एनजीटी ने नर्मदा प्रदूषण रोकने सरकार को दिए आदेश

नर्मदा प्रदूषण
  • 100 मीटर के भीतर प्लास्टिक प्रतिबंध करना पड़ेगा, कार्रवाई की रिपोर्ट भी देना होगी

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। नर्मदा नदी में गंदा पानी और डेरी का जल मिलने की समस्या को रोकने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने राज्य सरकार को अहम निर्देश दिए हैं। एनजीटी ने कहा है कि तीन माह के भीतर सरकार अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट करे कि नदी में प्रदूषण रोकने के लिए कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं। इसके साथ ही एनजीटी ने निर्देश दिए हैं कि नर्मदा किनारे स्थित डेरी उद्योगों को हटाया जाए। रिपोर्ट के बाद इस मामले में अगली सुनवाई होगी। यह मामला नागरिक उपभोक्ता मंच के संरक्षक डॉ. पीजी नाजपांडे की याचिका से जुड़ा है, जिसमें नर्मदा नदी में लगातार हो रहे प्रदूषण का जिक्र किया गया था। एनजीटी की भोपाल बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि नर्मदा के बाढ़ क्षेत्र का सीमांकन किया जाए और प्रतिबंधित क्षेत्र से सभी स्थाई निर्माण हटाए जाएं। इसके अलावा नर्मदा नदी के 100 मीटर के दायरे में प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश भी दिया गया। एनजीटी ने पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिया है कि वे कलेक्टर्स के माध्यम से नर्मदा, परियट और गौर नदियों के किनारे स्थित डेरी उद्योगों को दूर शिफ्ट करवाएं, ताकि डेरी का प्रदूषण सीधे नदी में न मिल सके।
रिहायशी इलाकों से हटेंगी अवैध फैक्ट्रियां
वहीं, भोपाल में चल रही 50 से ज्यादा अवैध प्लास्टिक रीसाइक्लिंग यूनिट्स आज करीब 2 लाख लोगों की सेहत के लिए बड़ा खतरा बन गई हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की भोपाल बेंच ने इस मामले पर खुद संज्ञान लेते हुए मध्य प्रदेश सरकार और नगर निगमों को कड़ी चेतावनी दी है। एनजीटी ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि आबादी के बीच चल रही अवैध प्लास्टिक फैक्ट्रियां पर्यावरण के नियमों को तोड़ रही हैं। कोर्ट ने प्रशासन को आदेश दिया है कि इन फैक्ट्रियों को तत्काल बंद किया जाए या फिर इन्हें शहर से दूर इंडस्ट्रियल एरिया में शिफ्ट किया जाए। इसके साथ ही, चिप्स के पैकेट जैसे मल्टी-लेयर प्लास्टिक को बंद कर उसकी जगह ऐसे विकल्प लाने को कहा गया है जो मिट्टी में आसानी से गल सकें।
रोजमर्रा के सामान पर लगेगा बैन
कोर्ट की चिंता उन बारीक प्लास्टिक कणों (माइक्रोप्लास्टिक) को लेकर भी है जो दिखाई नहीं देते। एनजीटी ने निर्देश दिया है कि फेस वॉश और कॉस्मेटिक जैसे पर्सनल केयर उत्पादों में माइक्रोप्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाए। यही नहीं, अब ऐसी वॉशिंग मशीनों के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है जिनमें फिल्टर लगे हों, ताकि कपड़ों से निकलने वाला प्लास्टिक कचरा नालियों के जरिए हमारी नदियों और तालाबों को जहरीला न बनाए।
हवा और पानी की होगी कड़ी जांच
प्रदूषण कितना गहरा है, इसे मापने के लिए अब साल में दो बार नगर निगमों को पानी की सप्लाई और तालाबों की जांच करनी होगी। यह देखा जाएगा कि कहीं हमारे पीने के पानी में प्लास्टिक के कण तो नहीं मिल रहे। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को ऐसी नई मशीनें और तकनीक तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है जो हवा, पानी और मिट्टी से माइक्रोप्लास्टिक को छानकर बाहर निकाल सकें। जजों का मानना है कि यह प्लास्टिक लंबे समय में शरीर के अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
सिर्फ 12 सीवर ट्रीटमेंट प्लांट्स कर रहे काम
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि जबलपुर में स्थापित 16 सीवर ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) में से केवल 12 ही काम कर रहे हैं, जबकि गौरीघाट, लालपुर, रानीताल और गुलौआ तालाब में लगाए गए 4 एसटीपी बंद हैं। एनजीटी ने कहा कि यह स्थिति नर्मदा के शुद्धिकरण में बाधक है और तीन माह के भीतर कार्रवाई कर रिपोर्ट सौंपने के आदेश दिए।
स्थाई निर्माण हटाया जाए
डॉ. पीजी नाजपांडे ने बताया कि एनजीटी ने सबसे पहले कहा कि नर्मदा के बाढ़ क्षेत्र का सीमांकन किया जाए और वहां किए गए सभी स्थाई निर्माण तुरंत हटाए जाएं। इसके साथ ही परियट, गौर और नर्मदा नदी के किनारे स्थित डेरी उद्योगों को हटाने का आदेश दिया गया, ताकि नदी में पानी साफ और प्रदूषण मुक्त रहे। याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि आदेश में 100 मीटर के भीतर प्लास्टिक बैन करने का निर्देश भी दिया गया है। जबलपुर में 16 एसटीपी लगाए गए थे, जिनमें से 12 ही चल रहे हैं और 4 बंद हैं। इससे स्पष्ट होता है कि अभी भी नर्मदा का शुद्धिकरण अधूरा है और जल्द सुधार की आवश्यकता है।

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