मैं हूँ नया साल

  • शीला मिश्रा

मैं हूँ नया साल… प्रत्येक वर्ष की भाँति वही बारह महीने का और प्रत्येक महीने में तीस दिन का, तीस दिन में चौबीस घंटे  का ,वही ठंड , बारिश, गर्मी के मौसम का, वही सुबह, दोपहर, शाम व रात्रि का । मैं तो हर वर्ष ऐसे ही आता हूँ बस जरा सा कलेवर बदल जाता है, इस वर्ष 25 की जगह 26 लिखा जायेगा। मेरी उम्र एक वर्ष बढ़ जाती है लेकिन मैं सदा एक-सा बना रहता हूँ परन्तु तुम सब ….., कितने बदल जाते हो….अब तो तेजी से बदल रहे हो।  मैं यह देखकर बहुत दुखी हो जाता हूँ।  कितनी आशाएंँ, कितनी उम्मीदें मुझसे बाँध लेते हो और फरमाइशों की तो लंबी चौड़ी सूची ही भेज देते हो किन्तु कभी अपने अंदर भी तो झांको ….! क्या तुम पहले से हो …., नहीं न…,इतने झगड़ालू, इतने ईष्र्यालु, इतने लोभी, इतने लालची, इतने स्वार्थी, इतने क्रोधी, इतने हिंसक… ओहो…….,कितनी लंबी चौड़ी लिस्ट होती जा रही है। बहुत वेदना के साथ कह रहा हूँ कि अब तुम पहले से नहीं रहे हो …,और यही तुम्हारे दुख का कारण है। मैं तो पहले भी ऐसा ही था , थोड़े दुख और ज्यादा खुशियांँ देने वाला और तुम दोनों हाथ फैलाकर खुशी ग्रहण करते थे और थोड़े से  दुख को झेल जाते थे पर अब उसकी खुशी मेरी खुशी से ज्यादा क्यों …? इसमें उलझकर रह जाते हो और अपना दुख दुगुना कर लेते हो। इसलिए अपनी खुशी में भी खुश नहीं रह पाते हो। जब तुम लोग कहते हो, ओ नये साल! तुम सारे दुख ले जाना और खुशियाँ दे जाना ,तो एक बात बताओ! बिना नमकीन खाए मीठा खाने में मजा आता है क्या? नहीं न…. तो दुख को धैर्यपूर्वक सहन करो तभी खुशी का आनंद ले पाओगे।  जैसे रात के बाद मैं सुबह का आनंद लेता हूँ , वैसे ही तुम भी अंधेरे को भूलकर उजालों में प्रसन्न हो जाओ।  हाँ एक बात और … ज्यादा स्वार्थी मत बनो,अपने सुखों के लिए प्रकृति का दोहन मत करो। प्रकृति तो माँ है, उसके सीने को छलनी करोगे तो वह तो आँसू बहायेगी ही चाहे जिस रुप में …बाढ़ आये, भूस्खलन हो, भूकंप आये या बादल फट जाये। उसके रुदन और चीत्कार का सामना तो तुम्हें ही करना होगा। एक सलाह और….,स्वार्थी बनने की बजाय मिलजुलकर रहो, द्वेष, ईष्र्या,क्रोध में मरने-मारने पर उतारु मत हो जाओ। ये क्षणिक आवेग हिंसा को जन्म देता है और हिंसा में रक्त का क्षरण होता है फिर वह रक्त अपने रक्त संबंधियों का हो या दूसरों के शरीर के रक्त का और धरती माँ यह देखकर रोती है,जिसे देख मेरा मन बहुत आहत होता है। मैं तो केवल खुशियाँ देने आता हूँ। कैलेण्डर खोलकर देख लो… , प्रत्येक माह में खुशियों की सौगात …। भिन्न-भिन्न त्योहारों  से तुम्हारे घर-आँगन को हर्षाने आता हूँ ताकि ढोलक की थाप पर तुम सब नाचो-गाओ और मैं आल्हादित हो जाऊँ परन्तु  यह देखकर मायूस हो जाता हूँ कि तुम सब एक बड़े-से कक्ष में बंद होकर कानफाड़ू संगीत में ऐसे रम जाते हो कि आपस में सुखद वार्तालाप का आनंद भी नहीं उठा पाते हो।
मैं तो तरह-तरह के व्यंजनों के मौसम भी लेकर आता हूँ ताकि तुम सब खट्टे-मीठे-तीखे व्यंजनों का भरपूर आनंद लो और उसकी खुशबू से मैं भी तरोताजा हो जाऊँ परन्तु मैं मायूस हो उठता हूँ तब, जब तुम सबको एक प्लास्टिक के पैकेट में से कुछ निकालकर खाते देखता हूँ। उसकी कोई महक मुझ तक नहीं आती। इसलिए कहता हूँ कि तुम सब मुझसे कुछ माँगने की बजाय कि हमें ये देना ,हमारे लिए ये लाना ,तुम अपने आप को बदलो , पहले जैसे हो जाओ सभ्य, सुसंस्कृत, विनम्र , शालीन, सदाचारी, कर्मठ, संतुष्ट, दयावान और कुछ -कुछ देसी…. फिर देखना …! यह साल तुम्हें कितना कुछ दे जायेगा ….,बदलकर तो देखो।

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