मोहन मंत्रिमंडल विस्तार में क्षेत्रीय संतुलन पर फोकस

  • सोशल इंजीनियरिंग के साथ उपेक्षित जिलों को प्रतिनिधित्व देना बड़ी चुनौती
  • गौरव चौहान
मोहन मंत्रिमंडल विस्तार

मध्यप्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलों के बीच क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का मुद्दा तेजी से राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार में जहां नर्मदापुरम संभाग से कोई मंत्री नहीं है, वहीं कई जिले भी ऐसे हैं जो मंत्रिमंडल में अपने आप को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। जबकि कुछ क्षेत्रों का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है। ऐसे में जब भी मंत्रिमंडल विस्तार होगा, सत्ता और संगठन के सामने क्षेत्रीय संतुलन साधना बड़ी चुनौती बन सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव में अब लगभग ढाई वर्ष का समय शेष है। सिंहस्थ की तैयारियों और चुनावी प्रक्रिया को देखते हुए सरकार के पास सीमित राजनीतिक समय बचा है। ऐसे में आगामी विस्तार केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को साधने का भी प्रयास होगा।
जानकारी के अनुसार, मप्र में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं, लेकिन इस बार मामला केवल नए चेहरों को शामिल करने का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय असंतोष को दूर करने का भी है। राज्य के नर्मदापुरम संभाग और कई जिले ऐसे हैं, जो सरकार बनने के ढाई साल बाद भी खुद को सत्ता की मुख्यधारा से दूर महसूस कर रहे हैं। यही वजह है कि मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सबसे ज्यादा उम्मीदें उन्हीं क्षेत्रों में दिखाई दे रही हैं, जिन्हें अब तक पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला।
सरकार और संगठन के लिए चेतावनी संकेत
भाजपा ने 2023 के विधानसभा चुनाव में पूरे प्रदेश से व्यापक जनसमर्थन हासिल किया था, लेकिन मंत्रिमंडल गठन के बाद क्षेत्रीय संतुलन को लेकर सवाल लगातार उठते रहे हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि लंबे समय तक किसी क्षेत्र को सत्ता में भागीदारी नहीं मिलती है, तो वहां कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेतृत्व में असंतोष बढऩा स्वाभाविक है। नर्मदापुरम संभाग इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। तीन जिलों वाले इस संभाग से एक भी मंत्री नहीं होने के कारण स्थानीय नेताओं और समर्थकों में यह भावना मजबूत हुई है कि क्षेत्र को उसकी राजनीतिक ताकत के अनुरूप महत्व नहीं मिला। नर्मदापुरम, हरदा और बैतूल जैसे तीन जिलों वाले इस संभाग से राज्य मंत्रिमंडल में एक भी मंत्री नहीं है। यह क्षेत्र कृषि और आदिवासी आबादी की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। लंबे समय से यहां के जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं के बीच प्रतिनिधित्व की मांग उठती रही है।
भोपाल संभाग सबसे मजबूत
दूसरी ओर, पांच जिलों वाले भोपाल संभाग को मंत्रिमंडल में सबसे अधिक प्रतिनिधित्व मिला है। भोपाल, सीहोर, रायसेन और राजगढ़ जिलों से कुल छह मंत्री शामिल हैं। विशेष बात यह है कि अकेले राजगढ़ जिले से दो राज्यमंत्री मंत्रिमंडल में हैं।
जबलपुर और रीवा संभाग में सीमित भागीदारी
नौ जिलों वाले जबलपुर संभाग से केवल चार मंत्री हैं। वहीं छह जिलों वाले रीवा संभाग को उपमुख्यमंत्री सहित तीन मंत्रियों का प्रतिनिधित्व मिला है, जिनमें दो राज्यमंत्री हैं। राजनीतिक हलकों में इसे भी असंतुलन के रूप में देखा जा रहा है। राज्य मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व कम होने के बावजूद कुछ क्षेत्रों को केंद्र सरकार में जगह मिली है। विदिशा से सांसद शिवराज सिंह चौहान को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय मिला है। गुना से सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया  केंद्र सरकार में मंत्री हैं। वहीं बैतूल-हरदा क्षेत्र से सांसद डीडी उईके को भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान मिला है।
विस्तार में इन पर फोकस
राजनीतिक जानकारों के अनुसार भविष्य के मंत्रिमंडल विस्तार में नर्मदापुरम, जबलपुर और रीवा संभाग जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता मिल सकती है। इसके साथ ही आदिवासी, ओबीसी, महिला और क्षेत्रीय संतुलन के समीकरणों को भी ध्यान में रखा जाएगा। सरकार के लिए चुनौती यह होगी कि नए चेहरों को अवसर देते हुए मौजूदा शक्ति संतुलन को भी बनाए रखा जाए। मंत्रिमंडल विस्तार केवल पद वितरण का मामला नहीं होता, बल्कि यह सरकार की राजनीतिक प्राथमिकताओं और चुनावी रणनीति का संकेत भी देता है। ऐसे में आगामी विस्तार को 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है, जहां क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है। दिलचस्प तथ्य यह है कि प्रदेश के दो सबसे बड़े शहर भोपाल और इंदौर को दो-दो मंत्री मिले हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह तर्क दिया जा रहा है कि आर्थिक और प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इन शहरों को अधिक प्रभावशाली प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। राजधानी भोपाल से एक मंत्री राज्यमंत्री स्तर का होने को भी कुछ लोग मुद्दा बना रहे हैं।
सत्ता का गणित बनाम संतुलन की राजनीति
मंत्रिमंडल विस्तार का सबसे कठिन पक्ष यही है कि नए चेहरों को शामिल करने के लिए जगह सीमित है, जबकि दावेदारों की संख्या काफी अधिक है। ऐसे में सरकार को राजनीतिक संतुलन, क्षेत्रीय अपेक्षाओं और संगठनात्मक हितों के बीच सामंजस्य बैठाना होगा। यही कारण है कि संभावित विस्तार को केवल मंत्रियों की संख्या बढ़ाने की कवायद नहीं, बल्कि 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की व्यापक राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। उपेक्षित क्षेत्रों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या उन्हें सत्ता में उचित भागीदारी मिलती है या फिर इंतजार और लंबा होता है।
संभागवार मंत्रियों की स्थिति
– इंदौर संभाग (8 जिले, 5 मंत्री): कैलाश विजयवर्गीय (इंदौर), तुलसीराम सिलावट (इंदौर), निर्मला भूरिया (झाबुआ), नागर सिंह चौहान (आलीराजपुर), विजय शाह (खंडवा)
– उज्जैन संभाग (7 जिले, 5 मंत्री): मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव (उज्जैन), जगदीश देवड़ा (नीमच), चैतन्य काश्यप (रतलाम), इंदर सिंह परमार (शाजापुर), अन्य प्रतिनिधित्व
– ग्वालियर संभाग (5 जिले, 2 मंत्री): नारायण सिंह कुशवाह, प्रद्युम्न सिंह तोमर
– जबलपुर संभाग (9 जिले, 4 मंत्री): राकेश सिंह, उदय प्रताप सिंह, प्रह्लाद सिंह पटेल, संपत्तिया उइके
– चंबल संभाग (3 जिले, 2 मंत्री): एदल सिंह कंषाना, राकेश शुक्ला
– रीवा संभाग (6 जिले, 3 मंत्री): उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल, राधा सिंह, प्रतिमा बागरी
– सागर संभाग (6 जिले, 4 मंत्री): गोविंद सिंह राजपूत, धर्मेंद्र भाव सिंह लोधी, लखन पटेल, दिलीप अहिरवार
– भोपाल संभाग (5 जिले, 6 मंत्री): विश्वास सारंग, कृष्णा गौर, करण सिंह वर्मा, नरेंद्र शिवाजी पटेल, गौतम टेटवाल, नारायण सिंह पंवार
– शहडोल संभाग: दिलीप जायसवाल

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