- 11 हजार हेक्टेयर बिगड़े वन क्षेत्र पर खड़े होंगे नए जंगल
- पीपीपी मॉडल पर 30 से 50 साल की लीज पर मिलेगी जमीन, पौधे लगाने और जंगल विकसित करने की जिम्मेदारी निवेशकों की होगी
भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम। मध्यप्रदेश में वन क्षेत्र बढ़ाने और उजड़ चुके जंगलों को फिर से हरा-भरा करने के लिए सरकार अब निजी निवेशकों का सहारा लेने जा रही है। इसके तहत राज्य वन विकास निगम के अधीन ऐसी वन भूमि, जहां जंगल नहीं है या केवल झाडिय़ां बची हैं, निजी निवेशकों को लीज पर दी जाएगी। निवेशक इन जमीनों पर पौधे लगाकर जंगल विकसित करेंगे। खास बात यह है कि पेड़ों के वयस्क होने के बाद उन्हें काटने या बेचने का अधिकार निजी निवेशकों को नहीं होगा। इस पर सरकार का ही नियंत्रण रहेगा।
केंद्र की सहमति मिलने के बाद राज्य सरकार इस संबंध में नई नीति तैयार कर रही है। प्रस्तावित व्यवस्था पीपीपी मॉडल पर आधारित होगी। इसके तहत जंगल विकसित करने की जिम्मेदारी निजी निवेशकों की होगी और इसके बदले उन्हें संबंधित गैर वन क्षेत्र की जमीन का कुछ हिस्सा निर्धारित अवधि के लिए लीज पर दिया जाएगा। जमीन का आवंटन टेंडर प्रक्रिया के जरिए होगा। फिलहाल प्रस्तावित नीति को राज्य सरकार की अंतिम मंजूरी मिलना बाकी है।
राज्य वन विकास निगम की 11 हजार हेक्टेयर जमीन पर नजर
इस योजना के लिए राज्य वन विकास निगम के पास उपलब्ध करीब 11 हजार हेक्टेयर वन भूमि चिह्नित की गई है। इनमें ऐसे क्षेत्र शामिल हैं, जहां घना जंगल नहीं है। कुछ जमीनों पर केवल झाडिय़ां हैं, जबकि कई हिस्से पूरी तरह खाली पड़े हैं। इन्हीं क्षेत्रों को निवेश के लिए उपलब्ध कराने की तैयारी है। प्रस्ताव के अनुसार, जमीन 30 से 50 साल की अवधि के लिए लीज पर दी जा सकती है। निवेशक केंद्र और राज्य सरकार की निर्धारित शर्तों के अनुसार ही इसका उपयोग कर सकेंगे। जिस हिस्से में पौधारोपण कर जंगल विकसित किया जाएगा, वहां किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि की अनुमति नहीं होगी। हालांकि, लगाए गए पौधों की निगरानी, उनके संरक्षण और जंगल विकसित होने के बाद प्रबंधन की जिम्मेदारी किस एजेंसी की होगी, इस पर नीति में अंतिम निर्णय होना बाकी है।
वन भूमि पर कब्जे रोकने का भी तर्क
सरकार इस योजना को केवल हरित क्षेत्र बढ़ाने तक सीमित नहीं मान रही है। वन विकास निगम के पास मौजूद खाली और गैर वन भूमि पर अतिक्रमण की आशंका भी बनी रहती है। सरकार का मानना है कि निजी निवेशकों को निर्धारित शर्तों पर जमीन देने से इन क्षेत्रों का नियमित उपयोग और रखरखाव सुनिश्चित हो सकेगा। इससे खाली पड़ी वन भूमि पर अवैध कब्जों की आशंका भी कम होगी।
कॉर्पोरेट फंड को मिलेगा इस्तेमाल का मौका
इस नीति के पीछे कॉर्पोरेट क्षेत्र के पर्यावरण संरक्षण फंड का उपयोग भी एक बड़ा उद्देश्य है। कंपनियों के पास पर्यावरण संतुलन और संरक्षण से जुड़े कार्यों के लिए फंड उपलब्ध रहता है, लेकिन कई बार जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण वे इसका उपयोग नहीं कर पातीं। मुख्यमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, कॉर्पोरेट सेक्टर की ओर से पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने में जमीन की उपलब्धता को लेकर दिक्कतें बताई जाती रही हैं। ऐसे में सरकार चाहती है कि जिन कंपनियों के पास पर्यावरण संरक्षण पर खर्च करने के लिए फंड है, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर खाली वन भूमि उपलब्ध कराई जाए।
तीसरी बार शुरू हुई प्रक्रिया, नीति पर अंतिम मुहर बाकी
बिगड़े वन क्षेत्रों में निजी भागीदारी से हरियाली बढ़ाने की कवायद पहले भी शुरू हुई थी, लेकिन दो बार अघोषित रोक के चलते आगे नहीं बढ़ सकी। अब तीसरी बार सरकार ने इस दिशा में प्रक्रिया शुरू की है। प्रस्तावित नीति में निवेशकों को प्रोत्साहन देने और जमीन आवंटन की शर्तों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। सरकार की मंशा है कि निजी पूंजी और कॉर्पोरेट फंड के जरिए ऐसे वन क्षेत्रों को विकसित किया जाए, जहां सरकारी संसाधनों से अपेक्षित हरियाली नहीं बढ़ पा रही है। हालांकि, इस मॉडल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पौधों की निगरानी, वन संरक्षण और निवेशकों की जवाबदेही के लिए नीति में कितने प्रभावी प्रावधान किए जाते हैं।
