- इंदौर-जबलपुर-ग्वालियर के प्लान भी प्रक्रियाधीन
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मध्य प्रदेश में शहरों को व्यवस्थित और आधुनिक बनाने की सरकारी मंशा के बीच नगर नियोजन की धीमी रफ्तार सवाल खड़े कर रही है। प्रदेश के 130 शहरी निकायों में से 41 ऐसे हैं, जहां अब तक मास्टर प्लान लागू नहीं हो सका है। स्थिति यह है कि 89 शहरों के मास्टर प्लान तैयार होने के बावजूद इनमें से केवल 27 शहरों में नए मास्टर प्लान लागू किए गए हैं। वहीं, 41 शहरों के प्लान के ड्राफ्ट प्रकाशित होने के बाद भी वे लागू होने का इंतजार कर रहे हैं और 30 शहर अब भी पुराने मास्टर प्लान के आधार पर विकास कर रहे हैं। मास्टर प्लान किसी शहर के भविष्य का खाका होता है। इसमें आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्रों, सडक़ों, परिवहन, हरित क्षेत्रों और सार्वजनिक सुविधाओं के विकास की दिशा तय होती है। इसके बावजूद कई शहरों में योजना लागू नहीं होने से विकास संबंधी फैसले एक समग्र रूपरेखा के बजाय अलग-अलग स्तर पर लिए जाने की आशंका बनी हुई है।
टाउन एंड कंट्री प्लानिंग तथा नगरीय विकास विभाग के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के 130 शहरी निकायों के लिए मास्टर प्लान तैयार किए जाने हैं। इनमें 89 शहरों के प्लान तैयार हो चुके हैं, लेकिन उन्हें लागू करने की प्रक्रिया समान गति से आगे नहीं बढ़ पाई है। नए मास्टर प्लान केवल 27 शहरों में लागू हुए हैं। दूसरी ओर, 41 शहरों के ड्राफ्ट प्रकाशित होने के बाद भी अंतिम मंजूरी और क्रियान्वयन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है। राज्य सरकार ने शहरों के विकास को गति देने के लिए जिला विकास सलाहकार समितियों का गठन भी किया है। ये समितियां स्थानीय जरूरतों और विकास की संभावनाओं के संबंध में सुझाव दे रही हैं, लेकिन मास्टर प्लान लागू नहीं होने से इन सुझावों को दीर्घकालिक शहरी नियोजन के साथ जोडऩा चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
अनियोजित विकास से बढ़ सकती हैं मुश्किलें
शहरी नियोजन से जुड़े जानकारों के अनुसार, मास्टर प्लान के अभाव या पुराने प्लान के आधार पर विकास होने से छोटे और मध्यम शहरों में कई तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इनमें सड़कों पर बढ़ता दबाव, यातायात अव्यवस्था, जलभराव, अतिक्रमण और प्रदूषण प्रमुख हैं। यदि आवासीय कॉलोनियों, व्यावसायिक गतिविधियों और सार्वजनिक सुविधाओं का विस्तार भविष्य की आबादी और यातायात की जरूरतों को ध्यान में रखकर नहीं किया जाता, तो बाद में बुनियादी सुविधाएं विकसित करने की लागत बढ़ सकती है। इसी तरह, हरित क्षेत्रों और जल निकासी की व्यवस्था के लिए पर्याप्त जगह सुरक्षित नहीं रखने पर शहरों को लंबे समय तक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। विंध्य क्षेत्र में रीवा और सतना नगर निगम, शहडोल नगर पालिका तथा चित्रकूट नगर पंचायत के मास्टर प्लान लागू नहीं हो पाए हैं। उपलब्ध विभागीय जानकारी के अनुसार, चित्रकूट का प्लान वर्ष 2031 तक की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना है।
दावे-आपत्तियों और स्टाफ की कमी से देरी
विभागीय अधिकारियों के अनुसार, मास्टर प्लान के ड्राफ्ट प्रकाशित होने के बाद जनता और जनप्रतिनिधियों से बड़ी संख्या में दावे-आपत्तियां प्राप्त होती हैं। उनका परीक्षण और निराकरण समय पर नहीं हो पाने से प्रक्रिया आगे बढऩे में देरी होती है। छोटे शहरी निकायों में नगर नियोजकों की कमी भी एक चुनौती है। वहीं, बड़े शहरों में महानगर क्षेत्र के नियोजन, नए कानूनों और विकास संबंधी नियमों में बदलाव के कारण पुराने प्रस्तावों की समीक्षा करनी पड़ रही है। ऐसे में ड्राफ्ट तैयार होने और उसे औपचारिक रूप से लागू करने के बीच लंबा अंतर बना हुआ है।
भोपाल का 2047 ड्राफ्ट जारी, बड़े शहरों के प्लान लंबित
राजधानी भोपाल के मास्टर प्लान-2047 का ड्राफ्ट जारी किया जा चुका है। अब इसे अंतिम रूप देकर लागू करने की प्रक्रिया पूरी की जानी है। दूसरी ओर, इंदौर में मेट्रोपॉलिटन प्लानिंग और महानगर विकास अधिनियम के तहत नया मास्टर प्लान तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है। जबलपुर और ग्वालियर के मास्टर प्लान भी अभी प्रक्रियाधीन बताए जा रहे हैं। बड़े शहरों में महानगर क्षेत्र की जरूरतों, परिवहन नेटवर्क और बदलते विकास संबंधी नियमों के अनुरूप नियोजन की प्रक्रिया जटिल हो गई है। पुराने ड्राफ्ट में संशोधन और नई व्यवस्थाओं के अनुरूप बदलाव के कारण भी योजनाओं को अंतिम रूप देने में समय लग रहा है।
