- नई शिक्षा नीति: एनईपी की मूल धारणा अबतक लागू नहीं हो पाई…

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
नई शिक्षा नीति (एनईपी-2020) के तहत सेमेस्टर सिस्टम को उच्च शिक्षा में अनिवार्य माना गया है, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। इंदौर ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश की बात करें तो महाविद्यालयों में सेमेस्टर प्रणाली लागू होने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे। जिसकी मूल धारणा जिसमें सेमेस्टर सिस्टम लागू किया जाना चाहिए वह हुआ ही नहीं। जानकारों के अनुसार मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों में नई शिक्षा नीति को सबसे पहले लागू करने वाला संभवत: पहला राज्य था। अभी तक 70 प्रतिशत ही इसे लागू किया गया है। वजह, बुनियादी सुविधाएं और इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव। उच्च शिक्षा विभाग ने श्रेय लेने के लिए आपाधापी में न्यू एजुकेशन पॉलिसी 2020 लागू तो कर दी लेकिन उद्देश्य पूरा नहीं कर सकी। नई शिक्षा नीति सेमेस्टर सिस्टम में लागू करना थी, लेकिन उसे वार्षिक पर लागू किया। वहीं कुछ कॉलेजों को मल्टी डिसिप्लिनरी तो बना दिया गया लेकिन वहां प्रयोगशालाएं तक उपलब्ध नहीं है।
खोले जाए अन्य संकाय
एनईपी छात्रों को बहुसंख्यक विषयों में पढ़ने की सुविधा देती है लेकिन संभाग के अधिकांश महाविद्यालय संसाधनों के अभाव से जूझ रहे है। एनईपी में मल्टीपल च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम, मल्टीपल एंट्री-एग्जिट की सुविधा जो दी गई है वह तब तक नहीं मिल सकेगी जब तक मल्टीपल डिसिप्लिनरी महाविद्यालयों की स्थापना नहीं होगी या वर्तमान में संचालित महाविद्यालयों में अन्य संकायों खोले जाएंगे। जानकारों के मुताबिक जब तक छात्रों की एबीसी आईडी, एक समान सिलेबस और सभी विश्वविद्यालय व महाविद्यालय एक प्लेटफॉर्म पर नहीं आ जाते तब तक नई शिक्षा नीति को पूरी तरह लागू कर पाना मुश्किल होगा। हालांकि, ऐसे संस्थान जहां पर 10 विषयों के वोकेशनल कोर्स संचालित है, वहां छात्रों को तीन या चार विषयों को छोडक़र अन्य विषयों में च्वॉइस तो दे सकते हैं, लेकिन विषय शिक्षक भी तो उपलब्ध हो, अन्यथा वोकेशनल कोर्स के विकल्प का कोई मतलब नहीं। शासन को उच्च शिक्षा संस्थानों में संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के बाद एनईपी लागू करना चाहिए।
समय पर नहीं हो सकी परीक्षा, मूल्यांकन
जानकारों के अनुसार वर्ष 2008 के आसपास सेमेस्टर लागू किया गया था, लेकिन बड़ी संख्या में विद्यार्थी के प्रवेशित होने से सेमेस्टर सिस्टम की परीक्षा व आंतरिक मूल्यांकन समय सीमा पर पूरा नहीं हो सके। साथ ही तीन वर्षीय पाठ्यक्रम यूजी व दो वर्षीय पीजी के पाठ्यक्रम में चार वर्ष व तीन वर्ष लगने लगे। इतना ही नहीं सेमेस्टर सिस्टम होने के कारण साल में दो बार परीक्षा विश्वविद्यालय को आयोजित करना व इनका मूल्यांकन करवाना एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी। कुल मिलाकर शैक्षणिक सत्र गड़बड़ा गए थे, जिसका विरोध जताया गया, अंतत: सरकार ने 2016-17, 2017-18 से पुन: वार्षिक प्रणाली को लागू किया।
शासन की ओर से कोई निर्देश नहीं
हमें शासन की ओर से जब भी निर्देश आएंगे हम सेमेस्टर सिस्टम लागू कर देंगे। हालांकि अभी तक हमारे पास ऐसा कोई निर्देश नहीं है, जिसके चलते महाविद्यालयों में सेमेस्टर सिस्टम लागू नहीं किया है। विश्वविद्यालय में सेमेस्टर सिस्टम से ही परीक्षा होती है।
