कोरे प्लान की बजाए अब जमीनी स्तर पर होंगे काम

कोरे प्लान

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मप्र की जीवन रेखा के संरक्षण के लिए सरकार निरंतर प्रयास कर रही है, लेकिन वे उतने प्रभावी नहीं हुए हैं। ऐसे में हाल में सुशासन भवन में हुई नर्मदा समग्र की बैठक में संघ के वरिष्ठ सदस्यों ने इस पर गंभीर चिंता व्यक्त की है और सत्ता व संगठन से अपेक्षा की है कि कोरे प्लान की बजाए जमीनी स्तर पर काम हो, जो काम पूर्व से किए जा रहे हैं उनकी निगरानी प्रभावी हो। दरअसल,  नर्मदा संरक्षण के कई दावे होते रहे हैं। पुराने समय में लगाए 6 करोड़ पौधे भी नहीं बचे। नदी कई गंभीर संकटों से जूझ रही है। इसमें जल प्रदूषण, गर्मी के दिनों में गिरता जल प्रवाह और अवैध खनन प्रमुख है।  बताया जाता है कि अब नर्मदा के संरक्षण की जंबो कार्ययोजना बनाने की तैयारी है। जिसमें दोनों किनारों पर पौधे लगाना प्रमुख है लेकिन ऐसा करने से पहले उनकी सुरक्षा के लिए जवाबदारी तय होगी। सुरक्षा का जिम्मा संबंधित क्षेत्र के किसानों, संबंधित ग्राम पंचायतों व स्थानीय निकायों में से किसी एक को या जहां जैसी जरूरत हो, उन्हें दिया जा सकता है। सामाजिक संगठनों को भी इसमें शामिल करने पर विचार चल रहा है। इसके अलावा सरकार नर्मदा के संरक्षण पर अलग से नीति बना सकती है। नर्मदा संरक्षण के लिए बड़ी राशि की जरूरत है। सूत्रों के मुताबिक नर्मदा समग्र की बैठक में यह मुद्दा उठा। पंचायत एवं ग्रामीण विकास और नगरीय विकास एवं आवास विभाग के मंत्रियों से अपेक्षा की गई कि बजट का इंतजाम करें और अटकी सभी कामों को शीघ्रता से आगे बढ़ाएं। अंतत: बजट कहां से आएगा, यह तय नहीं हुआ। इस बैठक में सीएम डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में बैठक हुई। मंत्री प्रहलाद पटेल व कैलाश विजयवर्गीय मौजूद रहे। इन मंत्रियों के विभागों के पास नर्मदा को निर्मल व अविरल बनाने से जुड़े कई काम है। सूत्रों के मुताबिक संघ के वरिष्ठ सदस्य सुरेश सोनी भी बैठक में शामिल रहे। उन्होंने सं संरक्षण से जुड़े कई विषयों पर बात रखी। जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष मोहन नागर ने प्रयासों की जानकारी दी। अगली बैठक 6 महीने बाद फिर होगी।
पौधों की परवरिश करने की जिम्मेदारी निजी लोगों को
बीते वर्षों में नदी के किनारों और 4 से 5 किमी के दायरे में करोड़ों पौधे लगाए जा चुके हैं। ये पेड़ बन पाते, उसके पहले बर्बाद हो गए। इन्हें गर्मी में पानी नहीं मिला, सुरक्षा के बंदोबस्त नहीं थे, जिसके चलते उजड़ गए। तत्कालीन सरकारों ने विभागों व अफसरों की जिम्मेदारी भी तय नहीं की लेकिन जनता का पैसा बर्बाद हो गया। नदी तंत्र को सहयोग भी नहीं मिला। असल में बीते कई वर्षों से नर्मदा के संरक्षण के नाम पर हजारों करोड़ रुपए खर्च किए चुके हैं। तब भी नदी कई किलोमीटर तक कटाव से जूझ रही है। पाट चौड़े हो रहे हैं। नदी तंत्र के प्राकृतिक स्वरूपों में बदलाव देखने को मिले हैं, जो गंभीर खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं। नए प्लान में कई विषयों पर गहन चर्चा हुई। जिनमें कुछ क्षेत्रों में पौधे लगाने व 5 साल तक उनकी परवरिश करने की जिम्मेदारी निजी लोगों को दी जा सकती है, उन्हें खर्च का भुगतान किया जा सकता है। 

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