ऊर्जा भंडारण क्षमता बढ़ाने पर सरकार का फोकस

  • मप्र को ऊर्जा क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर और आधुनिक बनाने की कवायद

भोपाल/बिच्छू डॉट कॉम
नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में मप्र लगातार अपनी क्षमता बढ़ा रहा है। प्रदेश सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक राज्य की नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर 20,000 मेगावाट (20 गीगावाट) करना है। ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों के अनुसार, मप्र में तेजी से बढ़ रही सौर ऊर्जा क्षमता के कारण ग्रिड बैलेंसिंग एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। दिन में अधिक उत्पादन और शाम के समय पीक डिमांड के बीच संतुलन बनाने के लिए बड़े स्तर पर ऊर्जा भंडारण की जरूरत होती है। ऐसे में मप्र पॉवर मैनेजमेंट कंपनी ने राज्य में बिजली आपूर्ति और स्टोरेज क्षमता बढ़ाने के लिए 500 मेगावाट ऊर्जा भंडारण क्षमता खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। गौरतलब है कि प्रदेश साल 2012 की तुलना में नवकरणीय ऊर्जा में 17 फीसदी का इजाफा हुआ है। अब प्रदेश में 7339 मेगावॉट नवकरणीय ऊर्जा है। इसमें सोलर एनर्जी 4237 मेगावॉट है। वहीं पवन ऊर्जा 2870.35 मेगावॉट और बायोमास में 108 मेगावॉट और जल परियोजनाओं से उत्पादन होने वाली बिजली 123.91 मेगावॉट है। अब अगले पांच साल में 14 हजार मेगावॉट के नए प्लांट लगाए जाने का टारगेट तय किया गया है। इससे नवकरणीय ऊर्जा का उत्पादन प्रदेश में बढ़ जाएगा। प्रदेश में पीएम सूर्य घर योजना के तहत भी प्लांट लगाए जा रहे हैं। प्रदेश में सोलर रूफटॉप योजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके तहत रेस्को और ईपीसी मोड पर लगभग 53 मेगावॉट क्षमता के संयंत्र स्थापित किए जा चुके हैं। नवकरणीय एनर्जी बढऩे के साथ ही अब इसको स्टोर करने की प्रक्रिया भी सरकार ने शुरू कर दी है।
500 मेगावाट ऊर्जा भंडारण क्षमता खरीदने की तैयार
मप्र पॉवर मैनेजमेंट कंपनी ने राज्य में बिजली आपूर्ति और स्टोरेज क्षमता बढ़ाने के लिए 500 मेगावाट ऊर्जा भंडारण क्षमता खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह खरीद पम्प्ड स्टोरेज प्लांट्स के माध्यम से की जाएगी, जो इंटर स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम  से जुड़े होंगे। इस परियोजना के तहत चयनित कंपनियों से 40 वर्षों की लंबी अवधि के लिए बिजली खरीदी जाएगी। पम्प्ड स्टोरेज प्लांट्स की खासियत यह है कि वे 6 घंटे तक बिजली आपूर्ति कर सकते हैं, जबकि अधिकतम 4 घंटे तक लगातार डिस्चार्ज की क्षमता रखते हैं। यह तकनीक विशेष रूप से तब उपयोगी होती है, जब सोलर और विंड जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से उत्पादन में उतार-चढ़ाव होता है। पम्प्ड स्टोरेज प्लांट्स इस समस्या का प्रभावी समाधान माने जाते हैं, क्योंकि वे अतिरिक्त बिजली को स्टोर कर जरूरत के समय उपयोग में लाते हैं। यह परियोजना न केवल राज्य में बिजली आपूर्ति की विश्वसनीयता बढ़ाएगी, बल्कि नवीकरणीय ऊर्जा को बेहतर करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। आने वाले वर्षों में इस तरह की परियोजनाएं मध्यप्रदेश को ऊर्जा क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर और आधुनिक बनाने की दिशा में अहम साबित हो सकती हैं। जब बिजली की मांग कम होती है, खासकर दिन में जब सौर ऊर्जा का उत्पादन ज्यादा होता है, तब अतिरिक्त बिजली का उपयोग करके पानी को निचले जलाशय से ऊपरी जलाशय में पंप किया जाता है। यह प्रक्रिया ऊर्जा को स्टोर करने का काम करती है। बाद में, जब बिजली की मांग बढ़ती है-जैसे शाम या रात के समय तो यही पानी ऊपर से नीचे छोड़ा जाता है, जिससे टरबाइन घूमती है और बिजली उत्पन्न होती है। यह प्लांट एक बार में अधिकतम 4 घंटे तक अपनी पूरी क्षमता (जैसे 500 मेगावॉट) पर लगातार चल सकता है। इसके बाद या तो उसे आंशिक लोड पर चलाना पड़ सकता है या कुछ समय के लिए रुकना पड़ सकता है। लेकिन कुल मिलाकर, वह 6 घंटे तक बिजली देने में सक्षम रहता है, भले ही बीच में लोड कम-ज्यादा हो। पम्प्ड स्टोरेज प्लांट (पीएसपी), एक बार पूरी तरह चार्ज होने के बाद लगातार 6 घंटे तक बिजली सप्लाई करने में सक्षम होती है। यह अवधि उस कुल समय को दर्शाती है, जितने समय तक प्लांट अपनी संग्रहित (स्टोरेज) ऊर्जा को उपयोग में लाकर ग्रिड को बिजली दे सकता है। यह प्लांट एक समय में 500 मेगावॉट बिजली देने की क्षमता रखता है। यदि यह प्लांट 6 घंटे तक लगातार बिजली देता है, तो कुल ऊर्जा आपूर्ति 3000 मेगावाट घंटा होगी। यही वह ऊर्जा है, जो पहले स्टोर की गई थी और अब जरूरत के समय उपयोग में लाई जा रही है।

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