टाइगर स्टेट में बाघ खतरे में

  • हर महीने आधा दर्जन बाघों की हो रही मौत

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
बाघों की सुरक्षा को लेकर बड़े दावे करने वाला मप्र अब गंभीर सवालों के घेरे में है। एक तरफ बाघों की गिनती के बाद आंकड़े जुटाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थिति यह है कि प्रदेश में बाघों की मौत पर विराम नहीं लग पा रहा है।  इस वर्ष के केवल दो माह में ही 12 बाघों की मृत्यु हो चुकी है। अधिकांश मामलों में बाघों की मौत आपसी क्षेत्रीय संघर्ष या बाघ और तेंदुए के आमने-सामने आने के कारण हो रही है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्ष प्रदेश के अभयारण्य क्षेत्रों और इनके बाहर मिलाकर 55 बाघों की मौत दर्ज हुई थी, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है।
मप्र जिसे देश टाइगर स्टेट के नाम से भी जाना जाता है. वहां इन दिनों बाघों की रहस्यमयी और चिंताजनक मौतों ने वन्यजीव प्रेमियों को चौंका दिया है। महज दो महीनों में 12 बाघों की मौत ने वन महकमे में हलचल मचा दी है। वन विशेषज्ञों का मानना है कि अभयारण्य क्षेत्रों में तेंदुओं की संख्या तेजी से बढऩे से संघर्ष की स्थिति बन रही है। बढ़ती संख्या के साथ चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। जंगल का क्षेत्रफल सीमित है और बाघ स्वभाव से अपनी टेरिटरी को लेकर बेहद संवेदनशील होते हैं। एक बाघ दूसरे बाघ को अपने इलाके में बर्दाश्त नहीं करता। इसी वजह से कई बार आपसी संघर्ष देखने को मिलता है। बीते कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें टेरिटरी की लड़ाई में बाघों और शावकों की मौत भी हुई है। वहीं मनुष्य और वन्य प्राणियों के बीच टकराव रोकने के लिए वन विभाग नई योजना पर काम कर रहा है। इसके तहत लगभग 500 किलोमीटर क्षेत्र चिन्हित कर वहां बाड़ लगाने की योजना बनाई जा रही है। ऐसे स्थानों को प्राथमिकता दी जाएगी, जहां वन्य प्राणियों और ग्रामीणों के बीच संघर्ष की घटनाएं अधिक होती है। विभाग का मानना है कि इससे जंगल से बाहर आने वाले प्राणियों को रोका जा सकेगा।
वन्य प्राणियों में क्षेत्रीय विवाद बढ़ रहा
 प्रदेश के अभयारण्य क्षेत्रों में बाघों की संख्या लगभग 563 है, जबकि तेंदुओं की संख्या 1200 से अधिक बताई जा रही है। यानी तेंदुए बाघों की तुलना में लगभग 129 प्रतिशत अधिक हैं। बाघों के लिए सुरक्षित इन क्षेत्रों में तेंदुओं की संख्या बढऩे से क्षेत्रीय विवाद बढ़ रहा है और कई बार दोनों का आमना-सामना भी हो जाता है। इसका असर अभयारण्य क्षेत्रों से लगे गांवों में भी दिख रहा है। तेंदुए अक्सर जंगल से बाहर निकलकर ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच रहे हैं, जिससे मनुष्य और वन्य प्राणियों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ रही हैं। स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि संजय दुबरी अभयारण्य में जहां बाघों की संख्या करीब 20 है, वहीं तेंदुए 150 से अधिक हो चुके हैं। इसी तरह सतपुड़ा अभयारण्य में लगभग 60 से अधिक बाघ हैं, जबकि तेंदुओं की संख्या 250 से ज्यादा बताई जा रही है। वन विभाग के अनुसार इस वर्ष अब तक अभयारण्य क्षेत्रों में चार बाघों की मौत दर्ज हो चुकी है। इनमें से कई मामलों में क्षेत्रीय संघर्ष को प्रमुख कारण माना गया है।
वन विभाग के पास स्टाफ का टोटा
मप्र में वन्य प्राणियों की ठीक से निगरानी नहीं हो पा रही है। इस कारण टाइगर स्टेट का दर्जा प्राप्त मप्र में पिछले पांच वर्षों में 147 बाघों की मौत हुई है। इसमें 16 की मौत शिकार या करंट लगने से हुई है। यह हाल तब है जबकि प्रदेश को टाइगर स्टेट का दर्जा मिला हुआ है। दरअसल राज्य वन सेवा के स्वीकृत पद 359 ही हैं। इनमें भी 142 ही कार्यरत हैं। वनरक्षक, वनपाल, डिप्टी रेंजर और रेंजर के मिलाकर 20,676 पदों में से 5,452 रिक्त हैं। नियमित निगरानी और सुरक्षा के लिए वन विभाग में अफसरों और कर्मचारियों की कमी आड़े आ रही है। जिसका फायदा उठाकर शिकारी गिरोह और पेड़ कटाई करने वाले वन माफिया प्रदेश के वनों में अपनी अवैध गतिविधियां संचालित कर रहे हैं। हाल ही में वन विभाग ने वन रक्षकों के करीब 1500 पदों पर भर्ती के लिए प्रक्रिया शुरू की थी, जिसकी चयन परीक्षा अप्रैल में होनी है, लेकिन उसमें भी आरक्षित पदों को लेकर पैच उलझ गया है।

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