7 महीने से फाइलों में केन-मंदाकिनी रिवर लिंक परियोजना

  • परियोजना में हो रही देरी को देखते हुए मप्र के जल संसाधन विभाग ने बढ़ाई सक्रियता

गौरव चौहान
 केन-मंदाकिनी रिवर लिंक परियोजना, जो मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच एक महत्वाकांक्षी जल परियोजना है, वर्तमान में पिछले सात महीने से फाइलों में अटकी हुई है। उत्तर प्रदेश द्वारा पानी की आवश्यकता का सटीक डेटा न साझा करने के कारण अंतिम विस्तृत परियोजना रिपोर्ट नहीं बन पा रही है, जिससे परियोजना के कार्य में देरी हो रही है। हालंकि परियोजना में हो रही देरी को देखते हुए मप्र के जल संसाधन विभाग ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस नदी के पुनरुद्धार से पर्यटन बढ़ेगा और स्थानीय रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। वहीं पन्ना से सतना तक प्रस्तावित 110 किमी लंबी नहर से मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश की 82,000 हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी। साथ ही, दौरी सागर बांध पर 25 मेगावाट का जल विद्युत संयंत्र भी प्रस्तावित है।
केन-मंदाकिनी रिवर लिंक परियोजना का उद्देश्य बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की कमी को दूर करना और चित्रकूट की मंदाकिनी नदी को सदानीरा बनाना है। योजना के तहत केन नदी से 250  मिलियन क्यूबिक मीटर पानी मंदाकिनी नदी में स्थानांतरित किया जाएगा। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों राज्य 125 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी का योगदान देंगे। लेकिन दक्षिणी बुंदेलखंड के लिए जीवनदायिनी मानी जा रही केन-मंदाकिनी रिवर लिंक परियोजना का भविष्य पिछले सात माह से फाइलों में अटका हुआ है। वजह उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पानी की डिमांड का डेटा साझा नहीं किया जाना है। इंटर स्टेट रिवर प्रोजेक्ट होने के कारण जब तक पड़ोसी राज्य अपनी पानी की डिमांड नहीं बताता, तब तक इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की फाइनल डिटेल परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) नहीं बनाई जा सकती है।
यूपी नहीं दे रहा डाटा
जानकारी के अनुसार, परियोजना में हो रही देरी को देखते हुए मप्र के जल संसाधन विभाग ने सक्रियता दिखाई है। मप्र के अतिरिक्त मुख्य सचिव राजेश राजौरा ने उत्तर प्रदेश के अपने समकक्ष अधिकारी अनिल गर्ग (प्रमुख सचिव सिंचाई व जल संसाधन विभाग) को एक औपचारिक पत्र लिखकर आग्रह किया है कि यूपी अपनी पानी की जरूरतों का सटीक डेटा जल्द साझा करे, ताकि प्रोजेक्ट तैयार कर केंद्र सरकार को भेजा जा सके। इस पत्र में राज्य सरकार की ओर से स्पष्ट अपील की गई है जल्द से जल्द दोनों राज्यों के बीच ईएनसी स्तर पर एक बैठक कर दोनों राज्यों को पानी की जरूरत के आंकड़े साझा किए जाएं। इससे पहले 21 जनवरी को मप्र के जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट भी उप्र के सिंचाई व जल संसाधन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह को इस संबंध में पत्र लिखकर यही आग्रह कर चुके हैं, लेकिन दो माह बीत जाने के बावजूद उप्र की ओर से कोई जवाब नहीं आया है। सिलावट द्वारा लिखे पत्र में भी स्पष्ट किया गया था कि उत्तर प्रदेश की औपचारिक सहमति और पानी की डिमांड के डेटा के बिना केंद्र सरकार को अंतिम डीपीआर नहीं भेजी जा सकती।
प्रोजेक्ट मील का पत्थर साबित होगा
परियोजना का धार्मिक और आर्थिक महत्व चित्रकूट की जीवनधारा मंदाकिनी नदी को वर्षभर अविरल और निर्मल रखने के लिए यह लिंक प्रोजेक्ट मील का पत्थर साबित होगा। मप्र इस प्रोजेक्ट पर अपनी ओर से जन अभियान परिषद, बाल्मी, आईआईटी रुडक़ी और जेएनयू के विशेषज्ञों के साथ पिछले साल चित्रकूट में एक कार्यशाला भी आयोजित कर चुका है, जिसमें विशेषज्ञों ने इस प्रोजेक्ट को चित्रकूट और मंदाकिनी के पुनर्जीवन के लिए अच्छा माना है। परियोजना के तकनीकी पहलुओं के अनुसार, केन नदी से 250 मिलियन घन मीटर (एमसीएम) पानी को मंदाकिनी नदी में मोडऩे का प्रस्ताव है। गफलत इस बात को लेकर है कि क्या यह पानी केन-बेतवा समझौते के तहत उप्र को मिलने वाले 1,700 एमसीएम हिस्से में से काटा जाएगा या इसे एक नई और स्वतंत्र परियोजना के तहत अतिरिक्त आवंटन माना जाएगा। मप्र सरकार का तर्क है कि यह मंदाकिनी को पुनर्जीवित करने की योजना है, इसके लिए दोनों राज्य केन-बेतवा से अपने-अपने हिस्से का 125-125 एमसीएम को मंदाकिनी में डायवर्ट करने की सहमति दें और अपने-अपने हिस्से में इसका अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल कर लें। मप्र का यह भी तर्क है कि यह एक अलग पहल है और इसके लाभ (विशेषकर चित्रकूट में) को उप्र के नियमित कोटे से नहीं घटाया जाना चाहिए।

Related Articles