
- मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने संकल्प को किया पूरा
डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के साथ जो संकल्प लिए थे, उनमें से एक था मप्र की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को सुगम और आरामदायक बनाना। अब उनका यह संकल्प मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा और पीएम ई-बस सेवा के शुरू होने के साथ ही पूरा हो गया। अब लोग सरकारी बसों में लग्जरी सफर कर रहे हैं।
गौरव चौहान/बिच्छू डॉट कॉम
भोपाल (डीएनएन)। मध्यप्रदेश में सार्वजनिक बस परिवहन की तस्वीर बदलने की कवायद अब सडक़ों पर दिखाई देने लगी है। करीब 21 साल बाद राज्य में सरकारी पहल से सार्वजनिक परिवहन बस सेवा नए स्वरूप में दोबारा शुरू हुई है। 25 सितंबर को भोपाल के भेल दशहरा मैदान से केंद्रीय सडक़ परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा और पीएम ई-बस सेवा की शुरुआत की। पहले चरण में 351 बसों को हरी झंडी दिखाई गई। ये बसें भोपाल, इंदौर, जबलपुर, रीवा, देवास, कटनी और भिंड में इंटरसिटी तथा इंट्रासिटी सेवाओं से जुड़ेंगी। सरकार के सामने अब असली चुनौती उद्घाटन के बाद शुरू होती है। शुरुआती 351 बसों को एक बड़े सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क में बदलना, गांवों को शहरों से जोडऩा, बसों की नियमितता बनाए रखना, किराये को निजी डीजल बसों के मुकाबले किफायती रखना और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना इस पूरी योजना की अगली परीक्षा होगी। राज्य सरकार ने पहले साल में करीब 1500 बसों के संचालन का लक्ष्य रखा है और इसे चरणबद्ध तरीके से बढ़ाकर 2031 तक 15 हजार बसों तक ले जाने की बात कही है। सरकार का घोषित लक्ष्य यह भी है कि बस नेटवर्क को प्रदेश की करीब 75 प्रतिशत ग्राम पंचायतों तक पहुंचाया जाए।
मध्यप्रदेश में सार्वजनिक परिवहन बस सेवा की वापसी को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि लंबे समय से यात्रियों का बड़ा हिस्सा निजी बसों, टैक्सी, ऑटो और दूसरे साधनों पर निर्भर रहा है। खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में ऐसी कनेक्टिविटी की कमी रही है, जहां नियमित बस सेवा रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बाजार तक पहुंच का प्रमुख माध्यम बन सकती है। नई सेवा का घोषित मॉडल केवल शहरों के भीतर बस चलाने तक सीमित नहीं है। इसमें गांव-शहर कनेक्टिविटी, शहरों के बीच यात्रा और अंतरराज्यीय मार्गों को भी जोडऩे की योजना है। यानी सरकार सार्वजनिक परिवहन को सिर्फ शहरी सुविधा के बजाय व्यापक मोबिलिटी नेटवर्क के रूप में विकसित करना चाहती है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कार्यक्रम में कहा कि मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा का उद्देश्य शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच बस कनेक्टिविटी मजबूत करना और नागरिकों को सुरक्षित, सुविधाजनक, आधुनिक तथा पर्यावरण-अनुकूल परिवहन उपलब्ध कराना है। सरकार ने सेवा के विस्तार के साथ 75 प्रतिशत ग्राम पंचायतों को बस नेटवर्क से जोडऩे का लक्ष्य बताया है। इस लक्ष्य का महत्व इसलिए भी है क्योंकि मध्यप्रदेश का बड़ा भौगोलिक क्षेत्र ग्रामीण है। यदि बस नेटवर्क वास्तव में ग्राम पंचायत स्तर तक पहुंचता है तो इसका असर केवल यात्रियों की सुविधा तक सीमित नहीं रहेगा। ग्रामीण युवाओं के लिए कॉलेज और रोजगार केंद्रों तक पहुंच, किसानों के लिए मंडियों तक आवागमन, मरीजों के लिए जिला अस्पतालों तक पहुंच और छोटे कारोबारियों के लिए बाजार कनेक्टिविटी भी इससे प्रभावित होगी।
पहले चरण में सात शहर
पहले चरण में सात शहरों को शामिल किया गया है। इनमें इंदौर, भोपाल, जबलपुर, रीवा, देवास, कटनी और भिंड शामिल हैं। 351 बसों के इस शुरुआती नेटवर्क में इंटरसिटी और इंट्रासिटी दोनों तरह की सेवाएं शामिल हैं। सरकार की योजना आगे इसे प्रदेशव्यापी नेटवर्क में बदलने की है। शुरुआती चरण को एक तरह से पायलट के रूप में भी देखा जा सकता है, जहां रूट, यात्री मांग, संचालन लागत, किराया, चार्जिंग व्यवस्था, बसों की उपलब्धता और शिकायत निवारण जैसे पहलुओं का अनुभव आगे के विस्तार का आधार बनेगा। यहां एक अहम फर्क यह है कि सरकार सिर्फ बसों की संख्या बढ़ाने की बात नहीं कर रही, बल्कि उनके संचालन को तकनीकी निगरानी से जोडऩे की तैयारी भी है। बसों में ष्टष्टञ्जङ्क कैमरे, पैनिक बटन और लाइव लोकेशन ट्रैकिंग जैसी सुविधाएं रखी गई हैं। बसों के संचालन और समय की निगरानी कमांड एंड कंट्रोल सेंटर के जरिए किए जाने की बात कही गई है। यात्री सूचना प्रणाली और शिकायत निवारण की व्यवस्था भी प्रस्तावित है। यानी नई बस सेवा का मॉडल केवल बस खरीदकर सडक़ पर उतारने का नहीं, बल्कि बस और डिजिटल निगरानी को एक साथ जोडऩे का है। सार्वजनिक परिवहन की सफलता में केवल बस की संख्या महत्वपूर्ण नहीं होती। यात्री को यह भरोसा भी चाहिए कि बस निर्धारित समय पर मिलेगी, चालक सुरक्षित तरीके से वाहन चलाएगा, रास्ते में बस की स्थिति की जानकारी उपलब्ध होगी और किसी आपात स्थिति में सहायता मिल सकेगी। नई सेवा में इसी दिशा में तकनीक का इस्तेमाल करने का दावा किया गया है। ष्टष्टञ्जङ्क कैमरे, पैनिक बटन और लाइव लोकेशन ट्रैकिंग को यात्रियों की सुरक्षा से जोड़ा गया है। महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की बात भी सामने आई है। यदि इन व्यवस्थाओं की निगरानी लगातार और प्रभावी तरीके से होती है तो बस सेवा के संचालन में जवाबदेही बढ़ सकती है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि इतनी बड़ी व्यवस्था के लिए मजबूत कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम, प्रशिक्षित कर्मचारी और समय पर तकनीकी रखरखाव जरूरी होगा। 15 हजार बसों तक पहुंचने पर यह व्यवस्था और बड़ी हो जाएगी। उस समय हजारों बसों की लाइव मॉनिटरिंग, रूट प्रबंधन, ड्राइवर व्यवहार, ब्रेकडाउन, चार्जिंग, टिकटिंग और शिकायतों को एक साथ संभालना अपने आप में बड़ा प्रशासनिक और तकनीकी काम होगा।
मध्यप्रदेश की नई बस सेवा को केवल राज्य सरकार की योजना के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके साथ केंद्र की पीएम ई-बस सेवा भी जुड़ी है। केंद्र की आधिकारिक योजना के अनुसार पीएम ई बस सेवा का उद्देश्य पीपीपी मॉडल के जरिए देशभर में 10 हजार इलेक्ट्रिक बसों को तैनात करना है। योजना की अनुमानित लागत 57,613 करोड़ रुपये है और केंद्र सरकार की ओर से 20 हजार करोड़ रुपये का समर्थन प्रस्तावित है। योजना में केवल बसें शामिल नहीं हैं। डिपो इंफ्रास्ट्रक्चर, चार्जिंग से जुड़ी सुविधाएं, आईटीएमएस, यात्री सूचना प्रणाली, बस स्टॉप और लास्ट-माइल कनेक्टिविटी जैसी व्यवस्थाएं भी इसके हिस्से हैं। केंद्र सरकार के अनुसार इस योजना से 45 हजार से 55 हजार प्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने का अनुमान है। मध्यप्रदेश में पीएम ई-बस सेवा को मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के साथ जोडऩे से राज्य के सार्वजनिक परिवहन नेटवर्क में इलेक्ट्रिक बसों की भूमिका बढऩे की संभावना है। सरकार के सामने यहां दो समानांतर लक्ष्य हैं&एक तरफ ज्यादा से ज्यादा यात्रियों को सार्वजनिक परिवहन में लाना और दूसरी तरफ परिवहन क्षेत्र से होने वाले प्रदूषण तथा जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करना।
15 हजार बसों का लक्ष्य
2031 तक 15 हजार बसों का लक्ष्य अपने आप में बड़ा विस्तार है। सरकार के अनुसार पहले वर्ष में करीब 1500 बसों से शुरुआत की जाएगी और इसके बाद हर वर्ष बसों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की जाएगी। इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए केवल बसें खरीदना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए अलग-अलग जिलों में डिपो, वर्कशॉप, चार्जिंग स्टेशन, पार्किंग, ड्राइवर और तकनीकी कर्मचारियों की व्यवस्था करनी होगी। इलेक्ट्रिक बसों के मामले में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की क्षमता और बिजली आपूर्ति भी महत्वपूर्ण होगी। इसके अलावा रूट चयन भी महत्वपूर्ण होगा। ऐसी बसें उन मार्गों पर चलाना जरूरी है जहां यात्रियों की मांग हो, लेकिन साथ ही कम यात्री वाले ग्रामीण मार्गों को भी सामाजिक सेवा के नजरिए से बनाए रखना पड़ सकता है। यही वह संतुलन है जो सार्वजनिक परिवहन और केवल व्यावसायिक बस सेवा के बीच अंतर पैदा करता है। सरकार की योजना पीपीपी मॉडल को भी बढ़ावा देने की है। इससे संचालन में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ सकती है, लेकिन सार्वजनिक परिवहन की मूल भावना को बनाए रखने के लिए किराया, रूट और सेवा गुणवत्ता पर नियामकीय निगरानी जरूरी होगी। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कार्यक्रम में कहा कि उनका लक्ष्य ऐसी बस व्यवस्था विकसित करना है जिसमें गरीब वर्गों को बेहतर सुविधा मिले और ्रष्ट बसों में भी उन्हें किफायती यात्रा उपलब्ध हो। उन्होंने डीजल बसों की तुलना में किराया करीब 30 प्रतिशत कम रखने की इच्छा जताई। यात्रियों के लिए यही इस योजना का सबसे प्रत्यक्ष परिणाम होगा। यदि आधुनिक बस, बेहतर सुरक्षा और डिजिटल सुविधा के साथ किराया निजी डीजल बसों से कम या प्रतिस्पर्धी रहता है तो सार्वजनिक परिवहन की मांग बढ़ सकती है। लेकिन किराया कम रखने के साथ संचालन की आर्थिक व्यवहार्यता भी जरूरी होगी। इलेक्ट्रिक बसों में ईंधन खर्च कम हो सकता है, लेकिन शुरुआती पूंजी लागत, बैटरी, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और रखरखाव की अपनी लागत होती है। इसलिए किराया निर्धारण, सरकारी सहायता और संचालन मॉडल इस सेवा की दीर्घकालिक स्थिरता तय करेंगे।
भोपाल कार्यक्रम में नितिन गडकरी ने सार्वजनिक परिवहन को वैकल्पिक ईंधन की व्यापक नीति से भी जोड़ा। उन्होंने इथेनॉल, बिजली और हाइड्रोजन जैसे विकल्पों को बढ़ावा देने की जरूरत पर जोर दिया। हालिया सार्वजनिक बयानों में गडकरी ने 100 प्रतिशत इथेनॉल पर चलने वाले फ्लेक्स-फ्यूल इंजनों और हाइड्रोजन वाहनों के विकास की बात भी दोहराई है। उनका तर्क है कि वैकल्पिक ईंधन के बढ़ते उपयोग से पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाने के साथ किसानों के लिए नई आय के अवसर पैदा हो सकते हैं। गडकरी ने इथेनॉल उत्पादन को कृषि और ऊर्जा नीति से जोड़ते हुए किसानों को केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि ऊर्जा उत्पादक के रूप में देखने की बात कही। मध्यप्रदेश के लिए यह मॉडल खास महत्व रखता है क्योंकि राज्य में कृषि उत्पादन और जैव ईंधन दोनों की संभावनाएं हैं। यदि इथेनॉल आधारित परिवहन बड़े पैमाने पर विकसित होता है तो इसके लिए उत्पादन, भंडारण, वितरण और वाहन तकनीक का समानांतर नेटवर्क तैयार करना होगा। गडकरी ने हाइड्रोजन आधारित परिवहन का भी उल्लेख किया और हाइड्रोजन बसों को कुछ रूटों पर चलाने की बात कही। इससे संकेत मिलता है कि सार्वजनिक परिवहन का भविष्य केवल डीजल से इलेक्ट्रिक बसों तक सीमित नहीं रहने वाला। आने वाले वर्षों में अलग-अलग रूट और उपयोग के हिसाब से इलेक्ट्रिक, इथेनॉल, हाइड्रोजन और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा आधारित वाहन सामने आ सकते हैं। हालांकि इन सभी तकनीकों के लिए लागत, ईंधन उपलब्धता, इंफ्रास्ट्रक्चर और वास्तविक संचालन प्रदर्शन अलग-अलग होंगे। इसलिए मध्यप्रदेश के सामने चुनौती एक ही तकनीक चुनने की नहीं, बल्कि जरूरत के हिसाब से उपयुक्त तकनीक का मिश्रण तैयार करने की होगी।
ड्राइवरों की कमी भी बड़ी चुनौती
बसों की संख्या बढ़ाने के साथ ड्राइवरों की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती है। कार्यक्रम में देश और प्रदेश में प्रशिक्षित ड्राइवरों की कमी का मुद्दा उठाया गया। मध्यप्रदेश में ड्राइविंग ट्रेनिंग सेंटरों की संख्या बढ़ाने और स्किलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर जोर दिया गया है। यदि 2031 तक 15 हजार बसें संचालित करनी हैं तो हजारों प्रशिक्षित ड्राइवरों की जरूरत होगी। इसके साथ मैकेनिक, इलेक्ट्रिकल इंजीनियर, ईवी तकनीशियन, चार्जिंग स्टेशन ऑपरेटर, कंट्रोल रूम कर्मचारी और टिकटिंग-आईटी स्टाफ की भी आवश्यकता होगी। इस दृष्टि से बस सेवा केवल परिवहन परियोजना नहीं बल्कि रोजगार सृजन का माध्यम भी बन सकती है। केंद्र की पीएम ई बस सेवा योजना भी 10 हजार ई-बसों के संचालन से 45 हजार से 55 हजार प्रत्यक्ष रोजगार की संभावना बताती है।
गडकरी ने मध्यप्रदेश में ड्राइविंग ट्रेनिंग सेंटरों और वाहन स्क्रैपिंग सेंटरों के विस्तार की जरूरत पर भी जोर दिया। यह परिवहन व्यवस्था के दूसरे हिस्से से जुड़ा मुद्दा है। एक तरफ नई बसें और इलेक्ट्रिक वाहन सडक़ों पर आएंगे, दूसरी तरफ पुराने और प्रदूषणकारी वाहनों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की जरूरत होगी। इसके लिए स्क्रैपिंग और टेस्टिंग सेंटरों का नेटवर्क जरूरी है। यदि यह व्यवस्था जिलों तक पहुंचती है तो पुराने वाहनों को सडक़ से हटाने, फिटनेस जांच को मजबूत करने और नए वाहनों के लिए सुरक्षित परिवहन वातावरण तैयार करने में मदद मिल सकती है।
गांवों के लिए सबसे बड़ा फायदा
मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा की सबसे बड़ी परीक्षा ग्रामीण मध्यप्रदेश में होगी। शहरों में पहले से ऑटो, टैक्सी, निजी बस और अन्य साधन उपलब्ध हैं। लेकिन दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में नियमित सार्वजनिक परिवहन की कमी ज्यादा महसूस होती है। किसी गांव के छात्र के लिए बस का मतलब कॉलेज तक पहुंच हो सकता है। किसी किसान के लिए मंडी तक जाना आसान हो सकता है। किसी मरीज के लिए जिला अस्पताल तक पहुंच संभव हो सकती है। किसी महिला के लिए रोजगार या शिक्षा के अवसर बढ़ सकते हैं। इसीलिए 75 प्रतिशत ग्राम पंचायतों तक सेवा पहुंचाने का लक्ष्य केवल परिवहन का आंकड़ा नहीं है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक गतिशीलता से जुड़ा लक्ष्य भी है। बस सेवा के विस्तार में सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि घोषित रूट पर बस कितनी नियमित चलती है। ग्रामीण परिवहन में यात्रियों को अक्सर सबसे बड़ी समस्या समय की होती है। बस कभी आती है, कभी नहीं आती-तो यात्री वैकल्पिक साधन चुनने लगता है। नई व्यवस्था में आईटीएमएस, जीपीएस और कमांड सेंटर का उपयोग इसी समस्या को कम करने में मदद कर सकता है। बस की लाइव लोकेशन उपलब्ध होने पर यात्री को उसके आने का अनुमान मिल सकेगा। शिकायत प्रणाली के जरिए खराब सेवा की जानकारी भी दर्ज की जा सकेगी। लेकिन तकनीक तभी प्रभावी होगी जब उसके आधार पर वास्तविक कार्रवाई भी हो। किसी बस के लगातार देर से चलने, रूट छोडऩे या बार-बार खराब होने की स्थिति में डेटा के आधार पर कार्रवाई करनी होगी।
नई बस सेवा को आधुनिक बनाने के लिए डिजिटल टिकटिंग, यात्री सूचना प्रणाली और शिकायत निवारण की व्यवस्था की जा रही है। इसका उद्देश्य यात्रियों को बस, रूट और समय की जानकारी आसानी से उपलब्ध कराना है। आने वाले समय में यात्रियों के लिए यह भी महत्वपूर्ण होगा कि टिकट ऑनलाइन मिल सके, बस का रूट मोबाइल पर देखा जा सके और शिकायत दर्ज करने के बाद उसका समाधान कब हुआ, यह भी पता चले। सार्वजनिक परिवहन की विश्वसनीयता केवल बस की सीट या ्रष्ट से तय नहीं होगी। समय की पाबंदी, साफ-सफाई, चालक का व्यवहार, किराया, सुरक्षा और शिकायत का समाधान-ये सभी मिलकर सेवा की गुणवत्ता तय करेंगे। नई बस सेवा में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई है। सीसीटीवी और पैनिक बटन जैसी सुविधाएं इस दिशा में उपयोगी हो सकती हैं। इसके साथ बसों को बुजुर्गों और दिव्यांग यात्रियों के लिए अधिक सुलभ बनाने की जरूरत होगी। बस में चढऩे-उतरने की सुविधा, बस स्टॉप की डिजाइन, सीट व्यवस्था और स्टाफ का व्यवहार इस वर्ग के लिए महत्वपूर्ण होंगे। यदि सार्वजनिक परिवहन को वास्तव में बड़े पैमाने पर लोकप्रिय बनाना है तो इसे केवल सामान्य यात्रियों की सुविधा के आधार पर नहीं, बल्कि बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों, दिव्यांगों और ग्रामीण यात्रियों की जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन करना होगा।
55 जिलों और 3000 से अधिक रूटों का सर्वे
सरकार ने प्रदेश में व्यापक बस नेटवर्क तैयार करने के लिए रूटों का सर्वे कराने की बात कही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार 55 जिलों में 3000 से अधिक रूटों का सर्वे कराया गया है। इसका उद्देश्य मांग के अनुसार बस नेटवर्क तैयार करना है। रूट सर्वे की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसमें केवल वर्तमान यात्री संख्या देखी जाती है या भविष्य की जरूरतों को भी शामिल किया जाता है। नए औद्योगिक क्षेत्र, मेडिकल कॉलेज, विश्वविद्यालय, पर्यटन स्थल, मंडियां और तेजी से बढ़ते कस्बे आने वाले वर्षों में नए यात्री केंद्र बन सकते हैं। इसलिए 2031 तक 15 हजार बसों की योजना के लिए रूट नेटवर्क को भी गतिशील रखना होगा। नई सरकारी बस सेवा का असर निजी बस ऑपरेटरों पर भी पड़ेगा। राज्य सरकार ने योजना बनाते समय बस मालिकों के हितों को ध्यान में रखने की बात कही है। यह संतुलन महत्वपूर्ण है क्योंकि मध्यप्रदेश में लंबे समय से निजी बसें सार्वजनिक परिवहन का बड़ा हिस्सा संभालती रही हैं। सरकारी सेवा यदि उन्हीं रूटों पर बिना समन्वय के उतरती है तो प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। दूसरी ओर निजी ऑपरेटरों के पास कई ऐसे ग्रामीण और अंतरशहरी मार्गों का अनुभव है जहां वे लंबे समय से संचालन कर रहे हैं। इसलिए पीपीपी मॉडल और निजी भागीदारी के जरिए दोनों व्यवस्थाओं के बीच तालमेल बनाने की कोशिश की जा सकती है।
बसों की संख्या बढऩे का असर केवल ड्राइवरों तक सीमित नहीं रहेगा। बस संचालन के साथ वर्कशॉप, चार्जिंग स्टेशन, बैटरी रखरखाव, आईटी सिस्टम, टिकटिंग, सुरक्षा, सफाई, स्पेयर पाट्र्स और प्रशिक्षण से जुड़े रोजगार पैदा होंगे। इलेक्ट्रिक बसों के विस्तार से ईवी तकनीशियनों की मांग बढ़ेगी। चार्जिंग स्टेशन के लिए इलेक्ट्रिकल विशेषज्ञों की जरूरत होगी। कमांड सेंटरों में आईटी और डेटा ऑपरेटरों की जरूरत होगी। इस प्रकार सार्वजनिक परिवहन का विस्तार ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी उद्योग के लिए भी बाजार तैयार कर सकता है। पीएम ई बस सेवा के आधिकारिक पोर्टल के अनुसार योजना का लक्ष्य 10 हजार ई-बसों को पीपीपी मॉडल पर तैनात करना है। सितंबर 2026 के उपलब्ध डैशबोर्ड में 10 हजार बसों के लक्ष्य के मुकाबले बड़ी संख्या में बसों की स्वीकृति और विभिन्न शहरों में संचालन की प्रगति दर्ज है। योजना में 3 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों को प्रमुख कवरेज क्षेत्र बनाया गया है। इसका मतलब है कि मध्यप्रदेश की ई-बस पहल देश की बड़ी सार्वजनिक परिवहन नीति का हिस्सा है। राज्य की चुनौती यह होगी कि केंद्रीय योजना से मिलने वाले संसाधनों को अपने व्यापक ग्रामीण-शहरी बस नेटवर्क से कैसे जोड़ा जाए।
सिर्फ संख्या नहीं, भरोसा
मध्यप्रदेश में 21 साल बाद बस सेवा की वापसी ने सार्वजनिक परिवहन को फिर राजनीतिक और प्रशासनिक एजेंडे के केंद्र में ला दिया है। लेकिन 351 बसों से शुरू हुआ यह सफर तभी सफल माना जाएगा जब इसका विस्तार नियमित और विश्वसनीय सेवा में बदले। सरकार ने 1500 बसों के पहले साल के लक्ष्य से लेकर 2031 तक 15 हजार बसों तक पहुंचने की योजना रखी है। 75 प्रतिशत ग्राम पंचायतों को जोडऩे का लक्ष्य भी सामने है। इन लक्ष्यों के साथ कई सवाल भी हैं-क्या पर्याप्त ड्राइवर और तकनीकी स्टाफ उपलब्ध होंगे? क्या चार्जिंग नेटवर्क समय के साथ तैयार होगा? क्या ग्रामीण रूट आर्थिक रूप से टिकाऊ रहेंगे? क्या किराया वास्तव में निजी डीजल बसों की तुलना में कम रखा जा सकेगा? क्या जीपीएस और कमांड सेंटर से बसों की समयबद्धता सुधरेगी? और क्या शिकायतों का समाधान तय समय में होगा? इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में सामने आएंगे। सरकार की मौजूदा योजना को देखें तो लक्ष्य केवल 15 हजार बसें चलाने का नहीं है। इसके साथ इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, वैकल्पिक ईंधन, ड्राइवर ट्रेनिंग, स्क्रैपिंग सेंटर, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल टिकटिंग और कमांड-कंट्रोल सिस्टम को जोडऩे की कोशिश है। यदि यह नेटवर्क निर्धारित लक्ष्य के मुताबिक विकसित होता है तो मध्यप्रदेश में सार्वजनिक परिवहन का स्वरूप बदल सकता है। शहरों के बीच यात्रा के साथ गांवों को जिला मुख्यालयों और बड़े शहरों से जोडऩे का नेटवर्क तैयार हो सकता है। इलेक्ट्रिक बसें शहरी परिवहन को कम प्रदूषण वाला विकल्प दे सकती हैं, जबकि इथेनॉल और दूसरे वैकल्पिक ईंधन कृषि तथा ऊर्जा अर्थव्यवस्था से जुड़ सकते हैं। हाइड्रोजन जैसी तकनीक आगे लंबी दूरी के परिवहन में नई संभावनाएं खोल सकती है। लेकिन इस पूरे मॉडल की सफलता अंतत: एक ही कसौटी पर तय होगी-यात्री को बस कितनी आसानी, कितनी सुरक्षा, कितने समय पर और कितने किराये में मिलती है।
21 साल बाद बस सेवा की वापसी इसलिए बड़ी खबर है कि इससे सरकार को सार्वजनिक परिवहन को नए सिरे से खड़ा करने का अवसर मिला है। अब 351 बसों से शुरू हुई यह कहानी 1500, फिर हजारों और अंतत: 15 हजार बसों तक पहुंचती है या नहीं, यह केवल घोषणाओं से नहीं बल्कि संचालन, निवेश, रूट प्रबंधन और यात्रियों के भरोसे से तय होगा। फिलहाल मध्यप्रदेश की सडक़ों पर सरकारी बस सेवा की वापसी हो चुकी है। अगली चुनौती इसे ऐसा नेटवर्क बनाने की है जिसमें बस केवल शहर पहुंचने का साधन न हो, बल्कि गांव से रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बाजार और अवसर तक पहुंचने का भरोसेमंद माध्यम बने। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि नक्सलवाद से मुक्त हुए बालाघाट जिले को नई सौगात मिलने जा रही है। हमारी सरकार ने प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था और शांति के लिए चुनौती बने सभी संकटों को समाप्त किया है। प्रदेश की साढ़े 8 करोड़ जनता की आशा और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सभी मंत्री संकल्प के साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा और पीएम ई-बस सेवा के जरिए सार्वजनिक परिवहन के एक आधुनिक और यूनिक मॉडल की शुरुआत हो रही है। बसों में यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा के लिए सीसीटीवी, पैनिक बटन, इमरजेंसी डोर, जीपीएस मॉनिटरिंग, ऑनलाइन टिकटिंग, शिकायतों के समाधान सहित कई प्रकार से मॉनिटरिंग की व्यवस्था की गई है। बस ड्राइवरों की ट्रेनिंग और सुरक्षा के प्रबंधन भी किए गए हैं। प्रदेश की जनता की सुविधा के लिए प्रदेश के सभी 55 जिलों में 3000 से अधिक रूट्स का सर्वे कराया गया। साल 2029 तक सभी रूटों पर भगवा रंग की बसें दौड़ती नजर आएंगी, जो प्रमुख शहरों के साथ देश के प्रमुख तीर्थस्थलों और महानगरों तक आवागमन को सुगम बनाएंगी।
