
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र में एक तरफ सरकार जहां धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थिति यह है प्रदेश के अधिकांश मंदिर ऐसे हैं जिनका संचालन चंदे और भगवान के भरोसे हो रहा है। इन मंदिरों में जमीन या अन्य संपत्तियों का प्रबंधन सही न होने, या सरकारी नियंत्रण के बावजूद आर्थिक मदद न पहुंचने के कारण पुजारियों और मंदिरों के रख-रखाव में भारी मुश्किलें आ रही हैं। धन की कमी से मंदिरों का जीर्णोद्धार, पुजारियों की तनख्वाह, और दैनिक पूजा-पाठ प्रभावित हो रहा है। हिंदू संगठन लगातार मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग कर रहे हैं ताकि प्रबंधन बेहतर हो सके। 2025-26 में सरकार द्वारा 21.86 करोड़ से 127 शासन संधारित मंदिरों का जीर्णोद्धार किया गया है। इसके साथ 21 करोड़ 96 लाख का मानदेय पुजारियों को प्रदान किया गया है। लेकिन जिन जिलों में शासन संधारित मंदिर नहीं है, उन्हें इस सुविधा का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
जानकारी के अनुसार, सरकारी नियंत्रण के बावजूद, कई जगह मंदिर की संपत्ति का उपयोग केवल धार्मिक उद्देश्यों के लिए नहीं हो पा रहा है, जिससे वे लावारिस जैसी स्थिति में हैं। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मंदिर की आय (दान) का उपयोग केवल भक्तों की सुविधा और मंदिर के विकास के लिए होना चाहिए, न कि सरकारी कामों के लिए। प्रदेश में धार्मिक स्थलों के संरक्षण के लिए वर्ष 1981 में धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग का गठन किया गया। प्रदेश के कुछ बड़े मंदिर जैसे महाकालेश्वर मंदिर, सलकनपुर, शारदा देवी मंदिर मैहर, गणपति मंदिर खजराना इंदौर आदि का प्रबंधन उनके लिए बने अनिधियम और नियमों से प्रशासित होता है। लेकिन अन्य मंदिर विभाग से मिलने वाले अनुदान पर ही निर्भर रहते हैं। वहीं धर्मस्व विभाग की सूची के अनुसार, उज्जैन जिले में सबसे ज्यादा 2536 शासन संधारित मंदिर हैं। इसके बाद मंदसौर में 2306 रतलाम में 1758, नीमच में 1433, धार में 1223, राजगढ़ में 1203, दतिया में 1133, इंदौर में 1015 शासन द्वारा संधारित मंदिर हैं।
14 जिलों में मंदिरों को सरकारी मदद नहीं
प्रदेश में शासन द्वारा संधारित मंदिरों की संख्या 22,098 है। लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्रदेश में 14 जिले बुरहानपुर, अनूपपुर, दमोह, रायसेन, हरदा, बैतूल, जबलपुर, कटनी, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, सिवनी, मंडला, बालाघाट, पांढुर्ना ऐसे जिले हैं जहां एक भी शासन द्वारा संधारित मंदिर नहीं है। इसका सीधा मतलब है कि यहां के मंदिरों को शासन से कोई राशि नहीं मिलती है। न ही पुजारियों को मानदेय मिलता है। जबकि इन जिलों में कई अति प्राचीन मंदिर हैं। प्रदेश के ऐसे मंदिर जिनके संबंध में भू-अभिलेख में भूमि स्वामी के रूप में मंदिर की मूर्ति का नाम दर्ज है, उन मंदिरों को शासन संधारित मंदिर माना जाता है। कलेक्टर उनके प्रशासक होते हैं। शासन संधारित मंदिरों में शासन द्वारा मुख्यत: मंदिरों का जीर्णोद्धार एवं धर्मशाला का निर्माण कराया जाता है। इनमें कार्यरत पुजारियों की नियुक्ति और उन्हें मानदेय वितरण का काम कलेक्टर के माध्यम से धर्मस्व विभाग द्वारा किया जाता है।
