
- कांग्रेस के कई नेताओं पर मंडरा रहा जमीनी आधार खोने का डर
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र में सत्ता के लिए तरस रही कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं पर अपनी पहचान बनाए रखने का संकट मंडरा रहा है। ऐसे नेता अपने वजूद को बचाने और जमीनी आधार को फिर से मजबूत करने के लिए प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में जनता के बीच पहुंच रहे हैं। दरअसल, उन्हें अहसास हो गया है कि अब भी नहीं सुधरे तो उनको कोई नहीं बचा सकता। संगठन को ठेंगे पर रखने वाले और मनमानी करने वाले नेताओं को अपना वजूद बचाने लिए जनता के बीच जाने को मजबूर होना पड़ रहा है। उन्हें अहसास हो गया है कि अपनी पहचान बनाए रखने के लिए उनको जनता के बीच जाना होगा और काम करना होगा तथा पार्टी में सबका आदर, मान-सम्मान करना होगा। गौरतलब है कि मप्र में कांग्रेस के कई ऐसे नेता हैं जो संगठन और जनता के बीच से नदारद हैं। इनमें कुछ नेता तो ऐसे हैं, जिनकी कभी संगठन में तूती बोलती थी। इनमें से कुछ नेताओं की पहुंच दिल्ली तक तो है, लेकिन उनके सामने जनता के बीच अपना वजूद बचाने का संकट उत्पन्न हो रहा है। ऐसे में कुछ नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं की नब्ज टटोलने के लिए भ्रमण भी शुरू कर दिया है। मप्र कांग्रेस के कुछ नेता इन दिनों नेपथ्य में हैं, यानि कि उनके पास संगठन की कोई ऐसी बड़ी जिम्मेदारी नहीं है कि वे सीधे कार्यकर्ताओं और जनता के साथ संवाद में रह सकें। ऐसे में इन नेताओं ने अब अकेले ही स्वयं मैदान में उतरना शुरु कर दिया है।
नेता तलाश रहे भविष्य
कांग्रेस के अंदर नेतृत्व के प्रति आस्था की नीति ने उसको सबसे बड़ा नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में दूसरे नेता अपना वजूद तलाशने में जुटे हैं। इस कड़ी में कद्दावर नेता रहे अजय सिंह राहुल इन दिनों बुंदेलखंड के दौरे पर हैं। इससे पहले वे चंबल का प्रवास भी कर चुके है। नेता प्रतिपदा जैसी अहम सिंह के पास वर्तमान में ऐसी कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं है, कि वे पार्टी की मूलधारा में रहे। ऐसे में उन्होंने स्वयं अपने आपको सक्रिय रखने के लिए अकेले ही कार्यकर्ताओं से संवाद बनाना शुरु कर दिया है। वहीं पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरुण यादव पीसीसी चीफ की कुर्सी से उतरने के बाद लगभग नेपथ्य में हैं। उनके पास ऐसा कोई बड़ा काम नहीं है, जिसके जरिए वे अपने कार्यकर्ताओं और जनता से सीधे संपर्क में रह सके। ऐसे में यादव ने अपने आपको सक्रिय रखने के लिए जहां सोशल मीडिया का सहारा लिया है, तो वहीं वे चिन्हित नगरों का भ्रमण कर कार्यकर्ताओं के बीच अपनी पहचान बरकरार रखने का प्रयास कर रहे हैं। केन्द्र सरकार में मंत्री रहे कांतिलाल भूरिया भी उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्हें कार्यकर्ताओं के बीच अपनी जगह बनाए रखने के लिए विशेष प्रयास करने पड़ रहे हैं। भूरिया पीसीसी चीफ रहे हैं, ऐसे में पूरे प्रदेश में उनकी अपनी पहुंच रही है। लेकिन अब उनके सामने पार्टी नेतृत्व के सामने अपना वजूद सिद्ध करने का संकट है। हालांकि उनके विधायक पुत्र डॉ, विक्रात भूरिया राहुल अपनी सक्रियता से अपने पिता के राजनैतिक करियर को आगे बढ़ा रहे है। वहीं नेता प्रतिपक्ष रहे डॉ. गोविन्द सिंह का चंबल ग्वालियर संभाग सहित प्रदेश भर में कार्यकर्ताओं के बीच प्रभाव रहा है। पिछला चुनाव हारने के बाद उन्हें लेकर यह बात सामने आई कि वे चुनावी राजनीति से दूर रहेंगे। केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद ग्वालियर चंबल अंचल में कांग्रेस का ऐसा कोई बड़ा नेता सामने नहीं आया, जो पार्टी के लिए चेहरा बन सके। ऐसे में डॉ. सिंह के पार्टी की मूलधारा से दूर होने से उनके समर्थकों में बेचैनी पैदा कर रही है। वहीं कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य कमलेश्वर पटेल की हाईकमान तक सीधे पहुंच है। वे पहले भी राष्ट्रीय स्तर से मिली जिम्मेदारियों के चलते कांग्रेस को मजबूत बनाने में सक्रिय रहे है। लेकिन मध्यप्रदेश में इस समय उनके पास ऐसी बड़ी जिम्मेदारी नहीं है, कि जिससे वे प्रदेश भर का दौरा कर अपने कार्यकर्ताओं से जीवंत संबंध रख सके।
हर नेता की गतिविधि पर आलाकमान की नजर
कांग्रेस की राजनीति समझने वालों का मानना है कि ऐसा करना नेताओं की मजबूरी भी है, क्योंकि दिल्ली की राज्य के हर कांग्रेसी नेता पर नजर है कि कौन घर बैठा है और कौन जनता के बीच है। पिछले दिनों दिल्ली में प्रदेश को लेकर हुई बैठक में वरिष्ठ नेतृत्व ने एक बात साफ तौर पर कही है कि जो नेता मैदान में नहीं दिखेंगे, उनके विकल्प की तलाश की जाएगी। इसी तरह बड़े नेताओं की सक्रियता तभी मानी जाएगी, जब वे अपने क्षेत्र से बाहर जाकर पार्टी संगठन को मजबूत बनाने और कार्यकर्ताओं को जोडऩे का काम करेंगे।
