
- उत्पादन में 2500 मेगावाट तक की कमी और एक्सचेंज में बिजली की किल्लत से बढ़ा दबाव
गौरव चौहान/भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्य प्रदेश में बिजली संकट की वजह केवल उत्पादन में कमी नहीं, बल्कि मांग में अचानक आया बड़ा उछाल भी है। पिछले साल अक्टूबर में प्रदेश की अधिकतम बिजली मांग 11,874 मेगावाट थी, जो इस साल 14 अक्टूबर को बढकऱ 17,124 मेगावाट पहुंच गई। एक साल में मांग करीब 5250 मेगावाट बढ़ गई, जबकि जल और ताप विद्युत उत्पादन में गिरावट ने आपूर्ति व्यवस्था पर दोहरा दबाव बना दिया है। अब ऊर्जा विभाग बंद इकाइयों को चालू करने, दूसरे राज्यों से बिजली लेने और एक्सचेंज से खरीद के जरिए अगले सप्ताह तक 3 से 4 हजार मेगावाट अतिरिक्त बिजली जुटाने की कोशिश कर रहा है।
कम बारिश के कारण खेतों में पलेवा और धान की सिंचाई के लिए बिजली की मांग बढ़ी है। इसका असर कृषि क्षेत्र की खपत में साफ दिखाई दे रहा है। एक अक्टूबर 2025 को कृषि क्षेत्र की बिजली मांग 1752 मेगावाट थी, जो इस साल एक अक्टूबर को बढकऱ 3701 मेगावाट हो गई। यानी कृषि क्षेत्र में ही मांग करीब 1950 मेगावाट बढ़ गई। दूसरी ओर, कम बारिश के कारण गांधीसागर, ओंकारेश्वर, इंदिरा सागर, राजघाट और सरदार सरोवर परियोजनाओं से जल विद्युत उत्पादन में करीब 1500 मेगावाट की कमी आई है। कोयले की कमी और तकनीकी दिक्कतों के कारण ताप विद्युत इकाइयों से भी लगभग 1000 मेगावाट उत्पादन प्रभावित हुआ है। इस तरह मांग बढऩे और उत्पादन घटने से बिजली व्यवस्था के सामने चुनौती खड़ी हो गई है।
आपूर्ति बढ़ी, फिर भी मांग पूरी करना मुश्किल
ऊर्जा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल अक्टूबर में 2423 लाख यूनिट बिजली की आपूर्ति की गई थी, जबकि इस वर्ष एक दिन में 3310 लाख यूनिट बिजली दी गई। यह पिछले साल के मुकाबले 38.6 प्रतिशत अधिक है। इसके बावजूद मांग में तेजी से हुई बढ़ोतरी के कारण उपलब्ध बिजली से जरूरत पूरी करना मुश्किल हो रहा है। यह स्थिति बताती है कि बिजली संकट को केवल आपूर्ति बढ़ाने से नहीं, बल्कि मांग के अनुरूप उत्पादन और उपलब्धता सुनिश्चित करके ही नियंत्रित किया जा सकता है।
एक्सचेंज में बिजली कम, खरीद के लिए ज्यादा प्रतिस्पर्धा
प्रदेश को खुले बाजार से बिजली जुटाने में भी परेशानी हो रही है। ऊर्जा मंत्री के मुताबिक, 13 अक्टूबर को इंडियन एनर्जी एक्सचेंज में बिजली खरीदने के लिए अधिकतम मांग की बोलियां करीब 70 हजार मेगावाट थीं, जबकि बिक्री के लिए लगभग 500 मेगावाट बिजली उपलब्ध थी। इसकी कीमत करीब 10 रुपये प्रति यूनिट बताई गई। ऐसे में सरकार दूसरे राज्यों और वैकल्पिक स्रोतों से बिजली जुटाने में लगी है। उत्तर प्रदेश से अधिक मांग वाले घंटों में 500 मेगावाट बिजली ली जा रही है। इसके अलावा एक्सचेंज से बिजली खरीदने के प्रयास जारी हैं।
बंद इकाइयों से मिलेगी राहत
ऊर्जा विभाग के मुताबिक, खंडवा और बीरसिंहपुर की इकाइयों में रखरखाव के बाद उत्पादन शुरू होने से करीब 1000 मेगावाट बिजली की उपलब्धता बढ़ी है। 20 अक्टूबर तक लैंको पावर और एनटीपीसी गाडरवारा की इकाइयों से लगभग 600 मेगावाट बिजली मिलने की उम्मीद है। तकनीकी कारणों से बंद करीब 1200 मेगावाट क्षमता की इकाइयों को भी एक-दो दिन में चालू करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके अलावा 16 अक्टूबर से 500 मेगावाट बैंकिंग बिजली मिलने की संभावना जताई गई है। विभाग का अनुमान है कि इन उपायों से अगले सप्ताह तक 3 से 4 हजार मेगावाट अतिरिक्त बिजली उपलब्ध हो सकती है। हालांकि, यह लक्ष्य बंद इकाइयों के समय पर चालू होने और दूसरे स्रोतों से बिजली मिलने पर निर्भर करेगा। इसलिए फिलहाल राहत की संभावना है, लेकिन आपूर्ति सामान्य होने की समयसीमा उपलब्धता पर ही तय होगी।
रबी सीजन के लिए अभी से इंतजाम
ऊर्जा विभाग ने आगामी रबी सीजन की जरूरतों को देखते हुए अग्रिम बैंकिंग के जरिए भी बिजली की व्यवस्था की है। विभाग के अनुसार, पिछले वर्ष 3600 मिलियन यूनिट की तुलना में इस बार करीब 225 मिलियन यूनिट अतिरिक्त बिजली की बैंकिंग की गई है। इसके तहत एक नवंबर 2026 से 10 मार्च 2027 तक जरूरत के अनुसार 407 से 3900 मेगावाट तक बिजली मिलने का उल्लेख किया गया है। इससे रबी सीजन में कृषि क्षेत्र की बढ़ती मांग पूरी करने में मदद मिलने की उम्मीद है। फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती मौजूदा मांग और उपलब्ध बिजली के बीच के अंतर को कम करना है। अगले सप्ताह तक अतिरिक्त बिजली मिलने से दबाव घट सकता है, लेकिन दीर्घकालिक राहत के लिए उत्पादन इकाइयों की उपलब्धता, ईंधन आपूर्ति और बिजली की अग्रिम व्यवस्था अहम होगी।
