मध्यप्रदेश में न वन अमला सुरक्षित, न ही बाघ

  • टाइगर स्टेट में प्रशासनिक सुस्ती और सिस्टम की विफलता….

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
टाइगर स्टेट मप्र में प्रशासनिक सुस्ती और सिस्टम की विफलता के कारण ने वन अमला सुरक्षित है और न ही बाघ। मप्र में आए दिन वन अमले पर हमले की खबर आती रहती है। मप्र में जंगलों की सुरक्षा करने वाला वन अमला खुद असुरक्षा के साये में है। रेत और लकड़ी माफिया के बढ़ते हौसलों के बीच वन कर्मियों पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि कहीं वनकर्मियों की पिटाई हो रही है, तो कहीं उन्हें वाहनों से कुचलकर मार दिया जा रहा है। ताजा मामला मुरैना का है, जहां दो दिन पहले रेत माफिया ने वनरक्षक हरकेश गुर्जर को ट्रैक्टर-ट्रॉली से कुचल दिया। जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। वहीं, पहले भी शहडोल में लकड़ी माफिया द्वारा वन टीम को बंधक बनाकर पीटने की घटना भी सामने आ चुकी है, जिसमें रेंजर और डिप्टी रेंजर घायल हुए थे। वहीं साल 2026 में 3 महीनों में 14 बाघों की मौत हो चुकी है। पिछले साल 55 की जान गई थी। इस स्थिति के पीछे की वजह यह है कि प्रदेश में वन अमले में भारी कमी है। 31 प्रतिशत अधिकारी-कर्मचारियों के पद खाली पड़े हैं।
जंगलों में मैदानी अमला नहीं होने से जानवरों की सुरक्षा और देखभाल का संकट खड़ा हो गया है। वन विभाग की 31 मार्च को जारी रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि कुल 26,079 पदों में से 8,125 पद खाली हैं। 1 जनवरी 2026 की स्थिति में विभाग में करीब 18 हजार अधिकारी-कर्मचारी ही कार्यरत हैं, जो मौजूदा जंगलों और वन्य जीवों के हिसाब से पर्याप्त नहीं हैं। घटना के बाद वन विभाग के अमले में भारी आक्रोश और भय का माहौल है। वन कर्मियों का कहना है कि उन्हें बिना पर्याप्त हथियार और संसाधनों के माफिया से मुकाबला करना पड़ता है। डंडों के सहारे सशस्त्र माफिया का सामना करना जोखिम है। आरोप हैं कि राजनेताओं और अफसरों का झुकाव माफिया की ओर होने से मनोबल और बढ़ रहा है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वन अमले पर हर साल 20-30 हमले होते हैं, जिसमें कई का जाने गंवानी पड़ी है।  हर साल वनकर्मियों के साथ मारपीट के 20-30 मामले दर्ज होते हैं। पिछले तीन वर्षों में आधा दर्जन से अधिक वन कर्मियों की मौत हुई है। वन अमले को बंधक बनाकर पीटने और कुचलने की कोशिश होती रहती है। मप्र में कई तरह के माफिया सक्रिय हैं।  चंबल क्षेत्र (मुरैना, भिंड)में रेत माफिया, शहडोल, बालाघाट, बैतूल में लकड़ी माफिया, भोपाल, शिवपुरी, सागर, छतरपुर में  खनिज, अतिक्रमण माफिया और छिंदवाड़ा, गुना, रायसेन, विदिशा में मिश्रित माफिया अवैध गतिविधियों में लिप्त हैं।
विशेष सशत्र बल की तीन बटालियन की मांग
मुरैना वन मंडल ने रेत माफिया से निपटने के लिए विशेष सशस्त्र बल की तीन बटालियन की मांग की है। एपीसीसीएफ अमित दुबे के मुताबिक इस संबंध में पुलिस मुख्यालय को कई बार पत्र भेजे गए, लेकिन अब तक न बल मिला और न ही कोई जवाब आया। गौरतलब है कि  नवंबर 2025 में तत्कालीन पीसीसीएफ एंड हॉफ ने लटेरी विदिशा न्यायिक जांच आयोग की सिफारिशों के आधार पर सरकार को सुझाव दिए थे, लेकिन वन विभाग और सरकार उन सुझावों और सिफारिशों को दबाकर बैठ गया है। वन कर्मियों की मांग है कि महाराष्ट्र, ओडिशा और असम जैसे राज्यों ने अपने वनकर्मियों को कानूनी सुरक्षा दी है, जहां मजिस्ट्रेट जांच के बिना कर्मचारियों पर मुकदमा नहीं चल सकता है। अब सवाल उठने लगा है कि मप्र सरकार के लिए ग्रीन सोल्जर्स महत्वपूर्ण हैं या वन माफिया जरूरी है। वनकर्मियों को आवश्यक संसाधन, आधुनिक उपकरण और पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध कराया जाए ताकि वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन सुरक्षित वातावरण में कर सकें।
सुप्रीम कोर्ट में होगी मुरैना होमगार्ड मामले की सुनवाई
मुरैना में वन रक्षक की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वत संज्ञान लिया है। राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य में अवैध रेत उत्खनन के एक लंबित मामले में याचिका दायर की गई थी। जिसमें हरिकेश गुर्जर का भी मामला उठा। अब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर अगले हफ्ते सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अगले हफ्ते सुनवाई करेगा। असल में सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य में अवैध रेत उत्खनन से जुड़े मामले में याचिका दायर की गई थी। जिसमें फिर वनरक्षक हरिकेश गुर्जर की हत्या का मामला भी उठा। जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच में ये मामला उठा। जिस पर अगले हफ्ते सुनवाई होगी।

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