना का रामपुर बघेलान और छिंदवाड़ा ब्लाक शामिल हैं। इन क्षेत्रों में भूजल का उपयोग उसकी पुनर्भरण क्षमता के 90 से 100 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जो आने वाले समय में गंभीर संकट का संकेत है। विशेषज्ञों के अनुसार मालवा-निमाड़ क्षेत्र वर्ष 2006 से ही अतिदोहन वाले क्षेत्रों में शामिल है। यहां कृषि कार्यों में भूमिगत जल का सबसे अधिक उपयोग होता है। इसके अलावा अनियमित वर्षा, रिचार्ज क्षेत्रों में वनों की कटाई और भूमि उपयोग में बदलाव भी भूजल संकट के प्रमुख कारण हैं।
मालवा-निमाड़ की स्थिति सबसे खराब
रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के 26 अतिदोहित ब्लाकों में से 25 मालवा-निमाड़ क्षेत्र में स्थित हैं। केवल राजगढ़ जिले का सारंगपुर ब्लाक इस क्षेत्र से बाहर है। रिपोर्ट के अनुसार रतलाम जिले के चार ब्लाक सबसे अधिक प्रभावित हैं। इसके अलावा उज्जैन, शाजापुर, इंदौर और धार के तीन-तीन ब्लाक अतिदोहित श्रेणी में हैं। देवास, नीमच, मंदसौर और आगर जिलों के दो-दो ब्लाक इस श्रेणी में शामिल हैं, जबकि बड़वानी और राजगढ़ के एक-एक ब्लाक में भी स्थिति गंभीर है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन क्षेत्रों में जल संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं किए गए, तो भविष्य में यहां पेयजल और सिंचाई दोनों के लिए गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। रतलाम जिले की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक बताई जा रही है। यहां जावरा, पिपलोदा, रतलाम और आलोट ब्लाक अतिदोहित श्रेणी में हैं। पिपलोदा ब्लाक में कई स्थानों पर एक हजार से डेढ़ हजार फीट गहराई तक ट्यूबवेल की खोदाई करने के बाद भी पानी नहीं निकल रहा है। जावरा के विधायक राजेन्द्र पाण्डेय के अनुसार पिछले लगभग 25 वर्षों से क्षेत्र में भूजल स्तर की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।
