प्रेम: सिर्फ उत्सव नहीं, एक नैतिक जिम्मेदारी भी

  • वेलेंटाइन वीक के बीच वास्तविकता से संवाद
  • प्रवीण कक्कड़
प्रेम

आज का दौर तकनीक, गति और सूचनाओं का दौर है, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे एक कड़वा सच यह भी है कि यह ‘बाज़ारवाद’ द्वारा संचालित सोच का युग है। बाज़ार आज केवल उत्पाद नहीं बेच रहा, वह हमारी संवेदनाएँ, हमारी पसंद और यहाँ तक कि हमारे प्रेम करने के तरीकों को भी नियंत्रित करने लगा है। इन दिनों वेलेंटाइन वीक की बयार है रोज़ डे के गुलाबों से लेकर चॉकलेट डे और टेडी डे के उपहारों तक, हर दिन के साथ एक नया उत्पाद और एक नया मनोवैज्ञानिक दबाव युवा मस्तिष्क पर बनाया जा रहा है। सच्चाई यह है कि इस उत्सव की चकाचौंध के समानांतर एक डरावनी हकीकत भी है। प्रेम के नाम पर बिछाए जा रहे छलावे के कारण रोज़ाना युवाओं के भावनात्मक शोषण और ब्लैकमेलिंग की घटनाएँ सामने आ रही हैं। जो प्रेम जीवन का संबल होना चाहिए था, वही आज युवाओं को नशे और अपराध के दलदल में धकेल रहा है। यही कारण है कि आज का युवा जागरूक होने की बजाय अक्सर आकर्षण और तात्कालिक सुख के कुहासे में भटकता नजऱ आता है। वर्तमान में हम ‘वेलेंटाइन वीक’ के मध्य में हैं, जहाँ हर दिन के साथ एक नया उत्पाद और एक नया मनोवैज्ञानिक दबाव युवा मस्तिष्क पर बनाया जा रहा है। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि ये दिन मनाए जाने चाहिए या नहीं; प्रश्न यह है कि क्या प्रेम जैसे महान और व्यापक शब्द को हम केवल उपहारों और बाज़ारीकरण की संकीर्ण मानसिकता तक सीमित कर देंगे? हमें अपनी सोच का दायरा बड़ा करना होगा और प्रेम को इन सीमाओं से बाहर निकालकर व्यवहारिक जीवन के धरातल पर लाना होगा। यह केवल एक व्यक्ति की क्षति नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि यदि प्रेम हमें पतन की ओर ले जा रहा है, तो वह प्रेम हो ही नहीं सकता।
आकर्षण का छलावा
इस बाज़ारवादी चकाचौंध के बीच सबसे बड़ा संकट उन युवाओं पर है जो अभी मानसिक रूप से पूरी तरह परिपक्व नहीं हुए हैं। किशोरावस्था और शुरुआती युवावस्था में भावनाओं का उफान इतना तीव्र होता है कि प्रेम और क्षणिक आकर्षण के बीच का अंतर धुंधला पड़ जाता है। आज ‘दिखावे’ की संस्कृति ने युवाओं को एक ऐसी अंधी दौड़ में धकेल दिया है, जहाँ वे दूसरों को प्रभावित करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखते हैं। जब प्रेम का आधार ‘समझ’ के बजाय ‘दिखावा’ बन जाता है, तभी भटकाव की शुरुआत होती है। युवा अक्सर यह तय नहीं कर पा रहे कि वे वास्तव में किसी के प्रति समर्पित हैं या केवल एक बाज़ारी ट्रेंड का हिस्सा बनकर अपनी ऊर्जा नष्ट कर रहे हैं।
भटकाव के भयावह परिणाम
वर्तमान परिस्थितियाँ गंभीर और चिंताजनक हैं। रोज़ाना समाचार पत्रों में ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं, जहाँ प्रेम के नाम पर युवाओं को जाल में फँसाया जा रहा है। मानसिक अपरिपक्वता के कारण कई युवा सोशल मीडिया और आभासी दुनिया के छलावे को सच मान बैठते हैं, जिसके परिणामस्वरूप वे ब्लैकमेलिंग, भावनात्मक शोषण और मानसिक उत्पीडऩ का शिकार हो रहे हैं। इतना ही नहीं, प्रेम में असफलता या गलत संगत के प्रभाव में कई युवा नशे की लत की ओर भी धकेले जा रहे हैं। जिसे वे प्रेम का ‘सहारा’ समझते हैं, वही कई बार उनके भविष्य की बर्बादी का कारण बन जाता है। यह केवल एक व्यक्ति की क्षति नहीं है, बल्कि समाज और राष्ट्र के भविष्य के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि यदि प्रेम हमें अपराध, अवसाद या नशे की ओर ले जा रहा है, तो वह प्रेम हो ही नहीं सकता।
बाज़ारवाद की वैचारिक दासता
बाज़ार का अपना तर्क है वह भावनाओं को अवसर में बदलता है। इसमें अपने आप में कोई बुराई नहीं है, लेकिन बुराई तब शुरू होती है जब हम प्रेम को उसकी ‘कीमत’ से आँकने लगते हैं। जब एक महँगा उपहार प्रेम की गहराई का पैमाना बन जाता है, तब संवेदनाओं का पतन शुरू होता है। युवाओं को आत्मचिंतन करना होगा कि क्या उनका प्रेम स्वतंत्र है, या वे केवल उस भीड़ का हिस्सा बनते जा रहे हैं जिसे विज्ञापन और सोशल मीडिया एल्गोरिदम दिशा दे रहे हैं। प्रेम को केवल एक विशेष दिन या सप्ताह तक सीमित कर देना उसकी गरिमा को छोटा करना है। वास्तविक प्रेम व्यवहार में निरंतरता और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की मांग करता है, न कि केवल विशेष अवसरों पर प्रदर्शन की।
प्रेम की वास्तविक सार्थकता
सच्चा प्रेम वह है जो आपको आपके लक्ष्य के और करीब ले जाए, न कि वह जो आपको आपकी पढ़ाई, करियर या परिवार से विमुख कर दे। यदि कोई रिश्ता आपके आत्मसम्मान को चोट पहुँचा रहा है या आपके मानसिक संतुलन को बिगाड़ रहा है, तो वह प्रेम नहीं, बल्कि एक मोह है। प्रेम केवल आई लव यू कह देने की औपचारिकता नहीं है; प्रेम का वास्तविक अर्थ है मैं तुम्हारे प्रति और तुम्हारी गरिमा के प्रति उत्तरदायी हूँ। इस पूरे परिदृश्य में समाज और परिवार की भूमिका केवल ‘पहरेदार’ की नहीं, बल्कि ‘मार्गदर्शक’ की होनी चाहिए। जब घर में संवाद की कमी होती है, तो बच्चा बाहर के आकर्षण और भ्रम में जल्दी फँसता है। हमें उन्हें डिजिटल सुरक्षा और भावनात्मक मजबूती के संस्कार देने होंगे।
उत्सव से संस्कार तक
प्रेम से भागना समाधान नहीं है और प्रेम के नाम पर भटक जाना भी नहीं। आवश्यकता है सोच के विस्तार, समझ की गहराई और भावनाओं की जिम्मेदारी की। प्रेम को उत्सव से आगे बढक़र एक संस्कार और नैतिक उत्तरदायित्व के रूप में स्वीकार करना होगा। जब प्रेम संवेदना बन जाए, सम्मान बन जाए और जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम बन जाए, तभी वह सच्चा प्रेम कहलाता है। युवाओं को यही समझना है और समाज को यह साहस के साथ सिखाना है। प्रेम अंतत: बंधन नहीं, बल्कि मुक्ति और संबल का मार्ग होना चाहिए।
(लेखक पूर्व पुलिस अधिकारी हैं)

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