
- लोक निर्माण विभाग के दोहरे मापदंड पर उठने लगे सवाल…
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। शासन-प्रशासन में फैसलों की गति अक्सर इस बात पर निर्भर करती दिख रही है कि मामला किससे जुड़ा है। लोक निर्माण विभाग में दो प्रभारी मुख्य अभियंताओं की पदस्थापना पर हाई कोर्ट की टिप्पणी के बाद महज दो दिन में तबादला आदेश संशोधित कर दिए गए, लेकिन लाखों कर्मचारियों और पेंशनरों के हितों से जुड़े मामलों में सरकार वर्षों तक न्यायालयों में अपील दर अपील करती रहती है। इस दोहरे रवैये को लेकर कर्मचारी संगठनों ने सवाल खड़े किए हैं।
हाल ही में हाई कोर्ट ने लोक निर्माण विभाग में वरिष्ठता संबंधी विवाद पर सुनवाई करते हुए प्रमुख सचिव सुखवीर सिंह के रवैये पर टिप्पणी की थी। न्यायालय ने विभाग द्वारा समय पर और संतोषजनक जवाब नहीं देने को गंभीर माना था। इसके बाद जिन अधिकारियों की पदस्थापना को लेकर सवाल उठे थे, उनके आदेश 16 जून को संशोधित कर दिए गए।
टिप्पणी होते ही बदले आदेश
दो दिन पहले ही पीसी वर्मा और संजय मस्के को प्रभारी मुख्य अभियंता के रूप में नई जिम्मेदारियां दी गई थीं। हाई कोर्ट की टिप्पणी सामने आने के बाद विभाग ने तत्काल आदेशों में संशोधन कर दिया। प्रशासनिक गलियारों में इसे न्यायालय की नाराजगी के बाद उठाया गया कदम माना जा रहा है। कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि जब मामला वरिष्ठ अधिकारियों से जुड़ा होता है तो शासन तेजी दिखाता है, लेकिन कर्मचारियों के हितों से जुड़े मुद्दों में वही सक्रियता नजर नहीं आती। पदोन्नति में आरक्षण, परिवीक्षा अवधि के दौरान पूर्ण वेतन, वेतन विसंगति, पेंशन और एरियर जैसे मामलों में वर्षों तक मुकदमेबाजी जारी रखी जाती है। मंत्रालय सेवा अधिकारी-कर्मचारी संघ के अध्यक्ष सुधीर नायक का कहना है कि अधिकारियों के मामलों में रातों-रात आदेश बदल जाते हैं, जबकि कर्मचारियों को न्याय मिलने के बाद भी उन्हें लाभ देने में अनावश्यक देरी की जाती है। उनका कहना है कि शासन को सभी के लिए समान नीति अपनानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट भी जता चुका है चिंता
सुप्रीम कोर्ट विशेष अनुमति याचिका क्रमांक 29852/2009 में 31 अक्टूबर 2009 को दिए गए निर्णय में स्पष्ट कर चुका है कि हर न्यायालयीन आदेश के खिलाफ अपील करना उचित नहीं है। यदि किसी कर्मचारी या पक्षकार को न्याय मिल रहा है तो केवल इसलिए मामले को ऊपरी अदालतों तक नहीं ले जाना चाहिए कि फैसला शासन के विरुद्ध गया है। सुप्रीम कोर्ट की इसी टिप्पणी के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने 18 मई 2010 को सभी विभागों को निर्देश जारी किए थे कि शासन जिम्मेदार वादी की भूमिका निभाए और अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचे। इसके बावजूद कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि इन निर्देशों का पालन व्यवहार में नहीं हो रहा।
पदोन्नति और पेंशन के मामले बने उदाहरण
तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ के प्रांतीय महामंत्री उमाशंकर तिवारी का कहना है कि पदोन्नति में आरक्षण और परिवीक्षा अवधि के वेतन जैसे मामलों को वर्षों तक अदालतों में उलझाकर रखा गया। उनके अनुसार कर्मचारियों और पेंशनरों के अधिकारों से जुड़े मामलों में सरकार लगातार अपील करती है, जबकि न्यायालय कई बार इन्हें कर्मचारियों का अधिकार बता चुका है, न कि किसी प्रकार की खैरात। सरकारी कर्मचारी संगठनों का सवाल है कि यदि न्यायालय की टिप्पणी के बाद अधिकारियों से जुड़े आदेशों में तत्काल बदलाव संभव है, तो फिर कर्मचारियों और पेंशनरों के हितों से जुड़े मामलों में वर्षों तक लंबित मुकदमेबाजी क्यों जारी रहती है? यही प्रश्न अब शासन की कार्यशैली और प्राथमिकताओं पर बहस का विषय बन रहा है।
