- पांच साल में सिंचाई का रकवा 1 करोड़ हेक्टेयर करने का लक्ष्य

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र सरकार का सबसे अधिक ध्यान खेती-किसानी पर है। इसके मद्देनजर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रदेश में सिंचाई क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। सरकार ने पांच साल में सिंचाई का रकबा 1 लाख करोड़ हेक्टेयर करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। लेकिन अधिकारियों की लापरवाही के कारण कई सिंचाई परियोजनाएं आधी-अधूरी हैं।
मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. मोहन यादव ने अपनी प्राथमिकताओं को सर्वोपरि रखा, जिनमें थी-कृषि, सिंचाई भी शामिल है। इन क्षेत्रों में उनकी सरकार ने वास्तविक परिवर्तनकारी कदम उठाए। प्रदेश की मोहन सरकार ने सिंचाई क्षमता 100 लाख हेक्टेयर तक ले जाने का टारगेट तय किया है। जल संसाधन विभाग के अनुसार यह लक्ष्य 2028 तक और मजबूत होने की पूरी सम्भावना है। बुंदेलखंड जैसे पिछड़े क्षेत्र में सिंचाई विस्तार ने किसानों को नई उम्मीद दी है। लेकिन अधिकारियों की लापरवाही और भर्राशाही के कारण सिंचाई की कई परियोजनाओं की गति इतनी धीमी गति से चल रही है कि उनकी लागत बढ़ गई है। बताया गया है कि सरकार ने माइक्रो इरिगेशन पर जोर देते हुए ड्रॉप मोर क्रॉप्ट के तहत 133 बृहद और मध्यम माइक्रो-इरिगेशन परियोजनाएं प्रारंभ कराई है। इनका उद्देश्य जिससे पानी का बेहतर उपयोग हो सके। लेकिन इनमें भी कई परियोजनाएं अभी भी पूरी नहीं हुई हैं या पाइपलाइन में हैं।
लापरवाही ने बढ़ाई परियोजनाओं की लागत
प्रदेश में कई ऐसी बड़ी सिंचाई परियोजनाएं हैं, जिनकी अधिकारियों की लापरवाही की वजह से लागत बढ़ी है और तय समय में निर्धारित रकवा क्षेत्र में सिंचाई का लक्ष्य भी पूरा नहीं हुआ है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव आने वाले पांच साल में मध्यप्रदेश में सिंचाई का रकबा 1 करोड़ हेक्टेयर करने के संकल्प के साथ पूरी ताकत से काम कर रहे हैं, लेकिन सिंचाई विभाग के कुछ अधिकारियों की लापरवाही की वजह से कई परियोजनाएं अपने अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुंच पा रही है। इसकी वजह से परियोजनाओं की जहां लागत लगातार बढ़ रही है, तो वहीं सरकार द्वारा निर्धारित सिंचाई रकवा में भी पानी नहीं पहुंच पा रहा है। प्रदेश में बड़ी, मध्यम और सूक्ष्म कई सिंचाई परियोजनाएं चल रही हैं लेकिन कई ऐसी परियोजनाएं भी हैं, जो निर्माणाधीन हैं। इनमें से कुछ परियोजनाएं विभागीय लापरवाही व दूसरे कारणों की वजह से लंबित हैं और जिनकी लागत भी बढ़ गई है। इनमें जैसे चितरंगी, जावद नीमच परियोजनाओं को 2025-26 तक पूरी होना है, लेकिन वास्तविक स्थिति को आंकलन कर ये समय पर पूरी नहीं हो पाएंगी।
समय पर लक्ष्य पूरा होना मुश्किल
उल्लेखनीय है कि सरकार को वर्ष 2025-26 के दौरान प्रदेश में सिंचाई का रकबा 65 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाना है, लेकिन यह लक्ष्य पूरा हो पाएगा, इस पर कहा नहीं जा सकता है। बताया गया है कि कुछ परियोजनाएं पूरी होने के बाद भी, तकनीकी या प्रबंधन कारणों से उनका पूरा लाभ नहीं मिल पाता। मप्र में कई सिंचाई परियोजनाएं अधूरी हैं, जिनमें मुख्य रूप से बिजलवाड़ा (खरगोन), नागलवाड़ी (बड़वानी), और कई उद्वहन सिंचाई परियोजनाएं शामिल हैं, जहां किसानों को पानी नहीं मिल रहा और जबकि कुछ परियोजनाओं (जैसे मोहनपुरा) में भी पानी वितरण को लेकर शिकायतें हैं। हनोता (सागर), मां टेवा (देवास), सीतापुर-हनुमना (रीवा/मऊगंज) जैसी नई परियोजनाओं के लिए केंद्र की मंजूरी वा वन-भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया चल रही है, जिससे देरी हो रही है पर विभाग की कोशिश है कि वर्ष 2029 तक कई बड़ी परियोजनाओं को पूरा करने का लक्ष्य बना रही है। मध्य प्रदेश में कई सिंचाई परियोजनाएं लापरवाही के कारण अधूरी हैं, जिससे लागत में भारी वृद्धि हुई है और किसानों को नुकसान हुआ है। इसमें त्योंथर परियोजना भी शामिल है। 254 करोड़ रुपये की इस परियोजना को 3 साल में पूरा होना था, लेकिन 6 साल बाद भी अधूरी है। इससे 1715 करोड़ रुपये के राष्ट्रीय कृषि उत्पादन का नुकसान हुआ, और लागत बढ़ी है। इसी तरह राजगढ़ जिले की 1375 करोड़ रुपए की सुवालिया परियोजना का काम भी 6 महीने से रुका हुआ है, जिससे देरी और लागत में वृद्धि हुई है। इसी तरह मोहनपुरा और कुंडलिया परियोजनाओं की लागत 3866 करोड़ और 3448 करोड़ रुपये थी, जिन्हें पूरा होने में देरी हुई और लागत बढ़ी। यह परियोजना वर्ष 2016 में स्वीकृत की गई थी, जिसे 2021-22 में पूरी होनी थी। जानकारों का कहना है कि परियोजनाओं के बिलंब होनी के वजह से जहां मूल लागत में वृद्धि होती है, जिससे सरकार पर आर्थिक भार आता है, तो इन परियोजनाओं के लिए रेखांकित रकबा क्षेत्र में समय पर सिंचाई न मिलने से कृषि उत्पादन को भारी नुकसान होता है।
