
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर, मंदिर के गर्भगृह में पूजा-अर्चना को लेकर सभी श्रद्धालुओं के लिए समान नीति लागू करने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इंकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने शब्दों में कहा कि गर्भगृह में किसे प्रवेश की अनुमति दी जाए, यह तय करना न्यायालय का काम नहीं है, बल्कि यह मंदिर प्रशासन और संबंधित प्रबंधन का अधिकार क्षेत्र है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को स्पष्ट संकेत देते हुए कहा कि इस तरह के मामलों में अदालतें धार्मिक स्थलों के आंतरिक प्रशासन और आस्था से जुड़े नियमों में दखल नहीं दे सकतीं। अदालत के इस रुख के साथ ही याचिका को सुनवाई योग्य प्रनिने से इंकार कर दिया गया। याचिका में मांग की गई थी कि उज्जैन महाकाल मंदिर के गर्भगृह में पूजा को लेकर एक समान और पारदर्शी नीति बनाई जाए, ताकि किसी भी श्रद्धालु के साथ भेदभाव न हो। इसके साथ ही इंदौर उच्च न्यायालय का फैसला महाकाल मंदिर समिति पर लागू रहेगा, जिसमें उज्जैन कलेक्टर को यह अधिकार दिया गया था कि वे तय करें कि कौन वीआईपी है और कौन नहीं। याचिकाकर्ता का तर्क था कि वर्तमान व्यवस्था में विशेष व्यक्तियों या वर्गों को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति दी जाती है, जबकि आम श्रद्धालुओं को इससे वंचित रखा जाता है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह अदालत तय नहीं कर सकती कि मंदिर के गर्भगृह में, कौन जाएगा और कौन नहीं। यह फैसला मंदिर प्रशासन, परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के दायरे में आता है।
ढाई साल से बंद है गर्भगृह: 4 जुलाई 2023 को सावन महीने में आने वाली भारी भीड़ को देखते हुए महाकालेश्वर मंदिर का गर्भगृह 11 सितंबर 2023 तक बंद कर दिया गया था। उस समय मंदिर समिति ने कहा था कि सावन माह के समाप्त होते ही गर्भगृह आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया जाएगा। लेकिन इसके बाद गर्भगृह खुला नहीं है।
