- गौशालाओं के लिए दो बार के टेंडर में केवल दो ही आवेदन आए

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
मप्र की सडक़ों पर अक्सर बेसहारा गाय घूमती नजर आती हैं। इससे न केवल गाय को कष्ट होता है, बल्कि दुर्घटनाएं भी बढ़ती हैं। इस समस्या के समाधान के लिए पशुपालन विभाग प्रदेश में 50 नई स्वावलंबी गोशालाएं खोलने जा रहा है। सरकार का मुख्य लक्ष्य अगले दो वर्षों में सडक़ों को गाय से मुक्त करना है। लेकिन विडंबना यह है कि पब्लिक प्रायवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड पर खोली जाने वाली इन गौशालाओं में फिलहाल लोगों की रूचि नजर नहीं आ रही है। सरकार ने इसके लिए अब तक दो बार टेंडर निकाला है और इसमें केवल दो ही आवेदन आए हैं।
पशुपालन विभाग के अनुसार, इन आधुनिक गोशालाओं की क्षमता बहुत अधिक होगी। एक गौशाला में कम से कम 5 हजार गाय को रखा जा सकेगा। यह कदम बेसहारा गोवंश को सुरक्षित छत देने के लिए उठाया गया है। स्वावलंबी गोशालाएं का मतलब, जो गाय के रखरखाव के लिए सरकारी मदद पर निर्भर नहीं रहतीं। गोबर और गोमूत्र से खाद, फिनाइल या सीएनजी जैसे उत्पाद बनाकर अपनी कमाई खुद करती हैं। इसके लिए सरकार ने स्वावलंबी गौशाला (कामधेनु निवास) की स्थापना नीति-2025 लागू की है। इस नीति के तहत सरकार ने प्रदेश में 50 बड़ी गौशालाएं खोलने की तैयारी की है। ये गौशालाएं पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मोड पर खोली जानी हैं। हालांकि अभी लोग/संस्थाएं पीपीपी मोड पर गौशालाएं खोलने में रुचि नहीं दिखा रही हैं।
10 लाख से ज्यादा निराश्रित गौवंश
दरअसल, प्रदेश में 10 लाख से ज्यादा निराश्रित गौवंश है। बारिश में निराश्रित गौवंश वाहन चालकों के लिए परेशानी खड़ी करते हैं और कई बार इनके कारण सडक़ हादसे भी हो जाते हैं। निराश्रित गौवंश के पालन-पोषण और गौशालाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए डॉ. मोहन यादव कैबिनेट ने पिछले साल अप्रैल में स्वावलंबी गौशाला (कामधेनु निवास) की स्थापना नीति-2025 को मंजूरी दी थी। इस नीति में न्यूनतम 5000 गौवंश के व्यवस्थापन के लिए राज्य सरकार द्वारा 130 एकड़ तक भूमि गौशालाओं को उपयोग के लिए देने का प्रावधान है। इसमें से 5 एकड़ भूमि व्यावसायिक गतिविधियों के लिए दी जाएगी। साथ ही प्रत्येक 1000 गौवंश की वृद्धि पर 25 एकड़ दी जा सकेगी। गौशाला खोलने के लिए निवेशक को 50 करोड़ रुपए का निवेश करना होगा। इस नीति के तहत प्रदेश स्तर से अभी 20 गौशालाओं की स्वीकृति दी गई है। गौरतलब है कि प्रदेश में कुल 2964 में गौशालाएं संचालित हैं, जिनमें लगभग 4.53 लाख गौवंश रखे गए हैं। 887 गौशालाएं निर्माणाधीन है, प्रत्येक की क्षमता 100 गौवंश की है। कुल 10.37 लाख निराश्रित गौवंश हैं, जिनमें से शेष 5 लाख से ज्यादा गौवंश के लिए 100 गौवंश की क्षमता वाली 5144 गौशाला की जरूरत होगी। प्रदेश के 1.87 करोड़ गौवंश में से लगभग 70 प्रतिशत गौवंश अवर्णित नस्ल के हैं।
तीसरी बार टेंडर जारी करने की तैयारी
सरकार की ओर से निवेशकों को गौशाला खोलने के लिए आकर्षित करने दो बार टेंडर जारी किए जा चुके हैं, लेकिन सिर्फ 2 ही आवेदन आए हैं। अब पशुपालन विभाग गौशालाएं खोलने के लिए तीसरी बार टेंडर जारी करने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए सरकार दो बार टेंडर जारी कर चुकी है। पहली बार एक भी आवेदन नहीं आया। दूसरी बार में दो आवेदन आए हैं। आवेदकों ने दमोह और भोपाल के नजीदक चिकलोद में गौशालाएं खोलने में रुचि दिखाई है। औपचारिकताएं पूरी करने के बाद इन्हें दोनों स्थानों पर गौशालाएं खोलने की अनुमति दे दी जाएगी। इसके लिए पूर्व में ही जमीन आरक्षित की जा चुकी है। पशुपालन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि निराश्रित गौवंश के लिए स्वावलंबी गौशालाएं खोलने को लेकर निवेशकों को आमंत्रित करने फिर से टेंडर जारी किए जाएंगे। चूंकि अभी शुरुआत है, इसलिए लोग गौशालाएं खोलने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं, लेकिन उम्मीद है कि आने वाले दिनों में बड़ी संख्या में लोग/संस्थाएं आगे आएंगी। सरकार का आने वाले समय में प्रदेश में 50 स्वावलंबी गौशालाएं खोलने का लक्ष्य है।
गौवंश संरक्षण सरकार की प्राथमिकता
मप्र सरकार की प्राथमिकता में गौवंश संरक्षण है। सरकार ने प्रदेश में गौवंश के संरक्षण और दुग्ध उत्पादन में बढ़ोतरी के लिए पिछले दो वर्षों में कई निर्णय लिए हैं। गौशालाओं को दी जाने वाली अनुदान की राशि 20 रुपए से बढ़ाकर 40 रुपए प्रतिदिन प्रति गौवंश की गई है। देश के दुग्ध उत्पादन में प्रदेश की भागीदारी 9 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत करने के उद्देश्य से डॉ. भीमराव अम्बेडकर कामधेनु योजना शुरू की गई है। योजना में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति श्रेणी के हितग्राहियों के लिए परियोजना लागत का 33 प्रतिशत एवं अन्य श्रेणी के हितग्राहियों के लिए 25 प्रतिशत सब्सिडी दी जाएगी। एमपी स्टेट को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन लिमिटेड एवं संबद्ध दुग्ध संघों और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के बीच एमओयू किया गया है। सरकार का लक्ष्य राज्य में औसत दुग्ध संकलन तीन वर्षों में 33 लाख लीटर प्रतिदिन करना है। सहकारिता अंतर्गत आने वाले 3 वर्षों में 15 हजार से अधिक ग्रामों को कवर करना और दुग्ध सहकारी समिति सदस्यों की संख्या बढ़ाकर कुल 47 लाख करना है।
